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Friday, May 22, 2020

😊 #जानिए_मुझे (बतौर मित्र #दिलचस्पी हो तो। अन्यथा उपेक्षा तो आपका अधिकार है ही)"

एक अदना सा फ़क़ीर हूँ और काल के कपाल पर विधाता की खींची लकीर हूँ। हूँ तब तक हूँ बस।       इस धरा-धाम पर आगमन हुआ 13 फरवरी को। ननिहाल जयपुर के रास्ते। उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद से पैतृक रिश्ता रहा कभी। अब प्रयोगवाद के जनक महाकवि गजानन माधव "मुक्तिबोध" की जन्मस्थली श्योपुर (मध्यप्रदेश) का मूल निवासी हूँ। जो शौर्य भूमि के रूप में मान्य चम्बल संभाग का एक जिला है। फिलहाल, दो साल के लिए काले पानी की सज़ा भुगतने ग्वालियर नगरी के प्रवास पर था। वक़्त के थपेड़ों की मार से बाबा महाकाल को शरण में हूँ। ल घर-वापसी मई-2020 तक संभावित मान कर। मृत्युलोक में पदार्पण की दास्तान को कुछ यूं समझें। याद रहेगा।■ दूसरे भारत-पाक युद्ध के 3 साल बाद और तीसरे भारत-पाक युद्ध से 3 साल पहले हुई पैदाइश। वो भी कथित प्रणय दिवस (वेलेंटाइन डे) से एक दिन पूर्व ब्रह्म-मुहूर्त के उपरांत सूर्योदय वेला में। मामा ने नामकरण कर दिया "प्रभात।"कायस्थ कुल में जन्म हुआ तो लेखनी की साधना करनी ही थी। साढ़े तीन दशक से शब्द-साधना ही चल रही है। वाणिज्य और हिंदी साहित्य सहित पत्रकारिता और जनसंचार का छात्र रहा। अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, अपराध शास्त्र सहित उपन्यासों में रुचि रही। अन्वेषण अउर विश्लेषण का शौक़ भी। यायावर के तौर पर रेल यात्रा और छायांकन मेरी खास पसन्द है। मंच संचालन सहित हिंदी, उर्दू के मंचों पर काव्यपाठ करता रहा हूँ। किसी मठाधीश का गुर्गा या गैंग का सदस्य बन पाता तो पांचों उंगलियां घी में होतीं। हो सकता था कि सर भी कढाई में होता। चापलूसी का हुनर नहीं था तो बिना शह के मात होनी ही थी। हुई भी ऊपर वाले की कृपा से। आडम्बरमुक्त आस्थावादी जो हूँ।■ सामान्यतः वो ही हूँ जो हूँ। वैसा ही हूँ जैसा दिखता हूँ। जो महसूस करता हूँ वही लिख डालता हूँ। यूं तो एक संवेदनशील सृजनधर्मी ही हूँ। मगर मुझ में छिपा एक स्वाभाविक व्यंग्यकार और जन्मजात विद्रोही अक़्सर मुखरित हो उठता है। कभी विद्रोह की चिंगारी भी जागती है। जिसे शांत करने का काम लेखनी से कर लेता हूँ।■ सतत सृजन का उद्देश्य अपने उद्वेग से पार पाना भर है। किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की भावनाओं को आहत करना कतई पसंद नहीं। दोस्तों का दोस्त रहा हूँ। अब थोड़ा ऊबने लगा हूँ। व्यवहार निभाने में अव्वल रहा लिहाज ठगा भी खूब गया। खून के रिश्तों पर नहीं दिल के नातों पर भरोसा रहा है बस। इसके लिए खुद रिश्ते ही ज़िम्मेदार हैं। पार्ट टाइम रिश्ते या सम्बन्ध कोई महत्व नहीं रखते मेरे लिए। मैं पूर्णकालिक सम्बन्धों का पक्षधर हूँ। सुप्त ज्वालामुखी मानते हैं कुछ करीबी। मेरा मानना है कि थोड़ा गुस्सा ज़रूरी है। जो शीघ्र निकल जाए और दिमाग मे घर ना करे। खिलवाड़ करता नहीं, सहता भी नहीं। अपेक्षा करता नहीं और उपेक्षा भाती भी नहीं। सिर पर बिठाता हूँ नम्रता