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Sunday, May 31, 2020

#अतीत_की_गाथा... #बाल_विद्या_मंदिर_स्कूल_श्योपुर 【प्रणय प्रभात】

#अंचल_का_पहला_निजी_शिक्षण_संस्थान_जिसने_रचे_कई_कीर्तिमान                      【प्रणय प्रभात】"बाल विद्या मंदिर" स्कूल यानि श्योपुर का पहला निजी शिक्षण संस्थान। जिसने इस अंचल की धरती पर अशासकीय शिक्षा को नए आयाम दिए। शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक गतिविधियों में अग्रणी इस संस्थान ने ही सिखाया कि शिक्षा व्यवसाय कितना सार्थक व सफल हो सकता है। सन 1977 में स्थापित इस एक विद्यालय ने उन बाहरी अधिकारियों व कर्मचारियों की दुविधा को ख़त्म किया जो उनके बच्चों की बेहतर प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी थी। यह वही दौर था जब नौकरशाह इस क्षेत्र को "काला पानी" मानते थे। उनकी इस सोच के पीछे कई कारण थे। जिनमें अच्छी प्राथमिक शिक्षा भी एक थी। हालांकि सरकारी प्रायमरी और मिडिल स्कूल कई थे। फिर भी अशासकीय स्कूलों में बच्चों को भेजने की सोच शासकीय सेवकों और समृद्ध परिवारों के मन में थी। निम्न व उच्च मध्यम वर्ग के पालक भी अपने बच्चों की बुनियादी शिक्षा के लिए एक बेहतर विकल्प चाहते थे। इसी सोच के साथ क्षेत्र की शैक्षणिक रिक्तता को सही समय पर भांपा श्री आनंद प्रकाश गुप्ता ने। जिन्होंने वर्ष 1977 में इस संस्थान की नींव डाली। कस्बे के मेन बाज़ार स्थित सेठ श्री लालचंद जैन को विशाल इमारत का एक बड़ा हिस्सा इस संस्थान का साक्षी बना। बाहरी परिसर में संचालित सहकारी व्यावसायिक एवं औद्योगिक बैंक वाला सारा हिस्सा इस शाला के लिए लिया गया। फिर पीछे का भवन भी किराए पर ले लिया गया। जिसके पहले कक्ष को प्रधानाध्यापक कार्यालय बनाया गया। इस कक्ष के बाहर ही शुद्ध पेयजल की व्यवस्था थी। सामने ही स्थित एक छोटे से कक्ष को स्टाफ रूम के तौर पर इस्तेमाल में लिया गया। मैहराबों और स्तम्भों वाले एक बड़े हॉल को लकड़ी की दीवारों से तीन भागों में विभाजित किया गया। प्रार्थना और खेलकूद के लिए एक अच्छा खासा प्रांगण इसी हॉल के पिछवाड़े था।  बच्चों की संख्या बढ़ने के साथ ही बाहरी परिसर में भी दो कक्ष अलग से लिए गए। इन सभी का उपयोग कक्षाओं के तौर पर होता था। बाद में बाहरी परिसर का बड़ा हिस्सा बैंक के लिए किराए पर दे दिया गया। बहरहाल, सुबह व दोपहर की दो पालियों में संचालित यह शाला एलकेजी से पाँचवीं तक के बच्चों के लिए थी। सुबह की पाली में बड़ी कक्षाएं लगती थीं। दोपहर की पाली छोटी कक्षाओं के लिए थी। नेवी वेल्यू और व्हाइट ड्रेस में लकदक बच्चे तब सरकारी स्कूलों के बच्चों से बिल्कुल अलग दिखाई देते थे। लाल रंग की टाई, बेल्ट और मोजे उन्हें सरकारी स्कूलों के बच्चों से कुछ ख़ास बनाते थे। माँ सरस्वती के चित्र वाला एक नीला-सफेद बेज भी बच्चों को लगाना होता था। काले चमकदार जूते भी पूर्ण गणवेश का हिस्सा थे। बच्चों को लाने ले जाने के लिए एक रिक्शा भी था। जिसे ग़नी चाचा नामक एक अधेड़ सज्जन चलाते थे। स्कूल में प्रेम बाई नामक एक महिला भृत्य थीं। बेहद मिलनसार, मेहनती, समर्पित और मृदुभाषी। उनके कान कार्यालय से बजने वाली घण्टी पर होते थे और आँखें बच्चों पर। शाला प्रधान श्री आनंद प्रकाश गुप्ता का सौम्य व्यक्तित्व अभिभावकों को आकर्षित करता था। छरहरा शरीर, गोरा रंग, स्टाइलिश बाल और शानदार कलम उनकी छवि को और निखारती थीं। वे अपने स्कूटर से स्कूल आते थे। तब उनका आवास मसालेदार मोहल्ले में हुआ करता था। वे स्कूटर बाहरी प्रांगण में खड़ा करते। खिली हुई मुस्कान के साथ सभी का अभिवादन स्वीकार करते और अपने कक्ष में बैठ जाते। कार्यालय छोटा लेकिन सुव्यवस्थित था। बड़ी सी मेज के पीछे श्री गुप्ता जी की कुर्सी होती थी। दाहिने हाथ पर गोदरेज की आलमारी। जिसकी छत पर करीने से कुछ फाइलें रखी होती थीं। बाएं हाथ पर लकड़ी की एक रैक, जिसमें रजिस्टर व स्टेशनरी रखी होती थी। इसी रैक पर माँ सरस्वती की एक बड़ी प्रतिमा विराजती थी। जिनके गले में मोटा सा कृत्रिम हार होता था। सफेद मोतियों की एक माला भी। कार्यालय के एक हिस्से में लकड़ी की चार-छह कुर्सियां होती थीं। टेबल पर मोटे काँच के नीचे वर्ष भर के कैलेंडर सहित कुछ अन्य जानकारियों वाले कागज़ होते थे। ऊपर टेलीफोन का काले रंग का चोंगा। इस फोन का नम्बर 103 होता था। यह वो दौर था जब कॉल करने के लिए नम्बर एक्सचेंज से कनेक्ट कराना पड़ता था। बाद में उसकी जगह नम्बर डायल करने वाले चोंगे ने ले ली। जो कार्यालय को कार्यालय का लुक देता था। श्री गुप्ता जी को बच्चे सर कहते थे जबकि स्टाफ मेम्बर भाई साहब। भाई साहब की कार्यप्रणाली भी समय की माँग के अनुसार कुछ अलग थी। अधीनस्थ स्टाफ को निर्देश वे पर्ची पर लिख कर दिया करते थे। ताकि अध्ययन व अध्यापन कार्य में कोई व्यवधान न आए। फोन पर बात करने का उनका ढंग भी कुछ अलग होता था। वे फोन के माउथपीस को मुँह के बजाय गले पर रखते थे। बातचीत की शैली संयमित, शालीन व आत्मीय होती थी। कार्यालय आने वाले हर अभिभावक को पूरी तरज़ीह दी जाती थी। बैठते ही बाई काँच के साफ-सुथरे गिलासों में ठंडा पानी पेश कर देती थी। कुछ देर बाद बाहर से चाय भी आ जाती थी। श्री गुप्ता की अनुपस्थिति में अभिभावकों की बात को सुनने व समस्या को निपटाने की ज़िम्मेदारी वरिष्ठ शिक्षिकाओं की थी। जो बेहद व्यवहार कुशल, निपुण होने के साथ-साथ संस्थान के प्रति घोर निष्ठावान व समर्पित थीं। पारस्परिक सामंजस्य और आत्मीयता रखने वाली योग्य शिक्षिकाओं की कर्तव्यनिष्ठा ने शाला को हर मामले में शीर्ष पर ले जाने का काम किया। जिनके पीछे श्री गुप्ता की नेतृत्व कुशलता की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका थी। स्कूल ने पहले ही साल कामयाबी के वो झंडे गाड़े कि अगले ही साल दूसरा अशासकीय स्कूल टैगोर बाल विद्या निकेतन के तौर पर अस्तित्व में आ गया। इस स्कूल की स्था पना 1978 में श्री रशीद अहमद कुरैशी ने की। इसके बाद प्रायवेट स्कूलों की श्रृंखला बढ़ती चली गई। जिसके पीछे बाल विद्या मंदिर के जलवे की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। इनमें एमजी बाल विद्या निकेतन और ज्ञानोदय विद्या मंदिर अग्रणी थे। यह थी स्कूल की स्थापना और शुरुआती ढाँचे से जुड़ी बातें। अगले अंक में बात करेंगे उन तमाम उपलब्धियों की, जो इस संस्थान ने हासिल कीं। शिक्षा सत्र 2010/11 में यह स्कूल सीताराम जी और नवग्रह मंदिर के बीच वाली गली में स्थानांतरित हो गया। जो अब भी विधिवत संचालित है। विरासत की कमान विगत कई वर्षों से श्री गुप्र के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री अनिल गुप्ता के हाथ है। इससे पहले पाली रोड स्थित सात नीमड़ी और नर्सरी के सामने निजी भवन में इस शाला की शाखाएं भी स्थापित व संचालित हुईं। जो कालांतर में खुलने वाले बड़े संस्थानों के सामने संसाधनों की लड़ाई में कामयाब नहीं रह पाईं। तथापि शुरुआती दो दशक तक श्योपुर के आसमान पर बाल विद्या मंदिर की कीर्ति पताका पूरी शान से लहराई। इस संस्थान के तमाम विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। तमाम उच्च पदों पर हैं। जिनके सुंदर भविष्य को ठोस आधार देने का श्रेय इस संस्थान को बिना किसी संकोच के दिया जा सकता है। साधुवाद श्री गुप्ता जी को। आप दीर्घायु हों और स्वस्थ रहें, यह कामनाएं हैं। शुरुआती एक दशक में बहुत स्नेह पाया आपसे।            (#शेष_अगले_अंक_में.....)r

Saturday, May 30, 2020

😢 #भावनात्मक_स्मरण #अलविदा_मित्र_इंद्रकुमार। (सोचा भी न था कि आखिरी होगी वो आरसे बाद की एक मुलाक़ात)

