Saturday, May 23, 2020
#लघुकथा / #संतुष्टि 【प्रणय प्रभात】
रोहन आज बड़ा खिन्न था। खिन्नता की वजह था उसका सहपाठी तरुण। जो अरसे बाद आज अचानक बाज़ार में टकराया। पता चला कि दुबई में इंजीनियर है। ठाठ-बाट की ज़िंदगी जी रहा है। वही तरुण जो ख़ुद का लिखा नहीं पढ़ पाता था। किस्मत को कोसता रोहन चल नहीं रहा था। क़दम घसीट रहा था। अचानक सड़क किनारे लगे ठेले पर पॉपकॉर्न बना कर बेचने वाले ने नमस्कार ठोका। उसी ने रोहन के पशोपेश को अपना परिचय देते हुए दूर किया। पता चला कि वो उसका सहपाठी हेतराम है। दिन भर में डेढ़ सौ रुपए कमा पाता है। हर महीने 50 हज़ार रुपए पगार पाने वाला रोहन संतुष्ट था। अब उसे अपनी तक़दीर पर कोई नाराज़गी नहीं थी।
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