के साथ। धृष्टक पर धराशायी करना भी जानता हूँ। जो नज़र से गिर गया वो इस जन्म में तो स्वीकार नहीं। अगले जन्म का मुझे खुद नहीं पता। ग़लत को गलत कहने से खुद को रोक नहीं पाता। तमाम बार खामियाजा भुगतने के बाद भी। थोड़ी बहुत हाज़िर-जवाबी सतत अभ्यास की वजह से है। कुछ अनुभव होना चाहिए बस, व्यक्त करने में देर नहीं लगती। यह माँ वाणी की कृपा है। ■ लेखन और पत्रकारिता से पूर्व शिक्षक रहा। प्रेरक वक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय अब भी हूँ। लगातार हाशिए पर धकेले जाने के बाद भी। चला कर ठंसने और धंसने की आदत नहीं। अपमान और अवमानना से डरता हूँ। लिहाजा बेहद संकोची हूँ। इस्तेमाल होता रहा हूँ। करना कभी सीख नहीं पाया। अब उम्मीद भी नहीं कुछ सीख पाने की। किसी को गिरा कर आगे निकलना न आया, न भाया। बावजूद इसके गर्व है अपने पिछड़े रहने पर। बेक बेंचर था विद्यार्थी जीवन मे। शिक्षा स्कूल, कॉलेज से ज़्यादा दुनिया से पाई। स्वाधीनता पसंद थी इसलिए सरकारी सेवा में नहीं रही रुचि। कोई गॉड-फादर नहीं बनाया। फादर खुद गॉड थे मेरे। उन्ही के आदर्श रहे कि खुद का निर्माण खुद कर सका। सामाजिक, पारिवारिक और सार्वजनिक दायित्व निभा पाया अब तक। इसका समूचा श्रेय जीवन-संगिनी को, जिसने मुझे राष्ट्रीय और सार्वजनिक संपदा स्वीकार कर लिया। बिना किसी शिकवा-शिकायत के। ■ गर्व है भारतीय होने पर। गर्वित हूँ अपनी धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विरासतों पर। संतोषी हूँ और संचय से दूर भी। कर्म और भाग्य पर साझा भरोसा है। आशावादी और आस्थावादी हूँ। लिहाजा ऊपर वाले की रज़ा का मज़ा लेता आया हूँ। हर हाल में खुश होकर जीने में विश्वास है। ज़िंदादिली ग़म में ठहाका लगाने का साहस देती है। औरों की पीड़ा, बेबसी द्रवित करती है। दुनिया का भय नहीं क्योंकि श्री रामचरित मानस से प्रेरित हूँ। पता है कि :-"हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ।"जो करेगा ईश्वर करेगा।वो बुरा करता नहीं। इतना सा पता है। और हां, लल्ली-चप्पो यानि ठकुर-सुहाती नहीं कर पाता। जो आज के युग मे अपने पिछड़ेपन की मूल वजह मान सकता हूँ। जीवन खुली किताब की तरह रखा। कमज़ोरियाँ कभी नहीं छुपाईं। लिहाजा शुभचिंतकों को आसानी से पता चलता रहा कि दुखती रग कौन सी है और चोट कहाँ करना है। किसी की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप पसंद नहीं रहा। अपनी ज़िंदगी मे कथित अपनों के हस्तक्षेप की कोई कमी नहीं। ईश्वर फ़टे में टांग देने वालों को सद्बुद्धि दे। शायद मेरा चौथापन सुधर सके।■ यहाँ ना मिलूं कभी तो गूगल पर सर्च कर लेना बस। कभी भी छोड़ सकता हूँ ये प्लेटफॉर्म। "छोटा सिरचन" जो हूँ रेणु जी का। किशोरावस्था से युवावस्था तक आधा लाख उपन्यास पढ़ने और कथा प्रवचन सुनने का जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा, जो आज तक बरकरार है।बहरहाल,आपकी तमाम इनायतों और नवाज़िशों को सलाम।। अपने मिज़ाज की नुमाइंदगी करती इस कविता के साथ :--"पक्षपात की आस करो मत।चिंतन का उपहास करो मत।।मिथ्या नहीं प्रशंसा होगी।