अब से महज कुछ देर पहले ही अपने मित्र व सहपाठी रहे श्री इंद्र कुमार जैन (नत्थू बेल्डिंग वाले) के प्रयाण का दुःखद समाचार मिला। आहत हूँ अपने एक मित्र के यूँ अलविदा कह जाने से। हायर सेकेंडरी में मेरे सहपाठी रहे इंद्र कुमार से मेरी पिछली व अंतिम भेंट उसी शाला परिसर में हुई थी, जहाँ हम साथ पढ़ा करते थे। प्रसंग था शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय श्योपुर में आयोजित सामूहिक सूर्य नमस्कार कार्यक्रम का। इस कार्यक्रम में मुझे मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। जबकि इंद्र कुमार अभिभावक के तौर पर विशिष्ट अतिथि थे। मंच साझा करते हुए हम दोनों ही आह्लादित थे। एक ही शहर के निवासी होने के बाद भी तक़रीबन तीन दशक बाद जो मिले थे हम। लगभग छह-सात वर्ष पूर्व बेहद आत्मीय माहौल में हुई यह भेंट अंतिम होगी, इसकी कल्पना तक नहीं थी। मेरे उद्बोधन पर हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव करते हुए इंद्र कुमार ने बहुत सी पुरानी यादों को भी वार्तालाप के दौरान दोहराया था। मैंने विद्यार्थी जीवन वाली उसी सौम्यता और विनम्रता को एक बार फिर से महसूस किया था। जो उनके व्यक्तित्व की पहचान हुआ करता था। आज वे इस नश्वर संसार से अकस्मात विदा हो गए। स्तब्ध हूँ और दुःखी भी। प्रभु श्री जिनेन्द्र दिवंगत मित्र की आत्मा को परम शांति व मोक्ष प्रदान करें। शोक संतप्त परिजनों के प्रति मेरी आत्मीय संवेदनाएं। दिवंगत मित्र को भावपूरित श्रद्धांजलि 💐💐💐                     【प्रणय प्रभात】

Friday, May 29, 2020

#लघुकथा / #लेनदार 【प्रणय प्रभात】

रामदयाल को बहुत दिनों से बाबूलाल की तलाश थी। उसे उधार दिए हुए हज़ार रुपए जो वसूलने थे। तीन महीनों के लॉकडाउन ने कड़कनाथ अलग से बना रखा था। अचानक उसकी आँखों में चमक आई। बाबूलाल सामने से चला आ रहा था। पास आते ही दोनों की नजरें मिलीं। बाबूलाल ने अचानक मास्क पर मुट्ठी लगा कर ज़ोर ज़ोर से खाँसना चालू कर दिया। तक़ाज़े के शब्द बेचारे रामदयाल के गले में ही घुट कर रह गए। उसने कन्नी काट कर बग़ल से गुज़र जाने में ही ख़ैर समझी। दूसरी ओर बाबूलाल कोरोना को मन ही मन धन्यवाद देता जा रहा था।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

Sunday, May 24, 2020

आज_का_दिन_ऐतिहासिक ■ चार बलिदानों की नींव पर रखी गई बुनियाद। ब ■ आज 22 साल का हुआ हमारा अपना ज़िला श्योपुर। ■ भुला दिया गया लम्बे व कठिन संघर्ष का इतिहास। 【प्रणय प्रभात】

आज 25 मई को मध्यप्रदेश का सरहदी जिला 22 साल का यानि कि पूर्ण बालिग हो गया है। यह और बात है कि जिले की 22वीं सालगिरह को भी आम दिनों की तरह बिता दिया जाना पहले से तय था। इस खास दिन ना तो कोई आयोजन बीते 21 सालों की तरह हुआ। ना ही लोगों ने जिला निर्माण के संघर्ष और चार निरीह नागरिकों के बलिदान को याद किया। चार जिंदगियों के बलिदान और तमाम लोगों के संघर्ष का 47 साल पुराना वाकया भूली-बिसरी दास्तान बना रहा। गौरतलब है कि श्योपुर को जिला बनाए जाने की मांग वर्ष 1974 में शुरू हुई थी। समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ अभिभाषक रोशनलाल गुप्ता थे जो अब दुनिया में नहीं हैं। पूर्व विधायक तथा महामंत्री रामस्वरूप वर्मा का भी देहावसान हो चुका है। उपाध्यक्ष रहे वरिष्ठ अधिवक्ता देवीशंकर सिंहल तथा पूर्व विधायक सत्यभानु चौहान जिले के लिए जनसंघर्ष के गवाह आज भी हैं। मांग को प्रबल बनाने की कोशिशें तत्समय उपलब्ध संसाधनों के बलबूते जारी रही। जिला निर्माण हेतु गठित आंदोलन समिति को लगा कि सरकार सुनवाई के मूड में नहीं है। वर्ष 1975 में इसे जनांदोलन का रूप देते हुए अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन सूबात कचहरी के सामने शुरू कर दिया गया। - इसी दौरान 21 मई 1975 को आया वो काला दिन, जो बाद में इस मांग को आंच देने वाला भी रहा। सरकार से चर्चा के लिए भोपाल गया आंदोलनकारियों का शिष्टमंडल मांग नामंजूर होने की मायूसी के साथ श्योपुर लौटा। धरना स्थल पर जमा बड़ौदा व श्योपुर के वाशिंदों में रोष व असंतोष व्याप्त हो गया। धरना खत्म करने का निर्णय लिए जाने के साथ डेरे-तंबू समेट लिए गए। आंदोलनकारियों की वापसी के दौरान चौपड़ बाजार स्थित स्टेट बैंक पर तैनात गार्ड को उपद्रव की आशंका हुई। इसी दौरान दो-चार पत्थर बैंक की ओर फेंके गए और जवाब में पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में चार निरपराध नागरिकों गप्पूमल वैश्य, वजीर खां, मुंशी हसन मोहम्मद और जुम्मा भाई का बलिदान हो गया। भीड़ बेकाबू हो गई और गुस्से की आग तत्कालीन न्यायालय व तहसील सूबात कचहरी तक जा पहुंची। फिर लगा दिया गया कफर््यू और शुरू हो गया पुलिस का तांडव, जिसकी जद में समूचा शहर आया। जिला निर्माण आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी करने वाले सर्वोदयी नेता मंगलदेव फक्कड़, समिति के सदस्य पं. रमाशंकर भारद्वाज, कैलाशनारायण गुप्ता, प्रेमचंद जैन, रामबाबू जाटव, शिवनारायण नागर, कैलाश सेन आदि को पुलिस ने घरों में घुसकर बर्बरता के साथ पीटा। - मामला शांत होने के बाद गोलीकांड की जांच के लिए जस्टिस एमएल मलिक की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया। आयोग ने तथ्यों व साक्ष्यों की सुनवाई करने के बाद माना कि जिला निर्माण की मांग जायज है। आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वालों ने सरकार पर दवाब बनाना एक बार फिर से शुरू कर दिया। श्योपुर आने वाले हरेक राजनेता से लेकर बड़े अधिकारियों तक को ज्ञापन देना इस लड़ाई का शांतिपूर्ण हिस्सा रहा। तमाम बार प्रतिनिधिमंडल राजधानी पहुंचकर प्रदेश के मुखियाओं से मिलते रहे। इसी मांग और दवाब का नतीजा जस्टिस बीआर दुबे की अध्यक्षता में गठित जिला पुनर्गठन बोर्ड के रूप में सामने आया। आंदोलन समिति के सदस्य और तत्कालीन युवा नेता कैलाशनारायण गुप्ता पहला आवेदन लेकर बोर्ड के सामने पहुंचे। इसके बाद बोर्ड के समक्ष मांगों और प्रस्तावों का अम्बार लगता रहा। श्योपुर के विकास के लिए अपेक्षित जिला निर्माण की मांग निरंतर जोर पकड़ती गई। - संभावनाऐं जिले की घोषणा को लेकर बनीं मगर एक कांग्रेसी नेता ने प्रदेश के राजकोष पर भार पडऩे का हवाला देेते हुए याचिका लगा दी। जिला निर्माण का रथ बीच रास्ते में अटक गया। कालांतर में कानूनी पेचीदगियां एक-एक कर खत्म होती चली गईं। जीत जनता के सामूहिक प्रयास और विश्वास की हुई। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि श्योपुर सहित 16 नए जिलों की घोषणा 1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा द्वारा की गई थी। ये और बात है कि भाजपा सरकार की इस घोषणा के खिलाफ कांग्रेसी नेता गुलाबचंद तामोट न्यायालय की शरण में चले गए। उनका तर्क था कि इतने जिलों के एक साथ गठन के बाद राजकोष पर भारी दवाब पड़ेगा। बाद में पटवा सरकार की इसी घोषणा को अमली जामा दिग्विजय सरकार ने पहनाया। - वर्ष 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांगे्रस सरकार ने प्रदेश में 16 नए जिलों के गठन का साहसिक फैसला किया। जिला निर्माण की घोषणा 21 मई 1998 को हुई और राजपत्र में अधिसूचना के प्रकाशन के साथ ही 25 मई को श्योपुर जिले का विधिवत लोकार्पण कर दिया गया। श्योपुर जिले के विधि-विधान से वजूद में आने का जोश जनमानस पर हावी रहा। दो-चार साल जिला निर्माण की सालगिरह भी मनाई गई। उसके बाद लोग इस सौगात के लिए हुए लंबे संघर्ष को भूल गए। लिहाजा 25 मई का एतिहासिक दिन आम दिनों की तरह गुजरता चला गया। - अब जिला उम्र के लिहाज से बालिग हो चुका है। यथार्थ के धरातल पर इसकी अवस्था एक बिगड़ैल किशोर के जैसी है। आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का अभाव जिले की रगों में समाया हुआ है। वजह राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक सभी प्रकार की हैं। बात विकास की करें तो भवनों और भौतिक संसाधनों की दौड़ में जिला काफी आगे जा चुका है। वनों की बहुलता, कृषि उत्पादन की विपुलता के साथ कला-संस्कृति और शांतिप्रियता जिले की पुरानी पहचान बरकरार रखे हुए है। बावजूद इसके मैदानी धरातल पर जिस तीव्रगामी विकास की दरकार थी उसका गति पकड़ पाना आब भी बाकी है। सरकार और उसके अलमबरदार हाल-फ़िलहाल सीमेंट कांक्रीट के जंगल खड़े कर ख़ुद को विकास का मसीहा साबित करने पर तुले हैं। आम लोगों की बुनियादी दिक़्क़तों के साथ युवाओं के लिए समुचित आजीविका के अभाव आज भी मुँह बाए खड़े हैं। लघु, कुटीर धंधों, व्यवसायों व उद्योगों के नाम पर जिला अब भी किसी बेवा की माँग की तरह सूना है। बरसों पुरानी सँकरी रेल लाइन के चौड़ीकरण का काम कछुआ चाल से चल रहा है। आमान परिवर्तन का मुद्दा आज भी अधर में है। कूनो वन्यजीव अभ्यारण्य की स्थापना ने विकास की जो आस जगाई थी। उस पर गुजरात सरकार की हठधर्मिता का ग्रहण लगा हुआ है। दुर्लभ प्रजाति के एशियाई शेरों को इस अभ्यारण्य में लाने के प्रयास नहीं के बराबर हैं। कृषि तथा वनोपज पर आधारित व्यवसाय व उद्योगों का वजूद में न आ पाना भी शर्मनाक है। देखना यह है कि भौतिकतावादी विकास की पगडंडी पर दौड़ता ज़िला असली विकास से रूबरू कब तक हो पाता है?
                【प्रणय प्रभात】
#पुनश्च:
आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना व लम्बा है। आलेख स्मृतियों व संग्रहित जानकारियों पर आधारित है। कुछ नहीं बहुत कुछ छूटा होगा। ख़ास कर कुछ महानुभावों के नाम। इस तरह की त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा याचना। सुझावों के अनुसार संशोधन की गुंजाइश सदैव रहती है। यहाँ भी है। मंतव्य एक साझा संघर्ष की दास्तान को रेखांकित करना है। किसी को महिमा-मंडित करना नहीं। विघ्नसंतोषी  जन कृपया सियासत की गंदगी यहाँ न फैलाएं।
Narendra Singh Tomar
Kailash Narayan Gupta
D.S. Singhal

