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Sunday, May 31, 2020

#अतीत_की_गाथा... #बाल_विद्या_मंदिर_स्कूल_श्योपुर 【प्रणय प्रभात】

#अंचल_का_पहला_निजी_शिक्षण_संस्थान_जिसने_रचे_कई_कीर्तिमान                      【प्रणय प्रभात】"बाल विद्या मंदिर" स्कूल यानि श्योपुर का पहला निजी शिक्षण संस्थान। जिसने इस अंचल की धरती पर अशासकीय शिक्षा को नए आयाम दिए। शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक गतिविधियों में अग्रणी इस संस्थान ने ही सिखाया कि शिक्षा व्यवसाय कितना सार्थक व सफल हो सकता है। सन 1977 में स्थापित इस एक विद्यालय ने उन बाहरी अधिकारियों व कर्मचारियों की दुविधा को ख़त्म किया जो उनके बच्चों की बेहतर प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी थी। यह वही दौर था जब नौकरशाह इस क्षेत्र को "काला पानी" मानते थे। उनकी इस सोच के पीछे कई कारण थे। जिनमें अच्छी प्राथमिक शिक्षा भी एक थी। हालांकि सरकारी प्रायमरी और मिडिल स्कूल कई थे। फिर भी अशासकीय स्कूलों में बच्चों को भेजने की सोच शासकीय सेवकों और समृद्ध परिवारों के मन में थी। निम्न व उच्च मध्यम वर्ग के पालक भी अपने बच्चों की बुनियादी शिक्षा के लिए एक बेहतर विकल्प चाहते थे। इसी सोच के साथ क्षेत्र की शैक्षणिक रिक्तता को सही समय पर भांपा श्री आनंद प्रकाश गुप्ता ने। जिन्होंने वर्ष 1977 में इस संस्थान की नींव डाली। कस्बे के मेन बाज़ार स्थित सेठ श्री लालचंद जैन को विशाल इमारत का एक बड़ा हिस्सा इस संस्थान का साक्षी बना। बाहरी परिसर में संचालित सहकारी व्यावसायिक एवं औद्योगिक बैंक वाला सारा हिस्सा इस शाला के लिए लिया गया। फिर पीछे का भवन भी किराए पर ले लिया गया। जिसके पहले कक्ष को प्रधानाध्यापक कार्यालय बनाया गया। इस कक्ष के बाहर ही शुद्ध पेयजल की व्यवस्था थी। सामने ही स्थित एक छोटे से कक्ष को स्टाफ रूम के तौर पर इस्तेमाल में लिया गया। मैहराबों और स्तम्भों वाले एक बड़े हॉल को लकड़ी की दीवारों से तीन भागों में विभाजित किया गया। प्रार्थना और खेलकूद के लिए एक अच्छा खासा प्रांगण इसी हॉल के पिछवाड़े था।  बच्चों की संख्या बढ़ने के साथ ही बाहरी परिसर में भी दो कक्ष अलग से लिए गए। इन सभी का उपयोग कक्षाओं के तौर पर होता था। बाद में बाहरी परिसर का बड़ा हिस्सा बैंक के लिए किराए पर दे दिया गया। बहरहाल, सुबह व दोपहर की दो पालियों में संचालित यह शाला एलकेजी से पाँचवीं तक के बच्चों के लिए थी। सुबह की पाली में बड़ी कक्षाएं लगती थीं। दोपहर की पाली छोटी कक्षाओं के लिए थी। नेवी वेल्यू और व्हाइट ड्रेस में लकदक बच्चे तब सरकारी स्कूलों के बच्चों से बिल्कुल अलग दिखाई देते थे। लाल रंग की टाई, बेल्ट और मोजे उन्हें सरकारी स्कूलों के बच्चों से कुछ ख़ास बनाते थे। माँ सरस्वती के चित्र वाला एक नीला-सफेद बेज भी बच्चों को लगाना होता था। काले चमकदार जूते भी पूर्ण गणवेश का हिस्सा थे। बच्चों को लाने ले जाने के लिए एक रिक्शा भी था। जिसे ग़नी चाचा नामक एक अधेड़ सज्जन चलाते थे। स्कूल में प्रेम बाई नामक एक महिला भृत्य थीं। बेहद मिलनसार, मेहनती, समर्पित और मृदुभाषी। उनके कान कार्यालय से बजने वाली घण्टी पर होते थे और आँखें बच्चों पर। शाला प्रधान श्री आनंद प्रकाश गुप्ता का सौम्य व्यक्तित्व अभिभावकों को आकर्षित करता था। छरहरा शरीर, गोरा रंग, स्टाइलिश बाल और शानदार कलम उनकी छवि को और निखारती थीं। वे अपने स्कूटर से स्कूल आते थे। तब उनका आवास मसालेदार मोहल्ले में हुआ करता था। वे स्कूटर बाहरी प्रांगण में खड़ा करते। खिली हुई मुस्कान के साथ सभी का अभिवादन स्वीकार करते और अपने कक्ष में बैठ जाते। कार्यालय छोटा लेकिन सुव्यवस्थित था। बड़ी सी मेज के पीछे श्री गुप्ता जी की कुर्सी होती थी। दाहिने हाथ पर गोदरेज की