Friday, May 22, 2020
एक्सक्लूसिव्ह :- संकरी पटरियों पर लगातार जारी है मौत का सफर। अनगिनत मुसाफिरों की जिंदगी से खिलवाड़ मजबूरी में मवेशी बनने पर मजबूर हैं यात्री। (प्रभात प्रणय)"
घर से निकलो तो पता जेब में रख के निकलो।हादसा चेहरों की पहचान मिटा देता है..........।।"हिन्दुस्तान के नामचीन शायर डॉ. बशीर बद्र का यह चर्चित शेर सौ फीसदी सटीक साबित होता है श्योपुर से ग्वालियर के बीच बेनागा दौड़ती उस छुकछुक गाड़ी के वजूद पर जो अपने अस्तित्व पर हावी अनगिनत मुसाफिरों के लिये सफर का इकलौता माध्यम होने के साथ-साथ सफर की दुरूहता और जीवन के लिए जोखिम का भी पर्याय बनी हुई हैै। लोहे की संकरी पटरियों पर निर्भर छोटे-छोटे पहियों पर टिकी चंद डिब्बानुमा बोगियों में अन्दर से लेकर दरवाजे के पायदान, कपलिंक और छत तक सम्पूर्ण साहस व दक्षता के साथ लदी सवारियों से भरपूर बेनागा सफर पर रवाना होने वाली इस टे्रन का जहां अपना एक समृद्घ इतिहास भी हैै और शर्मनाक वर्तमान भी, जिस पर विचार किये जाने की संभावनाओं व आवश्यकताओं के बावजूद आज तक उतनी शिद्दत से विचार नहीं किया गया हैै जो समय की मांग भी है और न्यायोचित भी। मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिला मुख्यालय के रूप में अधोसंरचनात्मक विकास के मामले में लगभग सभी मोर्चों पर ठगे से नजर आने वाले श्योपुर जिला मुख्यालय स्थित प्राचीन स्टेशन से शुरू होने वाले छोटी रेल के इस सफर पर नजर डाली जाये तो सहज ही यह देखा, समझा और जाना जा सकता है कि जान हथेली पर लेकर यात्रा के लिये निकलने वाले उन हजारों यात्रियों को अदम्य शौर्य व पराक्रम के एवज में कोई पुरूस्कार जरूर दिया जा सकता है जो चाहे-अनचाहे इस रेल पर सवार होते हैैं। यहां उल्लेखनीय है कि श्योपुर से ग्वालियर के बीच परिवहन के लिये प्रायवेट कम्पनियों की बसों और सड़क मार्ग के बावजूद छोटे-बड़े ऐसे गांवों की संख्या सैंकड़ों में है जहां के हजारों लोग आवागमन के लिये इसी गाड़ी के वजूद पर निर्भर हैैं तथा अपनी इसी मजबूरी के चलते मवेशियों की तरह लगभग ठुंसने वाले अंदाज में सफर पर विवश हैं। श्योपुर से सबलगढ़ और ग्वालियर तक सुबह और दोपहर की पारियों में दो-दो गाडिय़ों के परम्परागत चक्करों पर टिका जिले का रेलवे यातायात कितना दुर्गम और जोखिम भरा हैै इसका अंदाजा केवल संचालित होने वाली गाडिय़ों और सवारियों की हालत से नहीं उन पुल-पुलियाओं की स्थिति से भी आसानी से लगाया जा सकता हैै जिन पर से गुजरकर यह छुकछुक गाड़ी अपने गंतव्य तक पहुंचती हैै। आजादी से बरसों पहले अंग्रेजों द्वारा बनवाये गये पुलों से होकर मंजिल की ओर कूच करने वाली यह गाड़ी वस्तुत: सिंधिया राजवंश की धरोहर के रूप में मान्य की जाती हैै, जिसे आम जनता की मांग के अनुसार आमान परिवर्तन करते हुऐ आधुनिक रूप दिये जाने के वायदों व आश्वासनों का बोझ जनजीवन की सोच पर हावी बना हुआ हैै। *** दावे, वादे, आडम्बर, आश्वासन और घोषणाऐं.....यह बात अलग है कि प्रदेश से लेकर देश तक पर काबिज इंका व भाजपा के नामचीन राजनेताओं के वादों, दावों, आडम्बरों, आश्वासनों और घोषणाओं के बावजूद इस गाड़ी का वजूद पूर्ववत कामचलाऊ बना हुआ हैै तथा आम लोगों के लिये आवागमन का यह साधन हमेशा की तरह खास साबित होता आ रहा हैै। आये-दिन किसी न किसी तरह की छोटी-बड़ी घटनाओं की साक्षी बनने तथा चलते-चलते राह में पसर जाने वाली इस गाड़ी के मुसाफिरों के लिये सुविधा नाम की कोई चीज बेशक उपलब्ध न हो किन्तु दुविधा उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों और परेशानियों का कहीं कोई टोटा नहीं हैै। स्टेशनों की हालत से लेकर रेल की बोगियों की हालत का मिलान आसानी से किया जा सकता है और इसी के आधार पर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है