Saturday, May 23, 2020

#सरस्वती_वंदना :- 【प्रणय प्रभात】-

वीणापाणी, पद्मासना, कमलासना, ब्रह्म-अजा,माँ तू मुझे विद्या औ विनय का शुभ दान दे।कण्ठ में विराज मेरी क़लम को सिद्धि सौंप,मेरी इस लेखनी को गति अविराम दे।।- सत्य लिखूँ सत्यवादिता के पथ पे ही चलूँ,मेरी स्वर शक्ति को तू सरगमों का ज्ञान दे।दीप मन मंदिर में ज्ञान का जला दे मातु,नित्य नव सृजन करूँ ये वरदान दे।।- यश नहीं, रूप नहीं तेरी भक्ति चाहता हूँ,भक्ति गंगा ज्ञान गंगा का ही स्नान दे।करता नमन तुझे शत शत शारदा मैं,मुझे ऐश्वर्य नहीं आन बान शान दे।।- शब्द चुन छंद रचूँ छंद चुन गीत रचूँ,गीतों में बहाव माँ तू भावों को वितान दे।उड़े पंख तान ताकि छुए आसमान,मेरे मन के मराल को विचारों की उड़ान दे।।💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

#संस्मरण छोले_के_पत्ते_पर_रबड़ी_वाली_बर्फ़(उस स्वाद का आज भी नहीं कोई मुक़ाबला) 【प्रणय प्रभात】

एक छोटे से क़द का सीधा-सादा सा बुजुर्ग। उसके कंधे पर लटका चमकीले नीले रंग का बड़ा सा थर्मस फ्लास्क। थर्मस में ऊपर तक जमी ठंडी-ठंडी रबड़ी वाली बर्फ। आप में से बहुतों को याद आ रहा होगा वो थर्मस। जिसका ढक्कन बड़े सलीके से खोला जाता। हम बच्चे  ललचाई सी नज़र से उसमें भरी रबड़ी बर्फ़ को ताकते। बुजुर्ग एक चाकू से रबड़ी वाली बर्फ़ की एक परत काटता। उसे छोले के हरे पत्ते पर रखता और पत्ता हाथों में थमा देता। दस और बीस पैसे में मिलने वाली इस रबड़ी वाली बर्फ़ का लुत्फ़ हमनें सन 1973-74 में लिया। कसम से, वो अनूठा और विशुद्ध स्वाद आज तक ज़ुबान भूली नहीं है। लच्छेदार रबड़ी बर्फ़ कैसे और कहाँ बनती थी यह आज तक नहीं पता। याद है तो बस इतना कि हम उसका स्वाद पारख जी के बाग़ में लेते थे। छुट्टी वाले दिन टोड़ी बाज़ार से जुड़ीं गलियों में भी। जिनमें से एक गली में हमारा घर हुआ करता था। उस गली को छोड़ने के बाद भी यह रबड़ी बर्फ़ साल में एक बार नसीब होती रही। शायद अगले चार-छह साल तक। मौक़ा होता था चैत्र शुक्ल तीज का। जब वस्त्राभूषणों से सुसज्जित महिलाएं गणगौर पूजन के बाद पारख जी के बाग में जमा होती थीं। अलग-अलग समूहों में बंटी महिलाएं लोकगीत गाते हुए जम कर नृत्य करतीं। साथ आई बाल मंडली इस मेले जैसे माहौल का मज़ा लेती। बाग़ के बीच वाले गलियारे में चाट-पकोड़ी और कुल्फी के ठेलों सहित बच्चोँ को ललचाने वाले तमाम आइटम उपलब्ध होते थे। जिनमें घूमने वाली फिरकियाँ, भोंपू, सरकंडे के फोल्डिंग साँप, लाल पन्नी वाले गत्ते के चश्मे, बम्बई की मिठाई और बुढ़िया के रंग-बिरंगे बाल ख़ास थे। इसी भीड़ के बीच गूंजती रहती थी रबड़ी वाली ठंडी बर्फ़ की आवाज़। जो सब की ख़ास पसंद थी। धीरे-धीरे इस बर्फ़ की जगह दूध-मावे वाली कुल्फी और रंगीन पानी वाली चुस्की ने ले ली। जो स्थानीय स्तर पर बनाई और बेची जाती थीं। कुछ सालों बाद बाज़ार पर ब्रांडेड आइसक्रीम का कब्ज़ा हो गया। चुस्की, कुल्फ़ी और कम्पनियों की आइसक्रीम के बीच आज भी मुक़ाबला जारी है। वक़्त के साथ अगर कुछ गुम हुआ है तो वो बड़ा सा नीला थर्मस, जिसमें भरी बर्फ़ के स्वाद को टक्कर देने वाली कोई आइसक्रीम आज भी बाज़ार में नहीं है। थर्मस वाली उस बर्फ़ को बेचने वाले उस इकलौते बुजुर्ग के साथ ही वो स्वाद भी अतीत की वादियों में कहीं गुम हो गया। जिसकी अब मुझ जैसे लोग बस चर्चा ही कर सकते हैं। छोले के हरे पत्तों से बनने वाले पर्यावरण मित्र दोने भी अब कहीं नज़र नहीं आते। जो एक समय घरेलू उद्योग का आधार होते थे। कुल मिला कर हरे-भरे पत्ते पर लच्छेदार बर्फ़ अब स्मृति का विषय है। जो कभी नहीं धुंधला सकता।😋😋😋😋😋😋😋😋😋😋

#नज़्म :--#एक_कहानी_है_रूमानी.…..! प्रणय प्रभात

वक़्त हो तो आइएइक #दास्तां सुन लीजिए।कुछ रुमानी #ख़्वाब अपनीआँख में बुन लीजिए।।#इश्क़ कैसे जागता हैजागती हैं #ख़्वाहिशें।दो #दिलों को किस तरह सेजोड़ती हैं #बारिशें।।आज भीगी सी है #रुतमहकी हुई सी #रात है।हम #जवां होने को थेये उन दिनों की #बात है।।था वो महीना #जून काहो कर चुकी #बरसात थी।थोड़ी #तपिश थी #आसमां पे#अब्र की #बारात थी।।#वाकिफ़ नहीं थे #इश्क़ सेना #आशिक़ी के रंग में।#मासूम सी इक #गुलबदनअल्हड़ सी #लड़की संग में।।#पहचान थी कुछ #रोज़ कीज़्यादा न जाना था उसे।था #हुक्म घर वालों का तो#घर छोड़ आना था उसे।।घर से निकल कुछ देर मेंकच्ची #सड़क पर आ गए।इके बार फिर से आसमां पेकाले #बादल छा गए।।घर दूर था उसका अभीरफ़्तार बेहद मंद थी।बरसात के आसार थेबहती हवा अब बंद थी।।मौसम के तेवर भांप केसंकोच अपना छोड़ कर।कुछ तेज़ चलिए ये कहामैने ही चुप्पी तोड़ कर।।ठिठकी, रुकी, बोली लगाझरना अचानक से बहा।मैंने सुना उस शोख़ ने इक अटपटा जुमला कहा।थे लफ़्ज़ मामूली मगर मानी दुधारी हो गए।बेसाख़्ता बोली वो मेरेपाँव भारी हो गए।।ये तो समझ आया नहींदिल आह बोले या कि वाह।मासूम से चेहरे पे उसकेथम गई मेरी निगाह।एकटक देखा उसेमौसम शराबी हो गया।मरमरी रूख शर्म से बेहद ग़ुलाबी हो गया।।पल भर में ख़ुद की बातख़ुद उसकी समझ मे आ गई।क्या कह गई ये सोच केवो नाज़नीं शरमा गई।।नीचे निगाहें झुक गई।लब भी लरज़ने लग गए।बरसात होने लग गईबादल गरजने लग गए।।नज़रों से नज़रें मिल गईंमाहौल में कुछ रस घुला।उसने दिखाया पाँव अपनाराज़ तब जाकर खुला।।गीली मिट्टी में मुझेलिथड़ी दिखीं जब जूतियां।पाँव भारी क्यों हुए थेये समझ आया मियां।।वाक़या छोटा था परइक ख़ास किस्सा हो गया।।मुख़्तसर सा वो सफ़रयादों का हिस्सा हो गया।।          #प्रणय_प्रभात

#लघुकथा / #संतुष्टि 【प्रणय प्रभात】

रोहन आज बड़ा खिन्न था। खिन्नता की वजह था उसका सहपाठी तरुण। जो अरसे बाद आज अचानक बाज़ार में टकराया। पता चला कि दुबई में इंजीनियर है। ठाठ-बाट की ज़िंदगी जी रहा है। वही तरुण जो ख़ुद का लिखा नहीं पढ़ पाता था। किस्मत को कोसता रोहन चल नहीं रहा था। क़दम घसीट रहा था। अचानक सड़क किनारे लगे ठेले पर पॉपकॉर्न बना कर बेचने वाले ने नमस्कार ठोका। उसी ने रोहन के पशोपेश को अपना परिचय देते हुए दूर किया। पता चला कि वो उसका सहपाठी हेतराम है। दिन भर में डेढ़ सौ रुपए कमा पाता है। हर महीने 50 हज़ार रुपए पगार पाने वाला रोहन संतुष्ट था। अब उसे अपनी तक़दीर पर कोई नाराज़गी नहीं थी।

Friday, May 22, 2020

एक्सक्लूसिव्ह :- संकरी पटरियों पर लगातार जारी है मौत का सफर। अनगिनत मुसाफिरों की जिंदगी से खिलवाड़ मजबूरी में मवेशी बनने पर मजबूर हैं यात्री। (प्रभात प्रणय)"

