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Thursday, May 21, 2020

#संस्मरण- प्रणय प्रभात #पीला_डिब्बा_हरा_खजूर (इस घी की बात ही अलग थी हुजूर।

मेरे साथ के ##पीला_डिब्बा_हरा_खजूर(इस घी की बात ही अलग थी हुजूर)#संस्मरण / #प्रणयमेरे साथ के जी नहीं मुझसे पुराने लोग #टीन के इस #डिब्बे से बख़ूबी वाकिफ़ होंगे। ये हमारे दौर के निम्न मध्यम व निम्न ही नहीं उच्च वर्ग  का भी पसंदीदा घी था। जिसे #डालडा के नाम से देश भर में पहचाना जाता था। डालडा यानि वनस्पति तेल से निर्मित शुद्ध, स्वादिष्ट व दानेदार घी। जिनके बज़ट में शुद्ध देशी नहीं आता था। उनके लिए यह एक शानदार और #किफ़ायती_विकल्प था। एक और पांच किग्रा वज़न के डिब्बों में यह आता था। जो बाद में 15 किग्रा के कनस्तर में भी आने लगा। #सीधी_उंगली_से_घी_नहीं_निकलता वाली कहावत शायद तभी जन्मी होगी। हमारा बचपन इस घी पर काफ़ी हद तक निर्भर रहा। लिहाजा इस का स्वाद आज भी याद है। परांठों के लिए तो यह चिकनाई का एक माध्यम था ही। बासी रोटी निपटाने में भी मददगार था। इसे गर्म कर के एक बासी रोटी पर लगाना। फिर नमक और मिर्च बुरक कर दूसरी रोटी पर चुपड़ना रोज़ का काम था। रोटी की पुंगी बना कर खाना और अघाना भी दिनचर्या का अंग। इस घी ने ना कभी पेट बिगाड़ा, ना कोई और व्याधि दी। इससे घर परिवार का नाता सालों तक रहा। बाद में इसकी जगह तमाम ब्रांड आते गए और यह रसोई से ग़ायब हो गया। यह अलग बात है कि इसकी गुणवत्ता और स्वाद को कोई भी ब्रांड आज तक चुनौती नहीं दे पाया है। कम से कम दस सदस्यों की मौजूदगी वाले मेरे घर में डालडा का उपयोग दो दशक से भी ज़्यादा समय तक हुआ। वजह थी शाम को पक्का भोजन बनना। सुबह चौके में लक़ीर खींच कर कच्चा भोजन दादी या बुआ बनाती थीं। शाम को पक्का भोजन मम्मी। दादी और बड़ी बुआ मम्मी के हाथों बना कच्चा भोजन (जिसे "सकरा" कहते थे) नहीं करती थीं। इसके पीछे की वजह आज तक नहीं पता। बस इतना याद है कि सुबह रोटी तो शाम को तिकोने व गोल परांठे बनाए जाने की परंपरा घर में प्रचलित थी। मज़ेदार बात यह थी कि रसोई में खड़िया से खींची गई लक़ीर किसी लक्ष्मण-रेखा से कम नहीं थी। किसी की मजाल नहीं थी कि उस लक़ीर को छू भी पाए। चूल्हे की आंच पर बनने वाली रोटी एक-एक कर लक़ीर से बाहर आती और बारी-बारी से मिलती। इस चक्कर में रोटियां कुछ ज़्यादा ही खाने में आतीं। ज़ोर की भूख लगने या सब्र न हो पाने की स्थिति में हम भाई अपनी थाली की रोटी की अधबंटाई भी कर लेते थे। भूख और बेसब्री का एक कारण भोजन बनने में होने वाली देरी भी होता था। जिसके पीछे की वजह दादी व बुआ का पूजा-पाठ व नियमित सत्संग भी था। जिसका केंद्र घर से सटा गीता भवन होता था। अवसर रात के बचे परांठे सुबह अचार के साथ निपटाए जाते थे। सुबह की बची रोटी दोपहर बाद डालडा चुपड़कर खाई जाती थी। अन्न के प्रति आदर का भाव होता था। क्योंकि उसकी क़ीमत का अंदाज़ा था। शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में बनने वाली पूड़ियाँ भी गुजिया जैसे अन्य पकवानों की तरह इसी घी में तली जाती थीं। बची हुई पूड़ियों को धूप में सुखा कर रखने और पतले दही में गलाने के बाद मिर्च, नमक डाल कर खाने का भी अलग मज़ा था। यह प्रयोग बरसों बाद देशी घी से निर्मित पूड़ियों पर भी कर के देखा। यक़ीन मानिए, वो स्वाद आया ही नहीं। बासी रोटी पर देशी घी के साथ नमक, मिर्च लगा कर खाने में वो लुत्फ़ नहीं मिला, जो बचपन में मिलता था। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में गिरावट का यह नायाब उदाहरण हो सकता है। हम दावे से कह सकते हैं कि तब का नक़ली घी आज के असली घी से कई दर्जा बेहतर था। बताते हैं कि सन 1930 के आसपास यह घी नीदरलैंड से भारत आया। जहां डाडा एंड कंपनी इसे बनाती थी। इसकी पहचान हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल के रूप में हुई। भारत में इसे शुद्ध देशी घी के सस्ते विकल्प के रूप में स्वीकारा गया और यह देखते ही देखते रसोई का राजा बन गया। यहां इसकी बिक्री व खपत ज़ोर की रही। तो इसका निर्माण भी यहीं होने लगा। डाडा के बीच हिंदुस्तान लीवर लि. का "एल" जुड़ा और इसका नाम #डांडा से #डालडा हो गया। इस ब्रांड की स्वीकार्यता और महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज किसी भी ब्रांड के वनस्पति घी को डालडा ही कहा जाता है। ठीक वैसे ही जैसे लोहे की हर आलमारी #गोदरेज_की_आलमारी कहलाती है। उम्मीद है नक़ली घी के ज़ायके की ये असली दास्तान आज की पीढ़ी को भी लुभाएगी। वहीं पुरानी पीढ़ी इस संस्मरण की सत्यता पर पुष्टि की मोहर लगाएगी।                       #प्रणय_प्रभात(आपके अनुभव इस लेख में कुछ बातें और भी जुड़वा सकते हैं। जैसे आदरणीय भाई साहब श्री अरुण ओसवाल जी की मेरे इस लेख पर यह सटीक प्रतिक्रिया, जो अपने आप में इस लेख के अगले हिस्से की तरह रोचक एवं पठनीय है। पढ़िए आप भी :-#श्री_अरुण_जी_ओसवाल_उवाचःवाह प्रभात जी ...."दास्तांने डालडा ओर उसकी निजी जीवन में  उपयोगिता"  शानदार आत्मकथ्य। इस डालडा ने उन तमाम परिवारों की आबरु भी बचायी जो शुद्ध घी के अभाव में किसी के सामने रूखी रोटी खाने मेंं शर्मिंदगी महसूस करते थे। इस घी की लोकप्रियता का आलम यह था कि बडे नाम वालों के यहाँ भी थेलों में छिपकर जाते हुए देखा है।कभी वनस्पति घी के नाम से प्रचलित हेय दृष्टि से देखे जाने वाले इस घी के हर घर तक पहुंच बनाने के किस्से भी कम दिलचस्प नहीं रहे।ग्रामीण परिवेश और कुछ गिने चुने सम्पन्न लोगों को छोड कर अधिकांश निम्न उच्च मध्यम वर्ग वाले इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाने के लिए डालडा कम्पनी वाले यहाँ पोस्टआफिस के बाहर बाकायदा स्टाल लगाकर वहीं हल्वा बनाने और लोगों को मनुहार कर फ्री में खिलाने की बात बुजुर्गों से सुनी है।और इसके बाद लगभग घर मेंं इसने  तब तक अपना जलवा कायम रखा जब तक इसका प्रतिद्वंद्वी "रथ" वनस्पति बाजार में नहीं आया।डालडा के साथ एक मजेदार किवदंती और थी कि डालडा की रसोई खाने के बाद चाय पीली जाए तो यह जल्दी पच जाता है तो एक समय की चाय के चलन वाले उस दौर में किसी आयोजन की अथवा तीज त्योहार की रसोई खाने के बाद दुबारा चाय मिलने का आनन्द ही कुछ और होता था।आपका आत्मकथ्य लेख अच्छा और सराहनीय है।