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Saturday, May 23, 2020

#संस्मरण छोले_के_पत्ते_पर_रबड़ी_वाली_बर्फ़(उस स्वाद का आज भी नहीं कोई मुक़ाबला) 【प्रणय प्रभात】

एक छोटे से क़द का सीधा-सादा सा बुजुर्ग। उसके कंधे पर लटका चमकीले नीले रंग का बड़ा सा थर्मस फ्लास्क। थर्मस में ऊपर तक जमी ठंडी-ठंडी रबड़ी वाली बर्फ। आप में से बहुतों को याद आ रहा होगा वो थर्मस। जिसका ढक्कन बड़े सलीके से खोला जाता। हम बच्चे  ललचाई सी नज़र से उसमें भरी रबड़ी बर्फ़ को ताकते। बुजुर्ग एक चाकू से रबड़ी वाली बर्फ़ की एक परत काटता। उसे छोले के हरे पत्ते पर रखता और पत्ता हाथों में थमा देता। दस और बीस पैसे में मिलने वाली इस रबड़ी वाली बर्फ़ का लुत्फ़ हमनें सन 1973-74 में लिया। कसम से, वो अनूठा और विशुद्ध स्वाद आज तक ज़ुबान भूली नहीं है। लच्छेदार रबड़ी बर्फ़ कैसे और कहाँ बनती थी यह आज तक नहीं पता। याद है तो बस इतना कि हम उसका स्वाद पारख जी के बाग़ में लेते थे। छुट्टी वाले दिन टोड़ी बाज़ार से जुड़ीं गलियों में भी। जिनमें से एक गली में हमारा घर हुआ करता था। उस गली को छोड़ने के बाद भी यह रबड़ी बर्फ़ साल में एक बार नसीब होती रही। शायद अगले चार-छह साल तक। मौक़ा होता था चैत्र शुक्ल तीज का। जब वस्त्राभूषणों से सुसज्जित महिलाएं गणगौर पूजन के बाद पारख जी के बाग में जमा होती थीं। अलग-अलग समूहों में बंटी महिलाएं लोकगीत गाते हुए जम कर नृत्य करतीं। साथ आई बाल मंडली इस मेले जैसे माहौल का मज़ा लेती। बाग़ के बीच वाले गलियारे में चाट-पकोड़ी और कुल्फी के ठेलों सहित बच्चोँ को ललचाने वाले तमाम आइटम उपलब्ध होते थे। जिनमें घूमने वाली फिरकियाँ, भोंपू, सरकंडे के फोल्डिंग साँप, लाल पन्नी वाले गत्ते के चश्मे, बम्बई की मिठाई और बुढ़िया के रंग-बिरंगे बाल ख़ास थे। इसी भीड़ के बीच गूंजती रहती थी रबड़ी वाली ठंडी बर्फ़ की आवाज़। जो सब की ख़ास पसंद थी। धीरे-धीरे इस बर्फ़ की जगह दूध-मावे वाली कुल्फी और रंगीन पानी वाली चुस्की ने ले ली। जो स्थानीय स्तर पर बनाई और बेची जाती थीं। कुछ सालों बाद बाज़ार पर ब्रांडेड आइसक्रीम का कब्ज़ा हो गया। चुस्की, कुल्फ़ी और कम्पनियों की आइसक्रीम के बीच आज भी मुक़ाबला जारी है। वक़्त के साथ अगर कुछ गुम हुआ है तो वो बड़ा सा नीला थर्मस, जिसमें भरी बर्फ़ के स्वाद को टक्कर देने वाली कोई आइसक्रीम आज भी बाज़ार में नहीं है। थर्मस वाली उस बर्फ़ को बेचने वाले उस इकलौते बुजुर्ग के साथ ही वो स्वाद भी अतीत की वादियों में कहीं गुम हो गया। जिसकी अब मुझ जैसे लोग बस चर्चा ही कर सकते हैं। छोले के हरे पत्तों से बनने वाले पर्यावरण मित्र दोने भी अब कहीं नज़र नहीं आते। जो एक समय घरेलू उद्योग का आधार होते थे। कुल मिला कर हरे-भरे पत्ते पर लच्छेदार बर्फ़ अब स्मृति का विषय है। जो कभी नहीं धुंधला सकता।😋😋😋😋😋😋😋😋😋😋

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