घर से निकलो तो पता जेब में रख के निकलो।हादसा चेहरों की पहचान मिटा देता है..........।।"हिन्दुस्तान के नामचीन शायर डॉ. बशीर बद्र का यह चर्चित शेर सौ फीसदी सटीक साबित होता है श्योपुर से ग्वालियर के बीच बेनागा दौड़ती उस छुकछुक गाड़ी के वजूद पर जो अपने अस्तित्व पर हावी अनगिनत मुसाफिरों के लिये सफर का इकलौता माध्यम होने के साथ-साथ सफर की दुरूहता और जीवन के लिए जोखिम का भी पर्याय बनी हुई हैै। लोहे की संकरी पटरियों पर निर्भर छोटे-छोटे पहियों पर टिकी चंद डिब्बानुमा बोगियों में अन्दर से लेकर दरवाजे के पायदान, कपलिंक और छत तक सम्पूर्ण साहस व दक्षता के साथ लदी सवारियों से भरपूर बेनागा सफर पर रवाना होने वाली इस टे्रन का जहां अपना एक समृद्घ इतिहास भी हैै और शर्मनाक वर्तमान भी, जिस पर विचार किये जाने की संभावनाओं व आवश्यकताओं के बावजूद आज तक उतनी शिद्दत से विचार नहीं किया गया हैै जो समय की मांग भी है और न्यायोचित भी। मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिला मुख्यालय के रूप में अधोसंरचनात्मक विकास के मामले में लगभग सभी मोर्चों पर ठगे से नजर आने वाले श्योपुर जिला मुख्यालय स्थित प्राचीन स्टेशन से शुरू होने वाले छोटी रेल के इस सफर पर नजर डाली जाये तो सहज ही यह देखा, समझा और जाना जा सकता है कि जान हथेली पर लेकर यात्रा के लिये निकलने वाले उन हजारों यात्रियों को अदम्य शौर्य व पराक्रम के एवज में कोई पुरूस्कार जरूर दिया जा सकता है जो चाहे-अनचाहे इस रेल पर सवार होते हैैं। यहां उल्लेखनीय है कि श्योपुर से ग्वालियर के बीच परिवहन के लिये प्रायवेट कम्पनियों की बसों और सड़क मार्ग के बावजूद छोटे-बड़े ऐसे गांवों की संख्या सैंकड़ों में है जहां के हजारों लोग आवागमन के लिये इसी गाड़ी के वजूद पर निर्भर हैैं तथा अपनी इसी मजबूरी के चलते मवेशियों की तरह लगभग ठुंसने वाले अंदाज में सफर पर विवश हैं। श्योपुर से सबलगढ़ और ग्वालियर तक सुबह और दोपहर की पारियों में दो-दो गाडिय़ों के परम्परागत चक्करों पर टिका जिले का रेलवे यातायात कितना दुर्गम और जोखिम भरा हैै इसका अंदाजा केवल संचालित होने वाली गाडिय़ों और सवारियों की हालत से नहीं उन पुल-पुलियाओं की स्थिति से भी आसानी से लगाया जा सकता हैै जिन पर से गुजरकर यह छुकछुक गाड़ी अपने गंतव्य तक पहुंचती हैै। आजादी से बरसों पहले अंग्रेजों द्वारा बनवाये गये पुलों से होकर मंजिल की ओर कूच करने वाली यह गाड़ी वस्तुत: सिंधिया राजवंश की धरोहर के रूप में मान्य की जाती हैै, जिसे आम जनता की मांग के अनुसार आमान परिवर्तन करते हुऐ आधुनिक रूप दिये जाने के वायदों व आश्वासनों का बोझ जनजीवन की सोच पर हावी बना हुआ हैै। *** दावे, वादे, आडम्बर, आश्वासन और घोषणाऐं.....यह बात अलग है कि प्रदेश से लेकर देश तक पर काबिज इंका व भाजपा के नामचीन राजनेताओं के वादों, दावों, आडम्बरों, आश्वासनों और घोषणाओं के बावजूद इस गाड़ी का वजूद पूर्ववत कामचलाऊ बना हुआ हैै तथा आम लोगों के लिये आवागमन का यह साधन हमेशा की तरह खास साबित होता आ रहा हैै। आये-दिन किसी न किसी तरह की छोटी-बड़ी घटनाओं की साक्षी बनने तथा चलते-चलते राह में पसर जाने वाली इस गाड़ी के मुसाफिरों के लिये सुविधा नाम की कोई चीज बेशक उपलब्ध न हो किन्तु दुविधा उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों और परेशानियों का कहीं कोई टोटा नहीं हैै। स्टेशनों की हालत से लेकर रेल की बोगियों की हालत का मिलान आसानी से किया जा सकता है और इसी के आधार पर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है उन बेहिसाब यात्रियों की जान-माल की सलामती की संभावनाओं का, जो भगवान की कृपा पर निर्भर है। फिलहाल लब्बो-लुआब इतना सा है कि एक गौरवशाली अतीत रखने वाली इस छुकछुक गाड़ी का वर्तमान बेहाल हैै और अपने भविष्य की सलामती के लिये उस तंत्र की ओर आशा भरी नजरों से निहार रहा हैै, जो हजारों जिन्दगियों की सुरक्षा को लेकर लगातार बेपरवाह बना हुआ हैै तथा शायद आगे भी बना रहेगा। ऐसे में समय का तकाजा यही है कि आम यात्री अपनी किस्मत और अपने ईष्टï के भरोसे सफर पर निकलें और उनके बाल-बच्चे उनके सकुशल गंतव्य तक पहुंचने की प्रार्थना करें, जो प्राय: करते भी हैैं।*** जनता की माँग और आन्दोलनों का अपना इतिहास....श्योपुर-ग्वालियर रेलखण्ड पर आजादी के पूर्व रियासत काल से संचालित नेरो-गैज टे्रन को जनता की मांग और तीव्रगामी समय की आवश्यकताओं के अनुरूप ब्रॉड गेज में बदले जाने की मांग का अपना एक अलग इतिहास रहा हैै। इस रेल-पथ के आमान परिवर्तन की मांग को लेकर जहां कई बार सियासी दलों के बैनर तले आन्दोलन तक छेड़े जा चुके हैैं वहीं जिले के विकास से जुड़ी इस मांग को लेकर अनेकों प्रतिनिधिमण्डल अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की अगुवाई में रेल मंत्रालय तक जा चुके हैैं जो आश्वासन पाकर लौटने के बाद मुंगेरीलाल के हसीन सपने बरसों तक जनता को दिखाते भी रहे हैं और चुनावी माहौल में वोटों के तौर पर भुनाते भी रहे हैं लेकिन मुद्दा बीरबल की उस खिचड़ी जैसा बना हुआ है जो पकने को तैयार ही नहीं है। गौरतलब है कि अंचल के विकास का दावा करते हुए कभी जनता के भगवान बनने तो कभी जनता को भगवान बताने वाले राजनेताओं ने भी आम जनमानस से जुड़ी इस मांग की मंद आंच पर अपने-अपने स्वार्थों की रोटियां सेंकने का काम आश्वासनों के बलबूते लगातार किया है तथापि आम जनता का यह सपना आज भी महज सपना बना हुआ हैै। हालांकि इस रेल पथ के सर्वेक्षण का काम पूरा होने तथा आमान परिवर्तन की कार्रवाही का घोड़ा अस्तबल से बाहर निकलने का दावा कई बार समाचारों की सुर्खियों के रूप में सामने आ चुका है किन्तु प्रति वर्ष पेश किये जाने वाले रेल-बजट में इससे जुड़े किसी भी प्रावधान का अभाव जनमानस की उम्मीदों को धूमिल करने का कारनामा अंजाम देता आ रहा हैै।*** घाटा बताकर सुविधा छीने जाने तक की कोशिशें....श्योपुर जिला मुख्यालय से इस टे्रन के कारण जुड़े तमाम गांवों के लोगों को आवागमन के पर्याप्त साधन मुहैया कराने की दिशा में भले ही कोई प्रयास कभी नहीं हो पाये हों किन्तु उनकी आवा-जाही सुलभ बनाने वाली इस गाड़ी का संचालन बन्द करने की दिशा में कुत्सित प्रयास लगातार किये जाते रहे हंै जो अब कहीं जाकर मंद पड़े हैंं। हास्यास्पद बात यह है कि जिस गाड़ी में बोगियों के अन्दर से लेकर छतों के ऊपर तक तिल रखने तक की जगह का अभाव प्रतिदिन नजर आता हो तथा जिसके आरम्भिक रेलवे स्टेशन पर टिकट हासिल करने के लिए यात्रियों की कतारें टे्रन की रवानगी से घण्टे दो घण्टे पहले लगनी शुरू हो जाती हों, उसे घाटे में बताकर टे्रन का संचालन बंद किये जाने तक का संकेत कई बार दिया जा चुका हैै जो जन-विरोध के बाद येन-केन-प्रकारेण वापस भी लिया जाता रहा है। बेशुमार यात्रियों को अपने में समेटकर चलने वाली इस टे्रन के संचालन में घाटे की स्थिति का मूल कारण स्टाफ की उदासीनता है या फिर यात्रियों की मनमानी, यह अलग से शोध का विषय हो सकता हैै तथापि यह कहने से परहेज नहीं किया जा सकता कि घाटे जैसे कोई हालात इस रेल-पथ पर ना कभी रहे हैं और ना ही रहने हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की हैै कि इस पथ पर चलने वाली टे्रनों में टिकटधारक यात्रियों का परीक्षण नियमित किया जाये जो कुछ समय से किया जाने लगा है तथा अच्छे नतीजे भी सामने ला रहा है।*** आंकड़े खुद बताते हैैं सच्चाई की दास्तान....प्रतिदिन भोर की पहली किरण के साथ श्योपुर और ग्वालियर से विपरीत दिशाओं में सात या आठ घण्टे से अधिक के सफर की शुरूआत करने वाली टे्रनों में खचाखच भरी सवारियों और इंजन तक पर लदे हुऐ सामान को देखने के साथ-साथ यदि विभिन्न स्टेशनों से बेचे जाने वाले टिकटों और अर्जित की जाने वाली राशि के आंकड़ों पर नजर डाली जाये तो यह सहज ही पता लगाया जा सकता है कि इस पथ पर टे्रन का संचालन हर हालत में मुनाफे  की गारण्टी देता है। बावजूद इसके यदि रेलवे परिमण्डल नुकसान की बात करता हैै तो फिर इस सच का खुलासा होना जरूरी हैै कि श्योपुर से ग्वालियर तक आने-जाने वाली इस पथ की गाडिय़ों में बिना टिकट यात्रा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा कौन दे रहा हैै। उल्लेखनीय है कि इस पथ पर जहां कम दूरी के स्टेशनों के बीच अक्सर बेटिकट यात्रा करने वाले यात्रियों की समस्या प्राय: सामने आती है वहीं ऐसे यात्रियों की तादाद भी कम नहीं हैै जो किराया तो देते हैैं किन्तु टिकट नहीं ले पाते। ऐसे में किराये के नाम पर ली जाने वाली राशि बीच में ही खुर्द-बुर्द हो जाती है तो यह भी जरूर बताया जाना चाहिये कि इसके लिये जिम्मेदार आखिर कौन है? जहां तक जोखिमपूर्ण सफर का सवाल है टे्रन पर यात्रियों की अनियंत्रित चढ़ाई से चिन्तित कर्मचारियों का कहना है कि इस तरह के दृश्यों पर रोक लगाये जाने के लिये कार्यवाही स्टेशन क्षेत्र मेें समय-समय पर की जाती है तथापि चलती गाड़ी पर सवार होने वाले यात्रियों पर रोक लगाया जाना संभव नहीं है। जहां तक यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं व टिकटों की बिक्री का सवाल है प्रत्येक गाड़ी में 40 सीटों वाली सात से आठ बोगियां लगाई जाती हैं तथा टिकटों की बिक्री निर्धारित यात्री संख्या की तुलना में दो से तीन गुना जबकि यात्रियों की संख्या चार से छह गुना तक अधिक होती है जो सीजन में और भी बढ़ जाया करती है। *** रेल पथ पर संचालित टे्रन.......श्योपुर से ग्वालियर के बीच नेरो गैज की टे्रन प्रति चक्कर कुल 200 कि.मी. की दूरी तय करती है। इस मार्ग पर कुल चार टे्रनों का संचालन आवा-जाही के लिऐ अप एण्ड डाउन के रूप में होता है। श्योपुर से ग्वालियर की ओर जाने वाली इकलौती टे्रन प्रात: 06.10 बजे रवाना होती है वहीं इसी समय पर ग्वालियर से चलने वाली टे्रन श्योपुर की ओर कूच करती है जो सामान्य परिस्थितियों में अपराह्रï 04.25 बजे श्योपुर पहुंचती है। उक्त दोनों टे्रनों के अलावा श्योपुर से सबलगढ़ के बीच दो टे्रनें परस्पर विपरीत दिशा में प्रस्थान करती हैं। श्योपुर से सबलगढ़ की ओर जाने वाली टे्रन के स्टेशन से रवाना होने का समय दोपहर 02.25 बजे नियत है। इन सभी टे्रनों में यात्रियों और उनके सामानों की मौजूदगी इंजन से लेकर बोगियों के अंदर, पायदान पर और छतों तक पर देखी जा सकती है जो टे्रन और सवारियों के बीच के गहरे रिश्ते को प्रमाणित करती है। श्योपुर-ग्वालियर रेल-खण्ड के प्रमुख स्टेशनों में श्योपुर सहित गिरधरपुर, खोजीपुरा, इकडोरी, वीरपुर, सबलगढ़, कैलारस, जौरा अलापुर, सुमावली, बामोर गांव, मोतीझील, घोसीपुरा, ग्वालियर शामिल हैं वहीं दांतरदा, दुर्गापुरी, सिरोनी, टर्रा कलां, सिल्लीपुर, कैैमारा कलां, विजयपुर रोड, रामपहाड़ी, पीपल वाली चौकी, सैमई, भटपुरा, सिकरोदा, थरा, अम्बिकेश्वर तथा मिलावली को हॉल्ट स्टेशन का दर्जा मिला हुआ है। शुरूआती ओर आखिरी स्टेशनों को छोड़कर शेष सभी स्टेशनों के निवासियों की मुसीबत यह है कि उनके क्षेत्र में आवागमन के साधनों का टोटा अभी भी कायम है लिहाजा यह टे्रन ही उनकी उम्मीदों का केेन्द्र है।

