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Friday, May 22, 2020

#ख़ुद_के_हवाले_से.... #आंकलन_ख़ुद_का_आह्वान_समस्त_अभिभावकों_का

(अपनी नस्लों की भलाई के लिए पढ़ें)बेशक़, मैं एक दोयम दर्जे का विद्यार्थी रहा। बेशक़, मेरी अंकसूचियों में प्राप्तांकों का ग्राफ़ (एक बार को छोड़ कर) कभी भी 50 फ़ीसदी से ऊपर नहीं उठ पाया। बेशक़, मैंने एक और दो विषय की पूरक परीक्षा में बैठने का लुत्फ़ चार बार लिया। बेशक़, मेरे शिक्षकों का नज़रिया मेरे भविष्य के प्रति अच्छा नहीं रह। बेशक़, मैं अकादमिक योग्यता के बलबूते कोई मुक़ाम हासिल नहीं कर पाया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरा दिमाग़ कुंद था। ऐसा भी नहीं था कि मैं पढ़ने-लिखने में कमज़ोर था। सुविफ या संसाधनों की कमी जैसे हालात से रूबरू माता-पिता ने कभी नहीं होने दिया। कमी कुछ रही तो उस समय और मार्गदर्शन की, जो औरों में बंट गया। संयुक्त परिवार की सभी ज़रूरतों की पूर्ति में जुटे पालकों को यह फुरसत वक़्त ने ही नहीं दी, कि प्रेरक या प्रोत्साहक बन पाते। रही-सही कसर संभावनाओं की तलाश को लेकर बरती गई उदासीनता ने पूरी कर दी। उन दिनों कैरियर काउंसिलिंग जैसी कोई प्रक्रिया भी नहीं थी। सन 1980 में मिडिल पास कर कक्षा 9 में दाखिला लेना था। तभी वाणिज्य (कॉमर्स) विषय वजूद में आया। इस विषय के बारे में कोई इल्म मुझे तो क्या मेरे माता-पिता तक को भी नहीं था। उन्होनें बस सहकर्मियों की सलाह मानी और सिर पर लाद दी वाणिज्य की पोटली। जब तक विषय को लेकर समझ व रुचि पैदा होती, मन स्वाध्याय, धर्म-संस्कृति और सृजन की ओर मुड़ चुका था। हायर सेकेंडरी की परीक्षा श्री गजेंद्र जैन भाई साहब की कृपा से एक बार में पास करना गुनाह बन गया। नतीजा ये निकला कि कॉलेज तक इस विषय ने पीछा नहीं छोड़ा और हमने गज्जू भाई साहब का। रो-पीट कर स्नातक होने के मोड़ तक आए तो फिर से एक अनचाहा अपराध आड़े आ गया। कॉलेज में स्नातकोत्तर (पीजी) कक्षाओं की शुरुआत के लिए कचहरी के बाहर आन्दोलम चला। दिन बीतने लगे परन्तु सुनवाई के आसार नहीं के बराबर बने रहे। आंदोलन साँप के मुँह में छछूंदर यानि गले की हड्डी बन गया। सीनियर छात्र एक दल बनाकर भोपाल कूच कर गए। डेरा-तम्बू हम  छुटमैयों के हाथ आ गया। क्रमिक धरना अब आपदा लगने लगा था सभी को। एक दिन कनात के पास लटके रोलप बोर्ड पर धरने का नेतृत्व मेरे नाम कर दिया गया। यह शायद संयोग रहा कि मज़ाक़ मज़ाक़ में किया गया यह काम मज़ाक़ बनने से बच गया। दोपहर तक पता चला कि कुछ मांगें मां ली गई हैं। सीनियर्स ने बाक़ायदा धरना उठाने का एलान किया। बतौर नेता दो-चार फूल मालाओं के साथ एक गिलास जूस हमें नसीब हुआ। अव शीघ्र शुरू होने जा रही कॉमर्स की पीजी क्लास में प्रवेश लेना अपनी नैतिक जिम्मेदारी बन चुका था। एक दिन सेहरा बंधने की सज़ा दो साल भुगतनी