Arun OswalHariom GaurAnand BhatnagarSuchetan Bhatnagarइस घी की बात ही अलग थी हुजूर)#संस्मरण / #प्रणयमेरे साथ के जी नहीं मुझसे पुराने लोग #टीन के इस #डिब्बे से बख़ूबी वाकिफ़ होंगे। ये हमारे दौर के निम्न मध्यम व निम्न ही नहीं उच्च वर्ग  का भी पसंदीदा घी था। जिसे #डालडा के नाम से देश भर में पहचाना जाता था। डालडा यानि वनस्पति तेल से निर्मित शुद्ध, स्वादिष्ट व दानेदार घी। जिनके बज़ट में शुद्ध देशी नहीं आता था। उनके लिए यह एक शानदार और #किफ़ायती_विकल्प था। एक और पांच किग्रा वज़न के डिब्बों में यह आता था। जो बाद में 15 किग्रा के कनस्तर में भी आने लगा। #सीधी_उंगली_से_घी_नहीं_निकलता वाली कहावत शायद तभी जन्मी होगी। हमारा बचपन इस घी पर काफ़ी हद तक निर्भर रहा। लिहाजा इस का स्वाद आज भी याद है। परांठों के लिए तो यह चिकनाई का एक माध्यम था ही। बासी रोटी निपटाने में भी मददगार था। इसे गर्म कर के एक बासी रोटी पर लगाना। फिर नमक और मिर्च बुरक कर दूसरी रोटी पर चुपड़ना रोज़ का काम था। रोटी की पुंगी बना कर खाना और अघाना भी दिनचर्या का अंग। इस घी ने ना कभी पेट बिगाड़ा, ना कोई और व्याधि दी। इससे घर परिवार का नाता सालों तक रहा। बाद में इसकी जगह तमाम ब्रांड आते गए और यह रसोई से ग़ायब हो गया। यह अलग बात है कि इसकी गुणवत्ता और स्वाद को कोई भी ब्रांड आज तक चुनौती नहीं दे पाया है। कम से कम दस सदस्यों की मौजूदगी वाले मेरे घर में डालडा का उपयोग दो दशक से भी ज़्यादा समय तक हुआ। वजह थी शाम को पक्का भोजन बनना। सुबह चौके में लक़ीर खींच कर कच्चा भोजन दादी या बुआ बनाती थीं। शाम को पक्का भोजन मम्मी। दादी और बड़ी बुआ मम्मी के हाथों बना कच्चा भोजन (जिसे "सकरा" कहते थे) नहीं करती थीं। इसके पीछे की वजह आज तक नहीं पता। बस इतना याद है कि सुबह रोटी तो शाम को तिकोने व गोल परांठे बनाए जाने की परंपरा घर में प्रचलित थी। मज़ेदार बात यह थी कि रसोई में खड़िया से खींची गई लक़ीर किसी लक्ष्मण-रेखा से कम नहीं थी। किसी की मजाल नहीं थी कि उस लक़ीर को छू भी पाए। चूल्हे की आंच पर बनने वाली रोटी एक-एक कर लक़ीर से बाहर आती और बारी-बारी से मिलती। इस चक्कर में रोटियां कुछ ज़्यादा ही खाने में आतीं। ज़ोर की भूख लगने या सब्र न हो पाने की स्थिति में हम भाई अपनी थाली की रोटी की अधबंटाई भी कर लेते थे। भूख और बेसब्री का एक कारण भोजन बनने में होने वाली देरी भी होता था। जिसके पीछे की वजह दादी व बुआ का पूजा-पाठ व नियमित सत्संग भी था। जिसका केंद्र घर से सटा गीता भवन होता था। अवसर रात के बचे परांठे सुबह अचार के साथ निपटाए जाते थे। सुबह की बची रोटी दोपहर बाद डालडा चुपड़कर खाई जाती थी। अन्न के प्रति आदर का भाव होता था। क्योंकि उसकी क़ीमत का अंदाज़ा था। शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में बनने वाली पूड़ियाँ भी गुजिया जैसे अन्य पकवानों की तरह इसी घी में तली जाती थीं। बची हुई पूड़ियों को धूप में सुखा कर रखने और पतले दही में गलाने के बाद मिर्च, नमक डाल कर खाने का भी अलग मज़ा था। यह प्रयोग बरसों बाद देशी घी से निर्मित पूड़ियों पर भी कर के देखा। यक़ीन मानिए, वो स्वाद आया ही नहीं। बासी रोटी पर देशी घी के साथ नमक, मिर्च लगा कर खाने में वो लुत्फ़ नहीं मिला, जो बचपन में मिलता था। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में गिरावट का यह नायाब उदाहरण हो सकता है। हम दावे से कह सकते हैं कि तब का नक़ली घी आज के असली घी से कई दर्जा बेहतर था। बताते हैं कि सन 1930 के आसपास यह घी नीदरलैंड से भारत आया। जहां डाडा एंड कंपनी इसे बनाती थी। इसकी पहचान हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल के रूप में हुई। भारत में इसे शुद्ध देशी घी के सस्ते विकल्प के रूप में स्वीकारा गया और यह देखते ही देखते रसोई का राजा बन गया। यहां इसकी बिक्री व खपत ज़ोर