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Wednesday, May 20, 2020

एक्सक्लूसिव्ह रिपोर्ट :- श्योपुर के विकास के दो ही हैं मूलमंत्र पहला (ब्रॉड गेज) लाइन"तो दूसरा (एशियाटिक) लॉयन"

विकास से ज्यादा उपजे हैं विकास के मसीहाचालबाजी के पांसों से छला जा रहा है जिला          (प्रणय प्रभात)                     श्योपुर !राजनेताओं और नौकरशाहों पर निर्भर जिला विकास के मामले में आत्मनिर्भर हो सकता था। बशर्ते ब्रॉडगेज रेल लाइन और कूनो वन्यजीव अ यारण्य में एशियाटिक लॉयन जैसी सौगातें उसे मिल जातीं। दुर्भाग्य यह रहा कि 18 साल के महाभारत में चालबाजी के शकुनी पांसे जिले को छलते रहे। दोनों मुद्दे जिले के विकास की गति को चौगुना कर सकते थे। विड बना की बात रही कि विकास के तथाकथित मसीहाओं की सूची को लंबा बनाने में काम आने लगे। श्योपुर-ग्वालियर के बीच नैरोगेज के आमान परिवर्तन व कोटा के समीप दीगोद तक विस्तार का मामला आज भी उलझा हुआ है। अमूमन यही स्थिति पर्यटन के लिहाज से विश्वपटल पर श्योपुर को पहचान दिलाने वाले कूनो वन्यजीव अ यारण्य की भी है। करोड़ों की लागत वाली  महत्वाकांक्षी परियोजना 1981 से वजूद में होने के बावजूद महज प्रयोगशाला बनी हुई है। गुजरात के गिर नेशनल पार्क में संरक्षित एशियाई सिंहों के दूसरे आशियाने के तौर पर विकसित इस अभ्यारण्य में सब कुछ है सिवाय शेरों के। गुजरात सरकार उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद शेर देने के मूड में नहीं है। राज्य से केन्द्र तक भाजपा की सरकार के बाद भी मुद्दा सुलझने के बजाय उलझता जा रहा है। देश की कमान संभालने के बाद वैश्विक नेता के तौर पर प्रतिष्ठा और सम्मान पाने वाले नरेन्द्र मोदी भी इस मामले में गुजरात की सीमाओं से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। दो दर्जन आदिवासी गांवों का अधिग्रहण और सैकड़ों आदिवासियों का विस्थापन निरर्थक जान पड़ रहा है। तीव्रगामी विकास की संभावनाओं पर लगा ग्रहण बरकरार है। आवश्यकता लाइन और लॉयन की मांग को लेकर व्यापक जनांदोलन की है। दोनों मुद्दे जिले को विकास के मामले में अग्रणी बनाते हुए संभावनाओं के क्षितिज पर लाने वाले हो सकते हैं। दरकार सियासी मतभेदों को दूर करते हुए सामंजस्य के साथ लड़ाई छेड़े जाने की है। मिसाल जिले के निर्माण हेतु किए गए आंदोलन के तौर पर सामने है। - अधिकारों की हुंकार के साथ दायित्वों की भी हो गूंजउल्लेखनीय है कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और वन संपदा से भरपूर प्रदेश का सरहदी श्योपुर जिला आज पूरे 18 वर्ष का हो गया है। वर्ष 1998 में 25 मई के ही दिन इसे तहसील से जिले का दर्जा मिला था। इससे पहले तक ये मुरैना जिले का एक अनुविभाग था। प्रदेश की राजधानी भोपाल की दूरी 425 किमी थी। मुरैना जिला मु यालय भी 212 किमी की जटिल दूरी पर था। अनुभाग की आवाज रास्ते के घोर जंगलों, बेमेल पहाडिय़ों और गहरी घाटियों में घुटकर रह जाती थी। विकास के लिए आई मदों और संसाधनों का बंटवारा भी नियोजित नहीं था। सौगातों पर मुरैना और आसपास की तहसीलों का कब्जा था। जनता की समस्याओं और मांगों से शासन-प्रशासन का सरोकार नहीं के बराबर था।  विकास को छटपटाते श्योपुर की एकमात्र चाह थी, जिले का दर्जा। ठीक 18 साल पहले आज ही के दिन जनता की उ मीदें विधिवत साकार हुईं। मुरैना की दासता से पृथक श्योपुर चंबल संभाग का तीसरा जिला बनकर पटल पर उभरा। इसी के साथ जनमानस के कैनवास पर उभरा विकास का एक खाका। उ मीदें थीं मनमोहक तस्वीर बनने और उसमें उत्साह के रंग भरे जाने की। तस्वीर बनी, रंग भरे भी गए लेकिन कहीं-कहीं रोशनाई बिखर भी गई। अब जो तस्वीर है सबके सामने है। बीते हुए 18 सालों में उम्र के लिहाज से जिला बालिग हो चुका है। मैदानी धरातल पर इसका परिपक्व होना अभी भी बाकी है। जरूरत शासन की नजरे-इनायत की होने के साथ-साथ प्रशासनिक प्रतिबद्धता की है। इससे भी बड़ी आवश्यकता जनमानस में बदलाव की है। लोगों की सोच अधिकारों तक सिमटने के बजाय दायित्वों तक पींग बढ़ाए तो शायद जिला आगे बढ़ पाए।
                 #प्रणय_प्रभात

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