😊 #जानिए_मुझे (बतौर मित्र #दिलचस्पी हो तो। अन्यथा उपेक्षा तो आपका अधिकार है ही)"

एक अदना सा फ़क़ीर हूँ और काल के कपाल पर विधाता की खींची लकीर हूँ। हूँ तब तक हूँ बस।       इस धरा-धाम पर आगमन हुआ 13 फरवरी को। ननिहाल जयपुर के रास्ते। उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद से पैतृक रिश्ता रहा कभी। अब प्रयोगवाद के जनक महाकवि गजानन माधव "मुक्तिबोध" की जन्मस्थली श्योपुर (मध्यप्रदेश) का मूल निवासी हूँ। जो शौर्य भूमि के रूप में मान्य चम्बल संभाग का एक जिला है। फिलहाल, दो साल के लिए काले पानी की सज़ा भुगतने ग्वालियर नगरी के प्रवास पर था। वक़्त के थपेड़ों की मार से बाबा महाकाल को शरण में हूँ। ल घर-वापसी मई-2020 तक संभावित मान कर। मृत्युलोक में पदार्पण की दास्तान को कुछ यूं समझें। याद रहेगा।■ दूसरे भारत-पाक युद्ध के 3 साल बाद और तीसरे भारत-पाक युद्ध से 3 साल पहले हुई पैदाइश। वो भी कथित प्रणय दिवस (वेलेंटाइन डे) से एक दिन पूर्व ब्रह्म-मुहूर्त के उपरांत सूर्योदय वेला में। मामा ने नामकरण कर दिया "प्रभात।"कायस्थ कुल में जन्म हुआ तो लेखनी की साधना करनी ही थी। साढ़े तीन दशक से शब्द-साधना ही चल रही है। वाणिज्य और हिंदी साहित्य सहित पत्रकारिता और जनसंचार का छात्र रहा। अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, अपराध शास्त्र सहित उपन्यासों में रुचि रही। अन्वेषण अउर विश्लेषण का शौक़ भी। यायावर के तौर पर रेल यात्रा और छायांकन मेरी खास पसन्द है। मंच संचालन सहित हिंदी, उर्दू के मंचों पर काव्यपाठ करता रहा हूँ। किसी मठाधीश का गुर्गा या गैंग का सदस्य बन पाता तो पांचों उंगलियां घी में होतीं। हो सकता था कि सर भी कढाई में होता। चापलूसी का हुनर नहीं था तो बिना शह के मात होनी ही थी। हुई भी ऊपर वाले की कृपा से। आडम्बरमुक्त आस्थावादी जो हूँ।■ सामान्यतः वो ही हूँ जो हूँ। वैसा ही हूँ जैसा दिखता हूँ। जो महसूस करता हूँ वही लिख डालता हूँ। यूं तो एक संवेदनशील सृजनधर्मी ही हूँ। मगर मुझ में छिपा एक स्वाभाविक व्यंग्यकार और जन्मजात विद्रोही अक़्सर मुखरित हो उठता है। कभी विद्रोह की चिंगारी भी जागती है। जिसे शांत करने का काम लेखनी से कर लेता हूँ।■ सतत सृजन का उद्देश्य अपने उद्वेग से पार पाना भर है। किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की भावनाओं को आहत करना कतई पसंद नहीं। दोस्तों का दोस्त रहा हूँ। अब थोड़ा ऊबने लगा हूँ। व्यवहार निभाने में अव्वल रहा लिहाज ठगा भी खूब गया। खून के रिश्तों पर नहीं दिल के नातों पर भरोसा रहा है बस। इसके लिए खुद रिश्ते ही ज़िम्मेदार हैं। पार्ट टाइम रिश्ते या सम्बन्ध कोई महत्व नहीं रखते मेरे लिए। मैं पूर्णकालिक सम्बन्धों का पक्षधर हूँ। सुप्त ज्वालामुखी मानते हैं कुछ करीबी। मेरा मानना है कि थोड़ा गुस्सा ज़रूरी है। जो शीघ्र निकल जाए और दिमाग मे घर ना करे। खिलवाड़ करता नहीं, सहता भी नहीं। अपेक्षा करता नहीं और उपेक्षा भाती भी नहीं। सिर पर बिठाता हूँ नम्रता के साथ। धृष्टक पर धराशायी करना भी जानता हूँ। जो नज़र से गिर गया वो इस जन्म में तो स्वीकार नहीं। अगले जन्म का मुझे खुद नहीं पता। ग़लत को गलत कहने से खुद को रोक नहीं पाता। तमाम बार खामियाजा भुगतने के बाद भी। थोड़ी बहुत हाज़िर-जवाबी सतत अभ्यास की वजह से है। कुछ अनुभव होना चाहिए बस, व्यक्त करने में देर नहीं लगती। यह माँ वाणी की कृपा है। ■ लेखन और पत्रकारिता से पूर्व शिक्षक रहा। प्रेरक वक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय अब भी हूँ। लगातार हाशिए पर धकेले जाने के बाद भी। चला कर ठंसने और धंसने की आदत नहीं। अपमान और अवमानना से डरता हूँ। लिहाजा बेहद संकोची हूँ। इस्तेमाल होता रहा हूँ। करना कभी सीख नहीं पाया। अब उम्मीद भी नहीं कुछ सीख पाने की। किसी को गिरा कर आगे निकलना न आया, न भाया। बावजूद इसके गर्व है अपने पिछड़े रहने पर। बेक बेंचर था विद्यार्थी जीवन मे। शिक्षा स्कूल, कॉलेज से ज़्यादा दुनिया से पाई। स्वाधीनता पसंद थी इसलिए सरकारी सेवा में नहीं रही रुचि। कोई गॉड-फादर नहीं बनाया। फादर खुद गॉड थे मेरे। उन्ही के आदर्श रहे कि खुद का निर्माण खुद कर सका। सामाजिक, पारिवारिक और सार्वजनिक दायित्व निभा पाया अब तक। इसका समूचा श्रेय जीवन-संगिनी को, जिसने मुझे राष्ट्रीय और सार्वजनिक संपदा स्वीकार कर लिया। बिना किसी शिकवा-शिकायत के। ■ गर्व है भारतीय होने पर। गर्वित हूँ अपनी धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विरासतों पर। संतोषी हूँ और संचय से दूर भी। कर्म और भाग्य पर साझा भरोसा है। आशावादी और आस्थावादी हूँ। लिहाजा ऊपर वाले की रज़ा का मज़ा लेता आया हूँ। हर हाल में खुश होकर जीने में विश्वास है। ज़िंदादिली ग़म में ठहाका लगाने का साहस देती है। औरों की पीड़ा, बेबसी द्रवित करती है। दुनिया का भय नहीं क्योंकि श्री रामचरित मानस से प्रेरित हूँ। पता है कि :-"हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ।"जो करेगा ईश्वर करेगा।वो बुरा करता नहीं। इतना सा पता है। और हां, लल्ली-चप्पो यानि ठकुर-सुहाती नहीं कर पाता। जो आज के युग मे अपने पिछड़ेपन की मूल वजह मान सकता हूँ। जीवन खुली किताब की तरह रखा। कमज़ोरियाँ कभी नहीं छुपाईं। लिहाजा शुभचिंतकों को आसानी से पता चलता रहा कि दुखती रग कौन सी है और चोट कहाँ करना है। किसी की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप पसंद नहीं रहा। अपनी ज़िंदगी मे कथित अपनों के हस्तक्षेप की कोई कमी नहीं। ईश्वर फ़टे में टांग देने वालों को सद्बुद्धि दे। शायद मेरा चौथापन सुधर सके।■ यहाँ ना मिलूं कभी तो गूगल पर सर्च कर लेना बस। कभी भी छोड़ सकता हूँ ये प्लेटफॉर्म। "छोटा सिरचन" जो हूँ रेणु जी का। किशोरावस्था से युवावस्था तक आधा लाख उपन्यास पढ़ने और कथा प्रवचन सुनने का जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा, जो आज तक बरकरार है।बहरहाल,आपकी तमाम इनायतों और नवाज़िशों को सलाम।। अपने मिज़ाज की नुमाइंदगी करती इस कविता के साथ :--"पक्षपात की आस करो मत।चिंतन का उपहास करो मत।।मिथ्या नहीं प्रशंसा होगी।ना झूठी अनुशंसा होगी।।स्वागत, वंदन, मान न होगा।क़द, पद का यशगान न होगा।।ना छेदन विच्छेदन होगा।ना ही प्रणय निवेदन होगा।।ना दावा, ना खंडन होगा।ना ही महिमा मंडन होगा।।पढ़ना चाहो जो मनभाता।हे जगती के भाग्य विधाता!कोई और किताब उठाओ।।मैं जगभाता कब लिखता हूँ?"शब्दों की, भावों की ढेरी।मेरी सोच, क़लम भी मेरी।।रात, दोपहर, सांझ, सवेरे।जड़-चैतन्य सभी हैं मेरे।।शब्दब्रह्म का मैं साधक हूँ।शब्दनाद का आराधक हूँ।।मुझ पर नहीं किसी का पहरा।मनमौजी, यायावर ठहरा।।मैं कब मनुहारों का आदी?बात करूंगा सीधी-सादी।।जो पसंद आते हैं तुझ को।स्वांग सुहाते कब हैं मुझको।।अंदर से ले कर बाहर तक।वैसा हूँ जैसा दिखता हूँ।।"       मैं जगभाता कब लिखता हूँ??"◆ 07 मई 1987 से शुरू हुआ था शायरी का सफर। लगभग 7 हज़ार से अधिक गीत, ग़ज़ल, नज़्म, क़तआत, कविताएं और व्यंग्य आदि हैं। दिल्ली के अंकुर पब्लिकेशंज़ के लिए हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी गज़लों और नज़्मों पर 2 दर्जन से अधिक संकलनों का सम्पादन कर चुका हूँ वर्ष 1985 से 98 तक। जो दुनिया भर में पहुंचे हैं। मंचों से भी वास्ता रहा है। यहीं बहुत क़लाम है शुरुआती दौर का। बस ज़रा गहराई में उतरना पड़ेगा आपको।◆ "संजीदा किस्म की मसखरी" कर लेता हूँ। उससे, जिससे खुल जाऊं थोड़ा सा। सामान्यतः अदब को रिश्तों की नींव मानता हूँ। जिनसे विशेष लगाव होता है उनसे साधिकार झगड़ लेता हूँ। अधिकार के साथ कोई दे तो गाली खाने से भी परहेज़ नहीं। आडम्बर विमुख आस्तिक हूँ और ऊपर वाले को धोखा देने की कोई मंशा नहीं रखता। भक्ति और अंधभक्ति के बड़े अंतर की थोड़ी-बहुत समझ है। पता है कि उसे बाहर क्या तलाशना जो अंदर घुसा बैठा है। भीड़ में धक्के खाने का कोई शौक़ नहीं। थोथा प्रदर्शन और दिखावे का अनुकरण आता तो राजनीति में होता। रफू करने की कला आती है। बखिया उधेड़ने में पीएचडी मान सकते हैं आप। मानना चाहें तो। ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं है कोई। भाषण वाले नहीं कर्म वाले राष्ट्रवाद से प्रेरित हूँ। राजनीति के अखाड़े में लंगोट फहराते किसी भी छोटे-बड़े राजनेता या उसके दल के साथ कोई जायज़-नाजायज़ रिश्ता नहीं। किसी भी विचारधारा से कोई वैमनस्य नहीं। धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग उपवर्ग, रंग, भाषा, क्षेत्र या सीमाओं के आधार पर राग-द्वेष से कोई सरोकार नहीं। सहमति या असहमति का सम्बंध विषय से होता है। जिसमे देशकाल, वातावरण की अहम भूमिका होती है। बहरहाल, अपना काम कर रहा हूँ। दृष्टि-बाधा की स्थिति में भी शब्दबाण चलाने का काम मिला हुआ है। चंद वरदाई जैसे मित्र बनकर लक्ष्य सुझाएंगे तो शर-संधान और लक्ष्ण-बेधन सहज होगा मेरे लिए। दृष्टिकोण स्पष्ट होने के बावजूद दृष्टिबाधा से पीड़ित हूँ। शाब्दिक, मात्रिक त्रुटि संभावित है। आप बता सकते हैं बिना किसी संकोच या भूमिका के।       जय हिंद, वन्दे मातरम। जय राम जी की। जय हनुमान जी की।       #प्रणय_प्रभात  डेरा तम्बू @ यंत्र-तंत्र    (निवासी-श्योपुर)

