Friday, May 22, 2020
आओ हम एक गैंग बनाएं.... मंचों की अनंत सच्चाई पर एक अंतहीन कविता #प्रणय_प्रभात°
आओ, हम एक गैंग बनाऐं।सारी दुनिया रखें ताक पर, एक दूसरे की खुजलाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं।। ■तू मेरी, मैं तेरी गाऊं, हां में हां ही सिर्फ मिलाऊं।तू मेरा ग्राइप-वाटर बन,मैं तेरी घुट्टी बन जाऊं।।अपना राग अलग से रेंकें, अपनी ढपली अलग बजाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ आपस में ही कर लें बकबक,एक कुऐं के बन कर मेंढक।बजा करें जग के नक्कारे,सुनें एक दूजे की धक-धक।।राग बेसुरी होवे बेशक, मगर ताल से ताल मिलाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ जैसे-तैसे नाम कर लिया,हमने अपना काम कर लिया।गीत मुन्नियों पे रच-रच कर,खुद को झण्डू बाम कर लिया।।पीठ थपक लें अब आपस में, आपस में ही होड़ लगाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ माइक अपना, मंच हमारा,हर ठेके में, वारा-न्यारा।जीत गया तो अपना जीता,हार गया तो अपना हारा।।पानी में ही तलें पकोड़ी, गुड़ की जगह गुलगुले खाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ नया भोज, सब्जी बासी दें,खूब चपत, अच्छी-खासी दें।जोड़-जुगाड़ लगाकर धमकें,आपस में ही शाबासी दें।।चिकनाई पर फिसले दुनिया, आज घड़े चिकने बन जाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं।#अंततः (एक बहुचर्चित कविता का पैमाना उठाने के लिए मान. अटलबिहारी बाजपेयी जी की आत्मा से अग्रिम क्षमा-याचना,,,, जिन्हें मिर्ची लगे उन्हें यह सलाह है कि एक बार अपने गिरहबान में जरूर झांकें, फिर जो चाहें, जहां चाहें, जमकर फांकें। #रचनात्मक_गिरोह_और_स्वयम्भू_सरगना
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