पड़ी। नतीज़ा वही ढाक के तीन पात। थर्ड क्लास स्टूडेंट का तमगा अपने ही क़ब्ज़े में बना रहा। इस तरह जीवन के वो आठ साल वाणिज्य की वेदी में होम हो गए, जो भविष्य के निर्धारक साबित होने थे। अब लगता है कि उस दौर में ट्रेक बदलने की थोड़ी समझ और गंभीरता खुद के ही पास होती। काश #तारे_ज़मीं_पर और #थ्री_इडियट्स टाइप की फिल्म उस दौर में बनी होतीं। साथ ही उन्हें देखने की मोहलत माता-पिता को मिल गई होती। संभव था कि कला के क्षेत्र में भविष्य निर्माण संभव हो पाता। बहुत बड़े #तुर्रम_खां बेशक़ नहीं बन पाते। ना ही अपने नाम का झंडा माउंट एवरेस्ट की चोटी पर लहराता। मगर उतने उपेक्षित भी नहीं रहते, जितने रहे। जिस समाज में #कायस्थ_का_बच्चा_पढ़ा_भला_या_मरा_भला जैसी कहावत प्रचलित हो। जिस समाज में पद के अनुसार पूछ-परख मिलती हो। उस समाज और खानदान में सरकारी नौकरी के बिना पूछ होने का सवाल ही नहीं। सामाजिक व सार्वजनिक क्षेत्र में योगदान के लिए एक अच्छा पद अनिवार्य होता है। जो बेहतरीन अकादमिक पृष्ठभूमि के गर्भ से उपजता है। इन कड़वे तजुर्बों की टीस ने सोचने पर बाध्य किया। तब लगा कि जिन्हें #जाम्बुवान बन कर भूली शक्ति का आभास कराना था, वो पूरी कर्मठता के साथ औरों के पौधों की सिंचाई में जुटे थे। कुछ साल पानी का पाइप हमारे भी हाथ में रहा। पराई धरती के सारे पौधे सरसब्ज़ होते हुए छतनार वृक्ष बन गए। यह और बात है कि बरगद पनपाने की इस कोशिश में अपनी ही जड़ें सूखती चली गईं। हालांकि कालांतर में कुछ और योग्यताएं अपने बलबूते अर्जित कीं। यह और बात है कि तब तक भविष्य को दिशा देने की उम्र बीत चुकी थी। जीवन निर्वाह के लिए बाद में जो किया वो शर्म नहीं गर्व का विषय है। सेवा का जो अवसर मिला वो ईश्वरीय कृपा मान कर स्वीकार किया। थोड़ी-बहुत पहचान भी उसी की प्रेरणा व अनुकम्पा से मिली। जीवन के प्रति क्षोभ या असन्तोष का भाव लेशमात्र भी नहीं है। यह सब लिखने का मक़सद ना किस्मत को कोसना है, ना उलाहना देना। मंशा केवल माँ-बापों को आगाह कराने की है। उन्हें यह बताने की है कि अपनी संतानों को केवल सुविधा ब संसाधन देकर अपने दायित्व की इतिश्री ना करें। उनकी क्षमता व योग्यता का आंकलन करते हुए उनकी रुचि, अभिरुचि को पहचानें। उनके अच्छे भविष्य की संभावनाओं को समय रहते परखें। उन्हें उनके हिस्से के उस समय व प्रोत्साहन से वंचित न करें, जो कोई और नहीं दे सकता। याद रहे कि मंदिर या मस्जिद में दिया जलाना भी तभी सार्थक है जव ख़ुद का घर रोशन हो। अपनी बात का समापन अपने ही एक शेर के साथ करता हूँ अव, जो इस लेख को लिखने की वजह बना। अर्ज़ करता हूँ कि -"मैंने इतनी बार खोई हैं सफ़र में मंज़िलें।अब भटकते देख के औरों को डर जाता हूँ मैं।।"        इति। कल्याणमस्तु।।                         #प्रणय_प्रभात

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