विषम हालात में एक शहर में फंसना पड़ा। जो कोविड-19 के कारण रेड ज़ोन में आ चुका था। पूरे 62 दिन घर के एक अंदरूनी कमरे में बिताए। एक-एक दिन एक-एक युग की तरह बीत रहा था। अपना घर, अपना शहर, अपने लोग रह-रह कर याद आते थे। मुश्किल से अनुमति मिली और अपने शहर लौटना नसीब हुआ। रास्ते भर जारी सेनेटाइज़ेशन के कारण लगभग भीगी हुई गाड़ी से घर के मोड़ तक पहुँचे। घर के दरवाजे तक गाड़ी जाना मुमकिन नहीं था। लिहाजा सड़क पर ही सामान उतारना पड़ा। निगाहें उठाईं तो तमाम परिचित हैरत से ताकते व फुसफुसाते दिखे। आँखों में अपनत्व की जगह परायापन। मानों हम कोई इंसान नहीं मानव बम बनकर लौटे थे। चुभती हुई निगाहों के सवालों का सामना करते हुए घर तक पहुँचे। कथित सम्बन्धों का भूत काफ़ी हद तक उतर चुका था। अगले दिन इन्हीं में से किसी ने कोई मदद हो तो बताने के लिए कह कर ज़ख्मों पर मानों नमक सा छिड़क दिया। मन किया कि मदद माँग ही ली जाए। बस इतना सा बोल कर- "कि भगवान के लिए अब ऐसी निगाहों से ताक कर कानाफूसी मत करना। क्योंकि यह अमानवीयता इंसानी समाज और रिश्तों पर से भरोसा उठाती है।
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#महामारी_का_दौर

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