उन बेहिसाब यात्रियों की जान-माल की सलामती की संभावनाओं का, जो भगवान की कृपा पर निर्भर है। फिलहाल लब्बो-लुआब इतना सा है कि एक गौरवशाली अतीत रखने वाली इस छुकछुक गाड़ी का वर्तमान बेहाल हैै और अपने भविष्य की सलामती के लिये उस तंत्र की ओर आशा भरी नजरों से निहार रहा हैै, जो हजारों जिन्दगियों की सुरक्षा को लेकर लगातार बेपरवाह बना हुआ हैै तथा शायद आगे भी बना रहेगा। ऐसे में समय का तकाजा यही है कि आम यात्री अपनी किस्मत और अपने ईष्टï के भरोसे सफर पर निकलें और उनके बाल-बच्चे उनके सकुशल गंतव्य तक पहुंचने की प्रार्थना करें, जो प्राय: करते भी हैैं।*** जनता की माँग और आन्दोलनों का अपना इतिहास....श्योपुर-ग्वालियर रेलखण्ड पर आजादी के पूर्व रियासत काल से संचालित नेरो-गैज टे्रन को जनता की मांग और तीव्रगामी समय की आवश्यकताओं के अनुरूप ब्रॉड गेज में बदले जाने की मांग का अपना एक अलग इतिहास रहा हैै। इस रेल-पथ के आमान परिवर्तन की मांग को लेकर जहां कई बार सियासी दलों के बैनर तले आन्दोलन तक छेड़े जा चुके हैैं वहीं जिले के विकास से जुड़ी इस मांग को लेकर अनेकों प्रतिनिधिमण्डल अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की अगुवाई में रेल मंत्रालय तक जा चुके हैैं जो आश्वासन पाकर लौटने के बाद मुंगेरीलाल के हसीन सपने बरसों तक जनता को दिखाते भी रहे हैं और चुनावी माहौल में वोटों के तौर पर भुनाते भी रहे हैं लेकिन मुद्दा बीरबल की उस खिचड़ी जैसा बना हुआ है जो पकने को तैयार ही नहीं है। गौरतलब है कि अंचल के विकास का दावा करते हुए कभी जनता के भगवान बनने तो कभी जनता को भगवान बताने वाले राजनेताओं ने भी आम जनमानस से जुड़ी इस मांग की मंद आंच पर अपने-अपने स्वार्थों की रोटियां सेंकने का काम आश्वासनों के बलबूते लगातार किया है तथापि आम जनता का यह सपना आज भी महज सपना बना हुआ हैै। हालांकि इस रेल पथ के सर्वेक्षण का काम पूरा होने तथा आमान परिवर्तन की कार्रवाही का घोड़ा अस्तबल से बाहर निकलने का दावा कई बार समाचारों की सुर्खियों के रूप में सामने आ चुका है किन्तु प्रति वर्ष पेश किये जाने वाले रेल-बजट में इससे जुड़े किसी भी प्रावधान का अभाव जनमानस की उम्मीदों को धूमिल करने का कारनामा अंजाम देता आ रहा हैै।*** घाटा बताकर सुविधा छीने जाने तक की कोशिशें....श्योपुर जिला मुख्यालय से इस टे्रन के कारण जुड़े तमाम गांवों के लोगों को आवागमन के पर्याप्त साधन मुहैया कराने की दिशा में भले ही कोई प्रयास कभी नहीं हो पाये हों किन्तु उनकी आवा-जाही सुलभ बनाने वाली इस गाड़ी का संचालन बन्द करने की दिशा में कुत्सित प्रयास लगातार किये जाते रहे हंै जो अब कहीं जाकर मंद पड़े हैंं। हास्यास्पद बात यह है कि जिस गाड़ी में बोगियों के अन्दर से लेकर छतों के ऊपर तक तिल रखने तक की जगह का अभाव प्रतिदिन नजर आता हो तथा जिसके आरम्भिक रेलवे स्टेशन पर टिकट हासिल करने के लिए यात्रियों की कतारें टे्रन की रवानगी से घण्टे दो घण्टे पहले लगनी शुरू हो जाती हों, उसे घाटे में बताकर टे्रन का संचालन बंद किये जाने तक का संकेत कई बार दिया जा चुका हैै जो जन-विरोध के बाद येन-केन-प्रकारेण वापस भी लिया जाता रहा है। बेशुमार यात्रियों को अपने में समेटकर चलने वाली इस टे्रन के संचालन में घाटे की स्थिति का मूल कारण स्टाफ की उदासीनता है या फिर यात्रियों की मनमानी, यह अलग से शोध का विषय हो सकता हैै तथापि यह कहने से परहेज नहीं किया जा सकता कि घाटे जैसे कोई हालात इस रेल-पथ पर ना कभी रहे हैं और ना ही रहने हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की हैै कि इस पथ पर चलने वाली टे्रनों में टिकटधारक यात्रियों का परीक्षण नियमित किया जाये जो कुछ समय से किया जाने लगा है तथा अच्छे नतीजे भी सामने ला रहा है।