#प्रसंगवश :- जा की रही भावना जैसी..... (जो #सोचोगे ना, वही #सूझेगा श्रीमान)"

एक हलवाई अपनी दुकान पर रोज़ की तरह जलेबियाँ बनाने में मशगूल था। ग्राहकों को संभालने के लिए पास ही उसके कुछ सहयोगी बैठे थे। जलेबी के थाल के पास ताज़े दही का एक कुंडा रखा था। जिसकी मलाई पर एक कौए की नज़र थी। कौआ झपट्टा मारने वाले अंदाज़ में कुंडे की ओर लपकता था। सतर्क नौकर तुरन्त उसे लाठी फटकार कर उड़ा देते थे। यह सिलसिला देर तक चलता रहा। नौकर कौए की ढीठता से परेशान हो चुके थे। अब एक नौकर लाठी लेकर तैयार था। इंतज़ार कौए के पास आने का था। इस बार चाल कामयाब रही। पास आया कौआ लाठी की जद में आ गया और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। इस घटना के तमाम गवाहों में एक कवि भी था। जो इस घटना से काफ़ी आहत हुआ। उसने भट्टी के पास पड़ा एक कोयला उठाया और दीवार पर एक पंक्ति लिख दी। जो कुछ इस तरह थी-#काग_दही_पर_प्राण_गँवायो। अर्थात कौए ने दही के लिए प्राण गंवा दिए। कवि के वहां से जाने के बाद एक सरकारी बाबू दुकान पर आया। जो स्तकारी कागज़ों की हेराफेरी के मामले में निलंबित चल रहा था। उसकी नज़र दीवार पर लिखी पंक्ति पर गई। उसने कूच करते हुए पंक्ति को यूं पढ़ा-      #कागद_ही_पर_प्राण_गँवायो। अर्थात कागज़ के चक्कर में मारा गया। कुछ देर बाद दुकान पर एक मनचला युवक आया। जिसकी कुछ ही समय पहले एक युवती के बाप और भाइयों ने जमकर कुटाई की थी। संयोग से कुटे-पिटे युवक का ध्यान भी पंक्ति पर गया। उसने पंक्ति को अपने हिसाब से कुछ ऐसे पढ़ा-      #का_गदही_पर_प्राण_गँवायो।अर्थात क्यों गधी (गधैया) के चक्कर मे पिटा।कुल मिला कर सारा खेल आपके नज़रिए का है। आपको जो कुछ दिखता या सूझता है। उस पर आपके हालात और मनोभावों का असर होता है।।                  प्रस्तुति- #प्रणय_प्रभात

😊 यादों का झरोखा :- #पहली बारात के हम बाराती (बहुत कुछ पहली बार / यादगार अनुभव)

