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Sunday, May 24, 2020

आज_का_दिन_ऐतिहासिक ■ चार बलिदानों की नींव पर रखी गई बुनियाद। ब ■ आज 22 साल का हुआ हमारा अपना ज़िला श्योपुर। ■ भुला दिया गया लम्बे व कठिन संघर्ष का इतिहास। 【प्रणय प्रभात】

आज 25 मई को मध्यप्रदेश का सरहदी जिला 22 साल का यानि कि पूर्ण बालिग हो गया है। यह और बात है कि जिले की 22वीं सालगिरह को भी आम दिनों की तरह बिता दिया जाना पहले से तय था। इस खास दिन ना तो कोई आयोजन बीते 21 सालों की तरह हुआ। ना ही लोगों ने जिला निर्माण के संघर्ष और चार निरीह नागरिकों के बलिदान को याद किया। चार जिंदगियों के बलिदान और तमाम लोगों के संघर्ष का 47 साल पुराना वाकया भूली-बिसरी दास्तान बना रहा। गौरतलब है कि श्योपुर को जिला बनाए जाने की मांग वर्ष 1974 में शुरू हुई थी। समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ अभिभाषक रोशनलाल गुप्ता थे जो अब दुनिया में नहीं हैं। पूर्व विधायक तथा महामंत्री रामस्वरूप वर्मा का भी देहावसान हो चुका है। उपाध्यक्ष रहे वरिष्ठ अधिवक्ता देवीशंकर सिंहल तथा पूर्व विधायक सत्यभानु चौहान जिले के लिए जनसंघर्ष के गवाह आज भी हैं। मांग को प्रबल बनाने की कोशिशें तत्समय उपलब्ध संसाधनों के बलबूते जारी रही। जिला निर्माण हेतु गठित आंदोलन समिति को लगा कि सरकार सुनवाई के मूड में नहीं है। वर्ष 1975 में इसे जनांदोलन का रूप देते हुए अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन सूबात कचहरी के सामने शुरू कर दिया गया। - इसी दौरान 21 मई 1975 को आया वो काला दिन, जो बाद में इस मांग को आंच देने वाला भी रहा। सरकार से चर्चा के लिए भोपाल गया आंदोलनकारियों का शिष्टमंडल मांग नामंजूर होने की मायूसी के साथ श्योपुर लौटा। धरना स्थल पर जमा बड़ौदा व श्योपुर के वाशिंदों में रोष व असंतोष व्याप्त हो गया। धरना खत्म करने का निर्णय लिए जाने के साथ डेरे-तंबू समेट लिए गए। आंदोलनकारियों की वापसी के दौरान चौपड़ बाजार स्थित स्टेट बैंक पर तैनात गार्ड को उपद्रव की आशंका हुई। इसी दौरान दो-चार पत्थर बैंक की ओर फेंके गए और जवाब में पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में चार निरपराध नागरिकों गप्पूमल वैश्य, वजीर खां, मुंशी हसन मोहम्मद और जुम्मा भाई का बलिदान हो गया। भीड़ बेकाबू हो गई और गुस्से की आग तत्कालीन न्यायालय व तहसील सूबात कचहरी तक जा पहुंची। फिर लगा दिया गया कफर््यू और शुरू हो गया पुलिस का तांडव, जिसकी जद में समूचा शहर आया। जिला निर्माण आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी करने वाले सर्वोदयी नेता मंगलदेव फक्कड़, समिति के सदस्य पं. रमाशंकर भारद्वाज, कैलाशनारायण गुप्ता, प्रेमचंद जैन, रामबाबू जाटव, शिवनारायण नागर, कैलाश सेन आदि को पुलिस ने घरों में घुसकर बर्बरता के साथ पीटा। - मामला शांत होने के बाद गोलीकांड की जांच के लिए जस्टिस एमएल मलिक की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया। आयोग ने तथ्यों व साक्ष्यों की सुनवाई करने के बाद माना कि जिला निर्माण की मांग जायज है। आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वालों ने सरकार पर दवाब बनाना एक बार फिर से शुरू कर दिया। श्योपुर आने वाले हरेक राजनेता से लेकर बड़े अधिकारियों तक को ज्ञापन देना इस लड़ाई का शांतिपूर्ण हिस्सा रहा। तमाम बार प्रतिनिधिमंडल राजधानी पहुंचकर प्रदेश के मुखियाओं से मिलते रहे। इसी मांग और दवाब का नतीजा जस्टिस बीआर दुबे की अध्यक्षता में गठित जिला पुनर्गठन बोर्ड के रूप में सामने आया। आंदोलन समिति के सदस्य और तत्कालीन युवा नेता कैलाशनारायण गुप्ता पहला आवेदन लेकर बोर्ड के सामने पहुंचे। इसके बाद बोर्ड के समक्ष मांगों और प्रस्तावों का अम्बार लगता रहा। श्योपुर के विकास के लिए अपेक्षित जिला निर्माण की मांग निरंतर जोर पकड़ती गई। - संभावनाऐं जिले की घोषणा को लेकर बनीं मगर एक कांग्रेसी नेता ने प्रदेश के राजकोष पर भार पडऩे का हवाला देेते हुए याचिका लगा दी। जिला निर्माण का रथ बीच रास्ते में अटक गया। कालांतर में कानूनी पेचीदगियां एक-एक कर खत्म होती चली गईं। जीत जनता के सामूहिक प्रयास और विश्वास की हुई। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि श्योपुर सहित 16 नए जिलों की घोषणा 1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा द्वारा की गई थी। ये और बात है कि भाजपा सरकार की इस घोषणा के खिलाफ कांग्रेसी नेता गुलाबचंद तामोट न्यायालय की शरण में चले गए। उनका तर्क था कि इतने जिलों के एक साथ गठन के बाद राजकोष पर भारी दवाब पड़ेगा। बाद में पटवा सरकार की इसी घोषणा को अमली जामा दिग्विजय सरकार ने पहनाया। - वर्ष 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांगे्रस सरकार ने प्रदेश में 16 नए जिलों के गठन का साहसिक फैसला किया। जिला निर्माण की घोषणा 21 मई 1998 को हुई और राजपत्र में अधिसूचना के प्रकाशन के साथ ही 25 मई को श्योपुर जिले का विधिवत लोकार्पण कर दिया गया। श्योपुर जिले के विधि-विधान से वजूद में आने का जोश जनमानस पर हावी रहा। दो-चार साल जिला निर्माण की सालगिरह भी मनाई गई। उसके बाद लोग इस सौगात के लिए हुए लंबे संघर्ष को भूल गए। लिहाजा 25 मई का एतिहासिक दिन आम दिनों की तरह गुजरता चला गया। - अब जिला उम्र के लिहाज से बालिग हो चुका है। यथार्थ के धरातल पर इसकी अवस्था एक बिगड़ैल किशोर के जैसी है। आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का अभाव जिले की रगों में समाया हुआ है। वजह राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक सभी प्रकार की हैं। बात विकास की करें तो भवनों और भौतिक संसाधनों की दौड़ में जिला काफी आगे जा चुका है। वनों की बहुलता, कृषि उत्पादन की विपुलता के साथ कला-संस्कृति और शांतिप्रियता जिले की पुरानी पहचान बरकरार रखे हुए है। बावजूद इसके मैदानी धरातल पर जिस तीव्रगामी विकास की दरकार थी उसका गति पकड़ पाना आब भी बाकी है। सरकार और उसके अलमबरदार हाल-फ़िलहाल सीमेंट कांक्रीट के जंगल खड़े कर ख़ुद को विकास का मसीहा साबित करने पर तुले हैं। आम लोगों की बुनियादी दिक़्क़तों के साथ युवाओं के लिए समुचित आजीविका के अभाव आज भी मुँह बाए खड़े हैं। लघु, कुटीर धंधों, व्यवसायों व उद्योगों के नाम पर जिला अब भी किसी बेवा की माँग की तरह सूना है। बरसों पुरानी सँकरी रेल लाइन के चौड़ीकरण का काम कछुआ चाल से चल रहा है। आमान परिवर्तन का मुद्दा आज भी अधर में है। कूनो वन्यजीव अभ्यारण्य की स्थापना ने विकास की जो आस जगाई थी। उस पर गुजरात सरकार की हठधर्मिता का ग्रहण लगा हुआ है। दुर्लभ प्रजाति के एशियाई शेरों को इस अभ्यारण्य में लाने के प्रयास नहीं के बराबर हैं। कृषि तथा वनोपज पर आधारित व्यवसाय व उद्योगों का वजूद में न आ पाना भी शर्मनाक है। देखना यह है कि भौतिकतावादी विकास की पगडंडी पर दौड़ता ज़िला असली विकास से रूबरू कब तक हो पाता है?
                【प्रणय प्रभात】
#पुनश्च:
आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना व लम्बा है। आलेख स्मृतियों व संग्रहित जानकारियों पर आधारित है। कुछ नहीं बहुत कुछ छूटा होगा। ख़ास कर कुछ महानुभावों के नाम। इस तरह की त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा याचना। सुझावों के अनुसार संशोधन की गुंजाइश सदैव रहती है। यहाँ भी है। मंतव्य एक साझा संघर्ष की दास्तान को रेखांकित करना है। किसी को महिमा-मंडित करना नहीं। विघ्नसंतोषी  जन कृपया सियासत की गंदगी यहाँ न फैलाएं।
Narendra Singh Tomar
Kailash Narayan Gupta
D.S. Singhal

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