*** आंकड़े खुद बताते हैैं सच्चाई की दास्तान....प्रतिदिन भोर की पहली किरण के साथ श्योपुर और ग्वालियर से विपरीत दिशाओं में सात या आठ घण्टे से अधिक के सफर की शुरूआत करने वाली टे्रनों में खचाखच भरी सवारियों और इंजन तक पर लदे हुऐ सामान को देखने के साथ-साथ यदि विभिन्न स्टेशनों से बेचे जाने वाले टिकटों और अर्जित की जाने वाली राशि के आंकड़ों पर नजर डाली जाये तो यह सहज ही पता लगाया जा सकता है कि इस पथ पर टे्रन का संचालन हर हालत में मुनाफे की गारण्टी देता है। बावजूद इसके यदि रेलवे परिमण्डल नुकसान की बात करता हैै तो फिर इस सच का खुलासा होना जरूरी हैै कि श्योपुर से ग्वालियर तक आने-जाने वाली इस पथ की गाडिय़ों में बिना टिकट यात्रा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा कौन दे रहा हैै। उल्लेखनीय है कि इस पथ पर जहां कम दूरी के स्टेशनों के बीच अक्सर बेटिकट यात्रा करने वाले यात्रियों की समस्या प्राय: सामने आती है वहीं ऐसे यात्रियों की तादाद भी कम नहीं हैै जो किराया तो देते हैैं किन्तु टिकट नहीं ले पाते। ऐसे में किराये के नाम पर ली जाने वाली राशि बीच में ही खुर्द-बुर्द हो जाती है तो यह भी जरूर बताया जाना चाहिये कि इसके लिये जिम्मेदार आखिर कौन है? जहां तक जोखिमपूर्ण सफर का सवाल है टे्रन पर यात्रियों की अनियंत्रित चढ़ाई से चिन्तित कर्मचारियों का कहना है कि इस तरह के दृश्यों पर रोक लगाये जाने के लिये कार्यवाही स्टेशन क्षेत्र मेें समय-समय पर की जाती है तथापि चलती गाड़ी पर सवार होने वाले यात्रियों पर रोक लगाया जाना संभव नहीं है। जहां तक यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं व टिकटों की बिक्री का सवाल है प्रत्येक गाड़ी में 40 सीटों वाली सात से आठ बोगियां लगाई जाती हैं तथा टिकटों की बिक्री निर्धारित यात्री संख्या की तुलना में दो से तीन गुना जबकि यात्रियों की संख्या चार से छह गुना तक अधिक होती है जो सीजन में और भी बढ़ जाया करती है। *** रेल पथ पर संचालित टे्रन.......श्योपुर से ग्वालियर के बीच नेरो गैज की टे्रन प्रति चक्कर कुल 200 कि.मी. की दूरी तय करती है। इस मार्ग पर कुल चार टे्रनों का संचालन आवा-जाही के लिऐ अप एण्ड डाउन के रूप में होता है। श्योपुर से ग्वालियर की ओर जाने वाली इकलौती टे्रन प्रात: 06.10 बजे रवाना होती है वहीं इसी समय पर ग्वालियर से चलने वाली टे्रन श्योपुर की ओर कूच करती है जो सामान्य परिस्थितियों में अपराह्रï 04.25 बजे श्योपुर पहुंचती है। उक्त दोनों टे्रनों के अलावा श्योपुर से सबलगढ़ के बीच दो टे्रनें परस्पर विपरीत दिशा में प्रस्थान करती हैं। श्योपुर से सबलगढ़ की ओर जाने वाली टे्रन के स्टेशन से रवाना होने का समय दोपहर 02.25 बजे नियत है। इन सभी टे्रनों में यात्रियों और उनके सामानों की मौजूदगी इंजन से लेकर बोगियों के अंदर, पायदान पर और छतों तक पर देखी जा सकती है जो टे्रन और सवारियों के बीच के गहरे रिश्ते को प्रमाणित करती है। श्योपुर-ग्वालियर रेल-खण्ड के प्रमुख स्टेशनों में श्योपुर सहित गिरधरपुर, खोजीपुरा, इकडोरी, वीरपुर, सबलगढ़, कैलारस, जौरा अलापुर, सुमावली, बामोर गांव, मोतीझील, घोसीपुरा, ग्वालियर शामिल हैं वहीं दांतरदा, दुर्गापुरी, सिरोनी, टर्रा कलां, सिल्लीपुर, कैैमारा कलां, विजयपुर रोड, रामपहाड़ी, पीपल वाली चौकी, सैमई, भटपुरा, सिकरोदा, थरा, अम्बिकेश्वर तथा मिलावली को हॉल्ट स्टेशन का दर्जा मिला हुआ है। शुरूआती ओर आखिरी स्टेशनों को छोड़कर शेष सभी स्टेशनों के निवासियों की मुसीबत यह है कि उनके क्षेत्र में आवागमन के साधनों का टोटा अभी भी कायम है लिहाजा यह टे्रन ही उनकी उम्मीदों का केेन्द्र है।
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