बात 1985 की है, जब मैं पहली बार खुद के बूते किसी बारात का हिस्सा बना। परिजनों के बिना किसी बारात में जाने का पहला मौका था। लिहाजा उसे भुला पाना संभव ही नहीं। बारात थी नगरी के अभिभाषक श्री महेंद्र जी जैन की। जो उस दौर के प्रसिद्ध संस्थान ओसवाल भोजनालय के संचालक श्री अरुण जी ओसवाल के लघु भ्राता हैं। संयोगवश मैं उनके अनुज श्री गजेंद्र जी जैन का पुराना छात्र और बीकॉम द्वितीय वर्ष का विद्यार्थी था। अपने बाल सखा, पड़ोसी और सहपाठी रमेश गुप्ता (नागदा वाले) के साथ। हालांकि मेरा बचपन ओसवाल परिवार के पड़ोस में ही स्थित श्री मोतीलाल जी सुनार के बाड़े में बीता था। परिवार के साथ सम्बन्ध पारिवारिक भी थे। किंतु बारात का आमंत्रण श्री गजेंद्र भाई साहब के चेलों के तौर पर मिला था। यात्रा श्योपुर से इंदौर की थी। तब इंदौर का केवल नाम भर सुना था। खटारा वाहनों के दौर में लग्जरी बस में सवारी का पहला मौका मिलने जा रहा था। एबी रोड जैसे राजमार्ग पर यात्रा की कल्पना बेहद रोमांचक थी। उससे पहले कोटा, जयपुर, शिवपुरी और ग्वालियर की ही यात्राएं की थीं। संयोग से सभी रास्ते तब ऊबड़-खाबड़ हुआ करते थे। बहरहाल, बारात में जाने का उत्साह सातवें आसमान पर था। बाज़ार से एक एयरबैग लाया गया। दो जोड़ी नए कपड़े, जूते-मौजे भी। चार्ली का इंटीमेट स्प्रे और हैलो का शेम्पू ही उन दिनों सहज उपलब्ध था। वो भी पवन फैंसी स्टोर पर। जहां उधारी की सुविधा थी। संयोग से मामला माह के पहले हफ़्ते का था। पापा ने 100 रुपए मांगने पर 150 पकड़ाए। कड़कड़ाते हुए दो नोट 50-50 के। दो 20-20 के और एक 10 का। हिदायत वही कि बच जाए तो लौटा देना। ये और बात है कि लौट कर घर आने तक 140 रुपए जेब में थे। जो ना मांगे गए और ना ही लौटाए गए। बहरहाल, तैयारी पूरी थी और बेसब्री से इंतज़ार था रवानगी का।      आख़िरकार 07 फरवरी का वो सुखद दिन आ ही गया। बस श्री रामतलाई हनुमान मंदिर के पास लग चुकी थी। सामान हाथ ठेलों पर लद कर वहां पहुंच चुका था। उन दिनों श्योपुर एक कस्बा ही था। जहां हाथ ठेला इकलौता पब्लिक ट्रांसपोर्ट होता था। सारा सामान सेट कराने से पहले हम दोनों मित्रों ने कन्डक्टर सीट के पीछे वाली डबल सीट कब्ज़े में कर ली थी। यात्रा को आरामदायक व यादगार बनाने की मंशा से। एक आशंका सीट से हटाकर पीछे भेजे जाने की भी थी। लिहाजा एक डबल सीट अलग से रोकी जा चुकी थी। ज़ोरदार उल्लास के बीच श्योपुर से बस रवाना हुई। बस का पहला पड़ाव शिवपुरी था। सभी के रात्रि भोजन की व्यवस्था टू स्टार पुलिस अधिकारी श्री योगेश गुप्ता जी के आवास पर थी। जो अरुण भाई साहब के मित्र थे और शिवपुरी में पदस्थ। आत्मीय माहौल में किसी पुलिस अधिकारी के घर भोजन तब गर्व का आभास कराने वाला था। भोजन के बाद बस ने इंदौर के लिए कूच किया। कुछ ही देर बाद बस की उछलकूद बन्द हो गई। पता चला कि हाई-वे आ गया है। हाई-वे की यात्रा के अनुभव की बात थी। नींद का नामो"-निशान तक आंखों में नहीं था। गुना में चाय-पानी के बाद आगे की यात्रा शुरू हुई। अब नींद के झोंके सोने पर मजबूर कर रहे थे। पता नहीं कब गुदगुदी सीट पर आंख लग गई। अलसुबह शोरगुल से नींद टूटी तो पता चला कि बस मक्सी के बस स्टैंड पर खड़ी थी। हम आनन-फानन में नीचे उतरे। प्राथमिकता में था राजमार्ग का साक्षात दर्शन, जो बस में बैठकर रात के अंधेरे में नहीं हो पाया था। दोहरी चौड़ी और चमक बिखेरती काली सड़क ने मंत्रमुग्ध किया। हाई-वे के शानदार ढाबे का दीदार भी पहली बार हुआ था। चाय-नाश्ते से फारिग होने के बाद सब फिर से बस में सवार हो चुके थे। वर देवता के परम मित्र श्री नारायण दास गर्ग और श्री रमाकांत चतुर्वेदी सभी के बीच आकर्षण का प्रमुख केंद्र थे। उनकी हंसी-ठिठोली और हाज़िर-जवाबी माहौल को सरस् व रोचक बनाए हुए थी। आख़िरी पड़ाव इंदौर ही था। खिड़की से इस महानगर की झलक मन लुभा रही थी। अंततः बस एक विशाल भवन के बाहर रुकी। जो रामबाग क्षेत्र की दादाबाड़ी के बड़े से परिसर में था। सभी बारातियों का सामान सम्मान के साथ उतारा गया। तब व्हीआईपी जैसा शव्द बहुत प्रचलित नहीं था, मगर आभास लगभग वैसा ही था। फरवरी के गुलाबी मौसम में स्नान के लिए गर्म पानी अलग से उपलब्ध था। वधु पक्ष की संपन्नता और प्रभाव की झलक व्यवस्थाओं से मिल रही थी। बावजूद इसके घरातियों का मृदु और विनम्र व्यवहार आनन्द की अनुभूति करा रहा था। घरातियों की ओर से एक रोचक शर्त स्वल्पाहार के समय आई। शर्त समोसे को लेकर थी। बताना यह था कि उनमें भरा क्या गया है? सब "आलू" पर एक-राय थे। सबका जवाब ग़लत निकला। दरअसल समोसे कच्चे केले से निर्मित थे। तब पहली बार जाना कि जैन मत में "आलू" का सेवन अधिकांश लोग नहीं करते। इसके बाद दिन का भोजन विशुद्ध मालवी ज़ायका लिए हुए था। तब जानने को मिला कि हमारे क्षेत्र में प्रचलित "बाटी" के गौत्र का एक व्यंजन "बाफला" भी होता है। शाम के भोजन के साथ बारात, विवाह आदि की रस्म भव्य और स्मरणीय रही। कुल मिलाकर बहुत कुछ पहली बार जानने को मिला। बहुत से अनुभव प्रथम बार हुए। आयु-भेद जैसा कोई बंधन 09 फरवरी को श्योपुर वापसी तक नहीं दिखा। लिहाजा पूरा लुत्फ़ निर्बाध बना रहा। इसके बाद साढ़े तीन दशक के सार्वजनिक जीवन में तमाम बारातों में शरीक़ होने का अवसर मिला। सैकड़ों समारोहों में भागीदारी जीवन का हिस्सा रही। लेकिन जो बात श्योपुर से इंदौर की इस यात्रा में थी, वो दोबारा कभी महसूस नहीं हुई। मज़ेदार बात यह है कि 1985 मेंअरुण भाई साहब के सामने जाने का साहस नहीं होता था। वजह उम्र के बीच का अच्छा-खासा अंतर था। कालांतर में हम पत्रकारिता के क्ष्रेत्र में सक्रिय होने की वजह से कर्मक्षेत्र के परम मित्र हो गए। यह अलग बात है कि है कि हास-परिहास के बावजूद सम्मान व नेह का भाव आज भी बना हुआ है। हायर सेकेंडरी से बीकॉम तक गुरु (ट्यूटर) रहे श्री गजेंद्र भाई साहब से बाद में सम्बंध गुरु-शिष्य परम्परा से इतर मित्रवत हुए। आदर का भाव सदैव विद्यमान रहा। आज भी है। इससे भी ज़्यादा रोचक बात यह है कि जिनकी बारात में गए थे उनके सुपुत्र युवा भाजपा नेता व कर सलाहकार नकुल जैन अगली पीढ़ी के होने के बाद भी हमारी मित्रमंडली का हिस्सा हैं। अब आप खुद समझ लीजिए कि हमारी सार्वभौमिकता व सर्वकलिकता कितनी रही होगी।।                                      #प्रणय_प्रभात                       😍😍😊😊😊😍😍(मामला 35 साल पहले का है। भूल-चूक हो सकती है। संशोधन किया जा सकता है)#Sheopur_Indore

अतीत का दर्शन / यादों की खिड़की से :-#शौक़_शौक़_में_उपज_गया_एक_प्रतिष्ठान #प्रभात_पुस्तकाल_श्योपुर_की_पहली_प्रायवेट_लाइब्रेरी, जिसने मुझे पठन-पाठन से जोड़ कर लेखन तक पहुंचाया)