की रही। तो इसका निर्माण भी यहीं होने लगा। डाडा के बीच हिंदुस्तान लीवर लि. का "एल" जुड़ा और इसका नाम #डांडा से #डालडा हो गया। इस ब्रांड की स्वीकार्यता और महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज किसी भी ब्रांड के वनस्पति घी को डालडा ही कहा जाता है। ठीक वैसे ही जैसे लोहे की हर आलमारी #गोदरेज_की_आलमारी कहलाती है। उम्मीद है नक़ली घी के ज़ायके की ये असली दास्तान आज की पीढ़ी को भी लुभाएगी। वहीं पुरानी पीढ़ी इस संस्मरण की सत्यता पर पुष्टि की मोहर लगाएगी।                       #प्रणय_प्रभात(आपके अनुभव इस लेख में कुछ बातें और भी जुड़वा सकते हैं। जैसे आदरणीय भाई साहब श्री अरुण ओसवाल जी की मेरे इस लेख पर यह सटीक प्रतिक्रिया, जो अपने आप में इस लेख के अगले हिस्से की तरह रोचक एवं पठनीय है। पढ़िए आप भी :-#श्री_अरुण_जी_ओसवाल_उवाचःवाह प्रभात जी ...."दास्तांने डालडा ओर उसकी निजी जीवन में  उपयोगिता"  शानदार आत्मकथ्य। इस डालडा ने उन तमाम परिवारों की आबरु भी बचायी जो शुद्ध घी के अभाव में किसी के सामने रूखी रोटी खाने मेंं शर्मिंदगी महसूस करते थे। इस घी की लोकप्रियता का आलम यह था कि बडे नाम वालों के यहाँ भी थेलों में छिपकर जाते हुए देखा है।कभी वनस्पति घी के नाम से प्रचलित हेय दृष्टि से देखे जाने वाले इस घी के हर घर तक पहुंच बनाने के किस्से भी कम दिलचस्प नहीं रहे।ग्रामीण परिवेश और कुछ गिने चुने सम्पन्न लोगों को छोड कर अधिकांश निम्न उच्च मध्यम वर्ग वाले इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाने के लिए डालडा कम्पनी वाले यहाँ पोस्टआफिस के बाहर बाकायदा स्टाल लगाकर वहीं हल्वा बनाने और लोगों को मनुहार कर फ्री में खिलाने की बात बुजुर्गों से सुनी है।और इसके बाद लगभग घर मेंं इसने  तब तक अपना जलवा कायम रखा जब तक इसका प्रतिद्वंद्वी "रथ" वनस्पति बाजार में नहीं आया।डालडा के साथ एक मजेदार किवदंती और थी कि डालडा की रसोई खाने के बाद चाय पीली जाए तो यह जल्दी पच जाता है तो एक समय की चाय के चलन वाले उस दौर में किसी आयोजन की अथवा तीज त्योहार की रसोई खाने के बाद दुबारा चाय मिलने का आनन्द ही कुछ और होता था।आपका आत्मकथ्य लेख अच्छा और सराहनीय है।Arun OswalHariom GaurAnand BhatnagarSuchetan Bhatnagar मुझसे पुराने लोग #टीन के इस #डिब्बे से बख़ूबी वाकिफ़ होंगे। ये हमारे दौर के निम्न मध्यम व निम्न ही नहीं उच्च वर्ग  का भी पसंदीदा घी था। जिसे #डालडा के नाम से देश भर में पहचाना जाता था। डालडा यानि वनस्पति तेल से निर्मित शुद्ध, स्वादिष्ट व दानेदार घी। जिनके बज़ट में शुद्ध देशी नहीं आता था। उनके लिए यह एक शानदार और #किफ़ायती_विकल्प था। एक और पांच किग्रा वज़न के डिब्बों में यह आता था। जो बाद में 15 किग्रा के कनस्तर में भी आने लगा। #सीधी_उंगली_से_घी_नहीं_निकलता वाली कहावत शायद तभी जन्मी होगी। हमारा बचपन इस घी पर काफ़ी हद तक निर्भर रहा। लिहाजा इस का स्वाद आज भी याद है। परांठों के लिए तो यह चिकनाई का एक माध्यम था ही। बासी रोटी निपटाने में भी मददगार था। इसे गर्म कर के एक बासी रोटी पर लगाना। फिर नमक और मिर्च बुरक कर दूसरी रोटी पर चुपड़ना रोज़ का काम था। रोटी की पुंगी बना कर खाना और अघाना भी दिनचर्या का अंग। इस घी ने ना कभी पेट बिगाड़ा, ना कोई और व्याधि दी। इससे घर परिवार का नाता सालों तक रहा। बाद में इसकी