रामदयाल को बहुत दिनों से बाबूलाल की तलाश थी। उसे उधार दिए हुए हज़ार रुपए जो वसूलने थे। तीन महीनों के लॉकडाउन ने कड़कनाथ अलग से बना रखा था। अचानक उसकी आँखों में चमक आई। बाबूलाल सामने से चला आ रहा था। पास आते ही दोनों की नजरें मिलीं। बाबूलाल ने अचानक मास्क पर मुट्ठी लगा कर ज़ोर ज़ोर से खाँसना चालू कर दिया। तक़ाज़े के शब्द बेचारे रामदयाल के गले में ही घुट कर रह गए। उसने कन्नी काट कर बग़ल से गुज़र जाने में ही ख़ैर समझी। दूसरी ओर बाबूलाल कोरोना को मन ही मन धन्यवाद देता जा रहा था।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊
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