ना झूठी अनुशंसा होगी।।स्वागत, वंदन, मान न होगा।क़द, पद का यशगान न होगा।।ना छेदन विच्छेदन होगा।ना ही प्रणय निवेदन होगा।।ना दावा, ना खंडन होगा।ना ही महिमा मंडन होगा।।पढ़ना चाहो जो मनभाता।हे जगती के भाग्य विधाता!कोई और किताब उठाओ।।मैं जगभाता कब लिखता हूँ?"शब्दों की, भावों की ढेरी।मेरी सोच, क़लम भी मेरी।।रात, दोपहर, सांझ, सवेरे।जड़-चैतन्य सभी हैं मेरे।।शब्दब्रह्म का मैं साधक हूँ।शब्दनाद का आराधक हूँ।।मुझ पर नहीं किसी का पहरा।मनमौजी, यायावर ठहरा।।मैं कब मनुहारों का आदी?बात करूंगा सीधी-सादी।।जो पसंद आते हैं तुझ को।स्वांग सुहाते कब हैं मुझको।।अंदर से ले कर बाहर तक।वैसा हूँ जैसा दिखता हूँ।।"       मैं जगभाता कब लिखता हूँ??"◆ 07 मई 1987 से शुरू हुआ था शायरी का सफर। लगभग 7 हज़ार से अधिक गीत, ग़ज़ल, नज़्म, क़तआत, कविताएं और व्यंग्य आदि हैं। दिल्ली के अंकुर पब्लिकेशंज़ के लिए हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी गज़लों और नज़्मों पर 2 दर्जन से अधिक संकलनों का सम्पादन कर चुका हूँ वर्ष 1985 से 98 तक। जो दुनिया भर में पहुंचे हैं। मंचों से भी वास्ता रहा है। यहीं बहुत क़लाम है शुरुआती दौर का। बस ज़रा गहराई में उतरना पड़ेगा आपको।◆ "संजीदा किस्म की मसखरी" कर लेता हूँ। उससे, जिससे खुल जाऊं थोड़ा सा। सामान्यतः अदब को रिश्तों की नींव मानता हूँ। जिनसे विशेष लगाव होता है उनसे साधिकार झगड़ लेता हूँ। अधिकार के साथ कोई दे तो गाली खाने से भी परहेज़ नहीं। आडम्बर विमुख आस्तिक हूँ और ऊपर वाले को धोखा देने की कोई मंशा नहीं रखता। भक्ति और अंधभक्ति के बड़े अंतर की थोड़ी-बहुत समझ है। पता है कि उसे बाहर क्या तलाशना जो अंदर घुसा बैठा है। भीड़ में धक्के खाने का कोई शौक़ नहीं। थोथा प्रदर्शन और दिखावे का अनुकरण आता तो राजनीति में होता। रफू करने की कला आती है। बखिया उधेड़ने में पीएचडी मान सकते हैं आप। मानना चाहें तो। ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं है कोई। भाषण वाले नहीं कर्म वाले राष्ट्रवाद से प्रेरित हूँ। राजनीति के अखाड़े में लंगोट फहराते किसी भी छोटे-बड़े राजनेता या उसके दल के साथ कोई जायज़-नाजायज़ रिश्ता नहीं। किसी भी विचारधारा से कोई वैमनस्य नहीं। धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग उपवर्ग, रंग, भाषा, क्षेत्र या सीमाओं के आधार पर राग-द्वेष से कोई सरोकार नहीं। सहमति या असहमति का सम्बंध विषय से होता है। जिसमे देशकाल, वातावरण की अहम भूमिका होती है। बहरहाल, अपना काम कर रहा हूँ। दृष्टि-बाधा की स्थिति में भी शब्दबाण चलाने का काम मिला हुआ है। चंद वरदाई जैसे मित्र बनकर लक्ष्य सुझाएंगे तो शर-संधान और लक्ष्ण-बेधन सहज होगा मेरे लिए। दृष्टिकोण स्पष्ट होने के बावजूद दृष्टिबाधा से पीड़ित हूँ। शाब्दिक, मात्रिक त्रुटि संभावित है। आप बता सकते हैं बिना किसी संकोच या भूमिका के।       जय हिंद, वन्दे मातरम। जय राम जी की। जय हनुमान जी की।       #प्रणय_प्रभात  डेरा तम्बू @ यंत्र-तंत्र    (निवासी-श्योपुर)

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