जगह तमाम ब्रांड आते गए और यह रसोई से ग़ायब हो गया। यह अलग बात है कि इसकी गुणवत्ता और स्वाद को कोई भी ब्रांड आज तक चुनौती नहीं दे पाया है। कम से कम दस सदस्यों की मौजूदगी वाले मेरे घर में डालडा का उपयोग दो दशक से भी ज़्यादा समय तक हुआ। वजह थी शाम को पक्का भोजन बनना। सुबह चौके में लक़ीर खींच कर कच्चा भोजन दादी या बुआ बनाती थीं। शाम को पक्का भोजन मम्मी। दादी और बड़ी बुआ मम्मी के हाथों बना कच्चा भोजन (जिसे "सकरा" कहते थे) नहीं करती थीं। इसके पीछे की वजह आज तक नहीं पता। बस इतना याद है कि सुबह रोटी तो शाम को तिकोने व गोल परांठे बनाए जाने की परंपरा घर में प्रचलित थी। मज़ेदार बात यह थी कि रसोई में खड़िया से खींची गई लक़ीर किसी लक्ष्मण-रेखा से कम नहीं थी। किसी की मजाल नहीं थी कि उस लक़ीर को छू भी पाए। चूल्हे की आंच पर बनने वाली रोटी एक-एक कर लक़ीर से बाहर आती और बारी-बारी से मिलती। इस चक्कर में रोटियां कुछ ज़्यादा ही खाने में आतीं। ज़ोर की भूख लगने या सब्र न हो पाने की स्थिति में हम भाई अपनी थाली की रोटी की अधबंटाई भी कर लेते थे। भूख और बेसब्री का एक कारण भोजन बनने में होने वाली देरी भी होता था। जिसके पीछे की वजह दादी व बुआ का पूजा-पाठ व नियमित सत्संग भी था। जिसका केंद्र घर से सटा गीता भवन होता था। अवसर रात के बचे परांठे सुबह अचार के साथ निपटाए जाते थे। सुबह की बची रोटी दोपहर बाद डालडा चुपड़कर खाई जाती थी। अन्न के प्रति आदर का भाव होता था। क्योंकि उसकी क़ीमत का अंदाज़ा था। शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में बनने वाली पूड़ियाँ भी गुजिया जैसे अन्य पकवानों की तरह इसी घी में तली जाती थीं। बची हुई पूड़ियों को धूप में सुखा कर रखने और पतले दही में गलाने के बाद मिर्च, नमक डाल कर खाने का भी अलग मज़ा था। यह प्रयोग बरसों बाद देशी घी से निर्मित पूड़ियों पर भी कर के देखा। यक़ीन मानिए, वो स्वाद आया ही नहीं। बासी रोटी पर देशी घी के साथ नमक, मिर्च लगा कर खाने में वो लुत्फ़ नहीं मिला, जो बचपन में मिलता था। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में गिरावट का यह नायाब उदाहरण हो सकता है। हम दावे से कह सकते हैं कि तब का नक़ली घी आज के असली घी से कई दर्जा बेहतर था। बताते हैं कि सन 1930 के आसपास यह घी नीदरलैंड से भारत आया। जहां डाडा एंड कंपनी इसे बनाती थी। इसकी पहचान हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल के रूप में हुई। भारत में इसे शुद्ध देशी घी के सस्ते विकल्प के रूप में स्वीकारा गया और यह देखते ही देखते रसोई का राजा बन गया। यहां इसकी बिक्री व खपत ज़ोर की रही। तो इसका निर्माण भी यहीं होने लगा। डाडा के बीच हिंदुस्तान लीवर लि. का "एल" जुड़ा और इसका नाम #डांडा से #डालडा हो गया। इस ब्रांड की स्वीकार्यता और महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज किसी भी ब्रांड के वनस्पति घी को डालडा ही कहा जाता है। ठीक वैसे ही जैसे लोहे की हर आलमारी #गोदरेज_की_आलमारी कहलाती है। उम्मीद है नक़ली घी के ज़ायके की ये असली दास्तान आज की पीढ़ी को भी लुभाएगी। वहीं पुरानी पीढ़ी इस संस्मरण की सत्यता पर पुष्टि की मोहर लगाएगी।                       #प्रणय_प्रभात(आपके अनुभव इस लेख में कुछ बातें और भी जुड़वा सकते हैं

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