Friday, May 22, 2020
#प्रसंगवश :- जा की रही भावना जैसी..... (जो #सोचोगे ना, वही #सूझेगा श्रीमान)"
एक हलवाई अपनी दुकान पर रोज़ की तरह जलेबियाँ बनाने में मशगूल था। ग्राहकों को संभालने के लिए पास ही उसके कुछ सहयोगी बैठे थे। जलेबी के थाल के पास ताज़े दही का एक कुंडा रखा था। जिसकी मलाई पर एक कौए की नज़र थी। कौआ झपट्टा मारने वाले अंदाज़ में कुंडे की ओर लपकता था। सतर्क नौकर तुरन्त उसे लाठी फटकार कर उड़ा देते थे। यह सिलसिला देर तक चलता रहा। नौकर कौए की ढीठता से परेशान हो चुके थे। अब एक नौकर लाठी लेकर तैयार था। इंतज़ार कौए के पास आने का था। इस बार चाल कामयाब रही। पास आया कौआ लाठी की जद में आ गया और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। इस घटना के तमाम गवाहों में एक कवि भी था। जो इस घटना से काफ़ी आहत हुआ। उसने भट्टी के पास पड़ा एक कोयला उठाया और दीवार पर एक पंक्ति लिख दी। जो कुछ इस तरह थी-#काग_दही_पर_प्राण_गँवायो। अर्थात कौए ने दही के लिए प्राण गंवा दिए। कवि के वहां से जाने के बाद एक सरकारी बाबू दुकान पर आया। जो स्तकारी कागज़ों की हेराफेरी के मामले में निलंबित चल रहा था। उसकी नज़र दीवार पर लिखी पंक्ति पर गई। उसने कूच करते हुए पंक्ति को यूं पढ़ा- #कागद_ही_पर_प्राण_गँवायो। अर्थात कागज़ के चक्कर में मारा गया। कुछ देर बाद दुकान पर एक मनचला युवक आया। जिसकी कुछ ही समय पहले एक युवती के बाप और भाइयों ने जमकर कुटाई की थी। संयोग से कुटे-पिटे युवक का ध्यान भी पंक्ति पर गया। उसने पंक्ति को अपने हिसाब से कुछ ऐसे पढ़ा- #का_गदही_पर_प्राण_गँवायो।अर्थात क्यों गधी (गधैया) के चक्कर मे पिटा।कुल मिला कर सारा खेल आपके नज़रिए का है। आपको जो कुछ दिखता या सूझता है। उस पर आपके हालात और मनोभावों का असर होता है।। प्रस्तुति- #प्रणय_प्रभात
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