Powered By Blogger

Thursday, May 21, 2020

#लघुकथा / #नुस्खा 【प्रणय प्रभात】

रायबहादुर ज्ञानचंद आज #पशोपेश में थे। कोई #परिचित उनके अपने शहर में फंसा हुआ था। सुबह से दो बार #कॉल आ चुकी थी। #मदद की आस में तीसरा कॉल आना तय था। बेचैनी से टहलते #ज्ञानचंद जी के चेहरे पर अकस्मात एक #चमक उभरी। उन्होंने बेशक़ीमती सेंटर टेबल पर पड़े अपने #मोबाइल को उठाया। उसे तुरंत #एरोप्लेन_मोड में डाला। मोबाइल को फिर टेबल पर रखते हुए वे नर्म सोफे में धँस चुके थे। शरीर आराम की मुद्रा में था और आँखें बंद। दिमाग़ पूरी तरह #टेंशन_फ्री हो चुका था। महसूस हो रहा था कि वो सचमुच #हवाई_सफ़र पर ही हैं।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

No comments:

Post a Comment