Saturday, May 23, 2020
#नज़्म :--#एक_कहानी_है_रूमानी.…..! प्रणय प्रभात
वक़्त हो तो आइएइक #दास्तां सुन लीजिए।कुछ रुमानी #ख़्वाब अपनीआँख में बुन लीजिए।।#इश्क़ कैसे जागता हैजागती हैं #ख़्वाहिशें।दो #दिलों को किस तरह सेजोड़ती हैं #बारिशें।।आज भीगी सी है #रुतमहकी हुई सी #रात है।हम #जवां होने को थेये उन दिनों की #बात है।।था वो महीना #जून काहो कर चुकी #बरसात थी।थोड़ी #तपिश थी #आसमां पे#अब्र की #बारात थी।।#वाकिफ़ नहीं थे #इश्क़ सेना #आशिक़ी के रंग में।#मासूम सी इक #गुलबदनअल्हड़ सी #लड़की संग में।।#पहचान थी कुछ #रोज़ कीज़्यादा न जाना था उसे।था #हुक्म घर वालों का तो#घर छोड़ आना था उसे।।घर से निकल कुछ देर मेंकच्ची #सड़क पर आ गए।इके बार फिर से आसमां पेकाले #बादल छा गए।।घर दूर था उसका अभीरफ़्तार बेहद मंद थी।बरसात के आसार थेबहती हवा अब बंद थी।।मौसम के तेवर भांप केसंकोच अपना छोड़ कर।कुछ तेज़ चलिए ये कहामैने ही चुप्पी तोड़ कर।।ठिठकी, रुकी, बोली लगाझरना अचानक से बहा।मैंने सुना उस शोख़ ने इक अटपटा जुमला कहा।थे लफ़्ज़ मामूली मगर मानी दुधारी हो गए।बेसाख़्ता बोली वो मेरेपाँव भारी हो गए।।ये तो समझ आया नहींदिल आह बोले या कि वाह।मासूम से चेहरे पे उसकेथम गई मेरी निगाह।एकटक देखा उसेमौसम शराबी हो गया।मरमरी रूख शर्म से बेहद ग़ुलाबी हो गया।।पल भर में ख़ुद की बातख़ुद उसकी समझ मे आ गई।क्या कह गई ये सोच केवो नाज़नीं शरमा गई।।नीचे निगाहें झुक गई।लब भी लरज़ने लग गए।बरसात होने लग गईबादल गरजने लग गए।।नज़रों से नज़रें मिल गईंमाहौल में कुछ रस घुला।उसने दिखाया पाँव अपनाराज़ तब जाकर खुला।।गीली मिट्टी में मुझेलिथड़ी दिखीं जब जूतियां।पाँव भारी क्यों हुए थेये समझ आया मियां।।वाक़या छोटा था परइक ख़ास किस्सा हो गया।।मुख़्तसर सा वो सफ़रयादों का हिस्सा हो गया।। #प्रणय_प्रभात
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