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Wednesday, May 20, 2020

#एक_ग़ज़ल_ऐसी_भी... 【प्रणय प्रभात】

■ कुछ तो ख़ूवी होगी प्यारे भारत की अँगनाई में।ऊँचे-ऊँचे दबे पड़े हैं मिट्टी की गहराई में।।"                ■ मैं बिस्मिल्ला बोल के भाई रामायण भी पढ़ देता।काश तुझे दिलचस्पी होती तुलसी की चौपाई में।।।                                      ■ हमने ऐसे-ऐसे मंज़र देखे हैं दिखलाए हैं।बीनाई तक शर्मसार है ख़ुद अपनी बीनाई में।।।              ■ रहबर वाले चोगे पर ख़ुद दाग़ लगा के कालिख़ का।लुत्फ़ ले रहे बूढ़े शातिरदेखो छुपम-छुपाई में।। ■ जो उधेड़ डाले हैं रिश्ते उनकी कुछ परवाह करो।दौर कड़ा सब को समझाता लग जाओ तुरपाई में।।  ■ महफ़िल में कहता तो तुमको लगता इज़्ज़त उतर गई।यही सोचकर समझाता हूँ आज तुम्हें तन्हाई में।।

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