आलमारी। जिसकी छत पर करीने से कुछ फाइलें रखी होती थीं। बाएं हाथ पर लकड़ी की एक रैक, जिसमें रजिस्टर व स्टेशनरी रखी होती थी। इसी रैक पर माँ सरस्वती की एक बड़ी प्रतिमा विराजती थी। जिनके गले में मोटा सा कृत्रिम हार होता था। सफेद मोतियों की एक माला भी। कार्यालय के एक हिस्से में लकड़ी की चार-छह कुर्सियां होती थीं। टेबल पर मोटे काँच के नीचे वर्ष भर के कैलेंडर सहित कुछ अन्य जानकारियों वाले कागज़ होते थे। ऊपर टेलीफोन का काले रंग का चोंगा। इस फोन का नम्बर 103 होता था। यह वो दौर था जब कॉल करने के लिए नम्बर एक्सचेंज से कनेक्ट कराना पड़ता था। बाद में उसकी जगह नम्बर डायल करने वाले चोंगे ने ले ली। जो कार्यालय को कार्यालय का लुक देता था। श्री गुप्ता जी को बच्चे सर कहते थे जबकि स्टाफ मेम्बर भाई साहब। भाई साहब की कार्यप्रणाली भी समय की माँग के अनुसार कुछ अलग थी। अधीनस्थ स्टाफ को निर्देश वे पर्ची पर लिख कर दिया करते थे। ताकि अध्ययन व अध्यापन कार्य में कोई व्यवधान न आए। फोन पर बात करने का उनका ढंग भी कुछ अलग होता था। वे फोन के माउथपीस को मुँह के बजाय गले पर रखते थे। बातचीत की शैली संयमित, शालीन व आत्मीय होती थी। कार्यालय आने वाले हर अभिभावक को पूरी तरज़ीह दी जाती थी। बैठते ही बाई काँच के साफ-सुथरे गिलासों में ठंडा पानी पेश कर देती थी। कुछ देर बाद बाहर से चाय भी आ जाती थी। श्री गुप्ता की अनुपस्थिति में अभिभावकों की बात को सुनने व समस्या को निपटाने की ज़िम्मेदारी वरिष्ठ शिक्षिकाओं की थी। जो बेहद व्यवहार कुशल, निपुण होने के साथ-साथ संस्थान के प्रति घोर निष्ठावान व समर्पित थीं। पारस्परिक सामंजस्य और आत्मीयता रखने वाली योग्य शिक्षिकाओं की कर्तव्यनिष्ठा ने शाला को हर मामले में शीर्ष पर ले जाने का काम किया। जिनके पीछे श्री गुप्ता की नेतृत्व कुशलता की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका थी। स्कूल ने पहले ही साल कामयाबी के वो झंडे गाड़े कि अगले ही साल दूसरा अशासकीय स्कूल टैगोर बाल विद्या निकेतन के तौर पर अस्तित्व में आ गया। इस स्कूल की स्था पना 1978 में श्री रशीद अहमद कुरैशी ने की। इसके बाद प्रायवेट स्कूलों की श्रृंखला बढ़ती चली गई। जिसके पीछे बाल विद्या मंदिर के जलवे की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। इनमें एमजी बाल विद्या निकेतन और ज्ञानोदय विद्या मंदिर अग्रणी थे। यह थी स्कूल की स्थापना और शुरुआती ढाँचे से जुड़ी बातें। अगले अंक में बात करेंगे उन तमाम उपलब्धियों की, जो इस संस्थान ने हासिल कीं। शिक्षा सत्र 2010/11 में यह स्कूल सीताराम जी और नवग्रह मंदिर के बीच वाली गली में स्थानांतरित हो गया। जो अब भी विधिवत संचालित है। विरासत की कमान विगत कई वर्षों से श्री गुप्र के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री अनिल गुप्ता के हाथ है। इससे पहले पाली रोड स्थित सात नीमड़ी और नर्सरी के सामने निजी भवन में इस शाला की शाखाएं भी स्थापित व संचालित हुईं। जो कालांतर में खुलने वाले बड़े संस्थानों के सामने संसाधनों की लड़ाई में कामयाब नहीं रह पाईं। तथापि शुरुआती दो दशक तक श्योपुर के आसमान पर बाल विद्या मंदिर की कीर्ति पताका पूरी शान से लहराई। इस संस्थान के तमाम विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। तमाम उच्च पदों पर हैं। जिनके सुंदर भविष्य को ठोस आधार देने का श्रेय इस संस्थान को बिना किसी संकोच के दिया जा सकता है। साधुवाद श्री गुप्ता जी को। आप दीर्घायु हों और स्वस्थ रहें, यह कामनाएं हैं। शुरुआती एक दशक में बहुत स्नेह पाया आपसे।            (#शेष_अगले_अंक_में.....)r

1 comment:

  1. Bahut hi sajeev varnan kiya hai apne. Kai purani yaden taaza ho gayi.

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