कल सन 1985 का एक संस्मरण आप सभी ने पसंद किया। उसी सराहना की देन है कि आज अतीत का एक और पृष्ठ उलटने का मन किया। तमाम विषय किशोरावस्था के साथी रहे पत्रकार मित्र अश्विनी उर्फ़ संतोष बालोठिया ने सवेरे-सवेरे अपनी प्रतिक्रिया में सुझा ही दिए। उन्हीं में से एक याद को साझा करता हूँ आपके साथ। बात 45 साल पुरानी यानि 1975 की है। तब मेरे परिवार को किराए के दो कमरों और एक बारामदे से निजि घर में आए चंद माह ही बीते थे। तब मेरी उम्र थी कुल 7 साल। मेरे "पापा" (यही कहता था इसलिए पिताजी या पिताश्री लिखने का कोई अर्थ नही) वन विभाग में एलडीसी (निम्न श्रेणी लिपिक) थे। पत्रिकाएं और हर तरह के उपन्यास पढ़ने का उन्हें बेहद शौक़ था। तन्ख्वाह कम थी, दायित्व बहुत ज़्यादा, मगर शौक़ के साथ कोई समझौता नहीं। पापा उन दिनों नियत अंतराल से प्रकाशित कुछ पत्रिकाएं खरीद कर लाया करते थे। इन पत्रिकाओं में रविवार, दिनमान, साप्ताहिक हिन्दुस्ताम, धर्मयुग, कादम्बिनी के अलावा मेरे लिए चंदा मामा, नंदन, चंपक व गोलगप्पे शामिल थीं। नवनीत और सर्वोत्तम रीडर्स डायजेस्ट हर महीने डाक से आया करती थीं। पापा की तरह मैं भी बहुत धुनी था। एक बार में एक पत्रिका पूरी चाट जाने की गति मेरी भी थी। नतीजा यह निकला कि छोटी उम्र में बाल पत्रिकाओं के साथ सामयिक पत्र पत्रिकाओं में रुझान बढ़ गया। संकट पापा के सामने भी ऐसा ही था। पत्रिकाएं मुश्किल से हफ़्ते भर में निपट जाती थीं। अख़बार तब बहुत प्रचलित व उपलब्ध थे नहीं। इसी पशोपेश में पापा को एक युक्ति सूझी। अब उन्होंने अपना ध्यान मोटे-मोटे उपन्यासों की ओर केंद्रित किया। वो शाम को दफ़्तर से वापसी के बाद देर रात तक उपन्यास पढ़ते। दिन में उपन्यास मेरे हाथ लगता। आलम यह था कि खाने-पीने की सुध नहीं। अम्मा (दादी) या बड़ी बुआ एक-एक निवाला मुँह में डालतीं और मेरी आँखें उपन्यास में गढ़ी रहतीं। साल भर में यह अहसास पापा को हो गया कि अल्प वेतन में यह शौक़ पूरा कर पाना दिक़्क़त का सबब बनता जा रहा है। घर में इकट्ठे हुए सौ से ज़्यादा उपन्यास अब तक कई-कई बार पढ़े जा चुके थे। उन्हीं की ढेरी को देखकर पापा को ख़याल आया एक पुस्तकालय शुरू करने का। अपना शौक़ पूरा करना एक मक़सद था। दूसरा मक़सद अपने जैसे उन तमाम लोगों की सेवा था, जो खरीद कर उपन्यास नहीं पढ़ सकते थे। मनोरंजन के दूसरे कोई साधन तब थे नहीं। कस्बे के दो पुस्तक भंडार प्रतिदिन के हिसाब से किराया वसूलते थे। जो पाठकों को मंहगा पड़ता था। कई बार उपन्यास का किराया उसकी क़ीमत से ज़्यादा हो जाता था। ऐसे में पुस्तकालय की परिकल्पना सच में बेहद महत्वपूर्ण थी। एक शाम पापा दफ़्तर से लौटे तो उनके हाथ मे लकड़ी की एक तख़्ती थी। उस पर सुंदर अक्षरों में-#प्रभात_पुस्तकालय लिखा हुआ था। घर की बैठक के दरवाजे पर तख़्ती ठोक दी गई। देर रात तक बैठक की आलमारियों से लेकर टांड तक सारे उपन्यास सलीके से सजा दिए गए। तय किया गया कि पाठकों से कुल 2 रुपए प्रति माह लिए जाएंगे। जो राशि महीने भर में जमा होगी, उतनी ही जेब से मिलाई जाएगी। यही राशि नए उपन्यास खरीदने के काम आएगी। छोटी सी नगरी में यह पहल बिना प्रचार-प्रसार के रंगत पा गई। पापा के कुछ सहकर्मी लायब्रेरी के सदस्य बने। बात उनके परिचितों तक पहुंची तो सदस्यों की संख्या और बढ़ने लगी। शुरुआती  माह में एक सैकड़ा के आसपास सदस्य बन चुके थे। अमानत राशि (डिपॉज़िट) के तौर पर अधिकतम 5 (न्यूनतम 3) रुपए अग्रिम जमा कराने का प्रावधान था। सदस्य यह राशि सहर्ष जमा करा रहे थे। सोच फलीभूत हो रही थी। विभागीय काम से ग्वालियर गए पापा #नॉवेल्टी_बुक_सेंटर से अनुबंध कर आए। वहां से नए उपन्यास व्हीपीपी के जरिए डाक से आते। पैकेट को खोलना और साथ आई सूची देखना बेहद रोचक होता था। हरेक किताब पर खाकी रंग का चिकना व मज़बूत कवर चढ़ाना हमारा ही काम था। किताबों की पंजी में नाम लिखना, किताब पर नम्बर डालना और सील (मुहर) लगाना भी। इन कामों में मुझसे चार साल छोटा भाई "अन्नू" भी अब होशियार हो चुका था। बाद में तीसरे नम्बर के भाई "पिन्नू" सहित दिन भर साथ रहने वाले कुछ सखाओं ने भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया। उपन्यासों की संख्या सदस्यों की तरह तेज़ी से बढ़ रही थी। लिहाजा दीवारों से सटे लकड़ी के रैक बनवाए गए। छह माह में बैठक की दीवारें कम पड़ गई। किताबों की व्हीपीपी अब सीधे दिल्ली से आने लगी थीं। सभी नामी और चर्चित प्रकाशनों से हम सीधे संपर्क में थे। डाक से प्रकाशित उपन्यासों की सूचियां आती थीं। हम पसंद के उपन्यासों पर टिक लगाकर फिर प्रकाशन को भेजते। वही किताबें व्हीपीपी से कुछ रोज़ में आ जाती थीं। जिन्हें पढ़ने का उत्साह सभी सदस्यों की तरह हम भाइयों और पापा में भी रहता था। अगले कुछ सालों में हमारी छोटी सी लायब्रेरी बाज़ू वाले कमरे के रास्ते अंदर वाले तीसरें कमरे तक पहुंच गई। सुबह-शाम सदस्य आते और हम उन्हें पंजी (रजिस्टर) थमा देते। वो पन्ने पलटते हुए उपन्यास का नम्बर बोलते। हम तुरन्त निकाल कर उन्हें थमा देते। वाकई बहुत रुचिकर और मज़ेदार था यह काम। लगभग एक दशक से अधिक समय तक चले इस पुस्तकालय ने हज़ारों उपन्यास पढ़ने व औरों को पढ़ाने की राह आसान बनाई। शायद ही कोई उपन्यासकार होगा, जिसकी किताब लायब्रेरी में न रही हो। सामाजिक, जासूसी और थ्रिलर उपन्यास।  क्रमश: 21 और 24 खण्डों वाले चंद्रकांता संतति व भूतनाथ (बाबू देवकीनंदन खत्री) से लेकर सत्यार्थ प्रकाश (महृषि दयानन्द सरस्वती) तक। मशहूर लेखक जेम्स हेडली चैइस से लेकर वेदप्रकाश शर्मा और गुलशन नंदा से लेकर रानू व सरला रानू तक। आचार्य चतुरसेन शास्त्री, अमृत लाल नागर, वृंदावन लाल वर्मा, रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, मुंशी प्रेमचंद, रामकुमार वर्मा 'भ्रमर", अमृता प्रीतम, शिवानी, नरेंद्र कोहली, भीष्म साहनी, धर्मवीर भारती जैसे लेखको के बहुचर्चित उपन्यास भी हमारे इस नायाब संग्रह की शान थे। इनके अलावा शौक़त हुसैन थानवी, इब्ने सफ़ी बीए, कर्नल रंजीत, आदिल रशीद, ओमप्रकाश शर्मा, ओमप्रकाश कम्बोज, समीर, चंदन, लोकदर्शी, प्रियदर्शी, भारत, ऋतुराज जैसे कई लोकप्रिय लेखकों, के नाम आज भी ज़हन में हैं। यही नहीं सैकड़ों उपन्यासों के कथानक और पात्र भी। आधा लाख के आसपास पढ़े गए इन उपन्यासों ने शब्दकोष को बढाने का काम तो किया ही, दिमाग़ पर धार भी ख़ूब हुई। लायब्रेरी में मौजूद राधेश्याम रामायण और मटरूलाल अत्तार कृत आल्हा-ऊदल के सभी खण्ड काव्य शैली जागृत करने वाले रहे। जिन्होंने उस छोटी सी उम्र में मात्रिकता, गेयता व लयात्मकता से अवगत कराया। आज बिना किसी संकोच कह सकता हूँ कि पढ़ने के शौक ने लेखन तक पहुंचाया। आज जितना सा भी टूटा-फूटा लिख पा रहा हूँ, इन्ही उपन्यासों और लेखकों की देन है। लेखन के अतिरिक्त तर्क-वितर्क, अन्वेषण, विश्लेषण जैसी कुछ खूबियां भी उसी दौर की देन है। स्मृतियों के झरोखे में बैठ कर इस लायब्रेरी के आधार कुछ सदस्य पाठकों के नामों का उल्लेख न करूं तो धृष्टता होगी। इनमें पहला नाम श्री अकोलकर साहब का है जो कचहरी के सामने विट्ठल मंदिर में अकेले रहते थे। दूसरा नाम शासकीय कन्या शाला की शिक्षिका श्रीमती शालिनी कांटे का है। जिनकी बेटी अंजली बाद में मेरी सहपाठी भी रही। इसी शाला की श्रीमती प्रभा टोकेकर, श्रीमती तारे मैडम, प्राथमिक कन्या शाला की शिक्षिका श्रीमती लीला शर्मा, हम तीनों भाइयों के शिक्षक व मार्गदर्शक रहे श्री विट्ठल राव जी आचार्य, महाराष्ट्र समाज के वरिष्ठ सदस्य श्री जीएम टिकेकर, इसी परिवार की सौ. करुणा टिकेकर, श्री श्याम मोहन पंड्या और घर के सामने रहने वाले श्री बाबूलाल जी शर्मा व अन्नपूर्णा बुआजी, ज़िला अस्पताल में लेब टेक्नीशियन रहे श्री केएम कुरैशी आदि के नाम अच्छे व नियमित सदस्यों में रहे। दो नाम विशेष रूप से याद हैं। इनमें एक श्री गोकुल प्रसाद सिंह कुशवाह नामक बुजुर्ग थे। कभी सेना में रहे मृदुभाषी श्री कुशवाह मुझ छोटे बालक को भी "प्रभात जी" कह कर संबोधित करते थे। महीना पूरा होते ही 2 रुपए का नोट थमाने वाले नुज़ुर्ग सदस्य पापूजी मोहल्ले में कहीं रहते थे। स्मृति में है वो दिन, जब उन्हें चुस्की ( रंगीन पानी की आइसक्रीम) का डिब्बा लिए सब्ज़ी मंडी में घूमते देखा। उनसे सदस्यता शुल्क लेना अब अपराध-बोध का विषय बन गया था मेरे लिए। तमाम बार मना किया किंतु वे नहीं माने। आग्रहपूर्वक पैसे हाथ में थमाते रहे। अरसे तक सदस्य रहे यह आदर्श बुजुर्ग बाद में बीमार हुए और इस दुनिया को अलविदा कह गए। ईमानदारी यह थी कि इससे पहले वे 2 रुपए और आखिरी उपन्यास लौटा चुके थे। उस दिन वे बेहद थके हुए नज़र आ रहे थे। उखड़ी साँसें अधिक बोलने की इजाज़त नहीं दे रही थीं। इतना ही बोल पाए कि अब किताब वो तबीयत ठीक होने के बाद ही लेने आएंगे। काश, वे आ पाते और आते रहते अरसे तक। अपने बाबा (दादा) की झलक देखने लगा था मैं उनमें। असली बाबा तो मुझे देखने से पहले ही स्वर्ग सिधार चुके थे। स्मृति में रची-बसी उन कृशकाय बुज़ुर्गवार की बेहद शालीन छवि आज भी आंखें भिगो देती हैं।  अब ये बात सच लगती है कि अच्छे इंसान याद रह जाते हैं।उन्हें याद किया नहीं जाता। एक सज्जन का नाम उदय कुमार हुआ करता था। घनी काली दाढ़ी-मूंछ और बेहद शानदार व्यक्तित्व। वे शायद न्यायालय में पदस्थ थे और पुरानी कचहरी के सामने वाली गली में स्थित श्री सुभाष बूँदीवाले के घर मे भूतल पर किराए से रहा करते थे। परिवार से आत्मीयता बढ़ी तो हमें भोजन पर बुला लिया एक दिन। जबकि वो ख़ुद अकेले हुआ करते थे तब। कृतित्व और व्यक्तित्व की अच्छाई से जुड़े ये दो उदाहरण बताते हैं कि आपके पास एक भी हो तो बहुत है। हमारे ही मोहल्ले में रायपुरा वाले पटवारी जी के मकान में किराए से रहने वाले श्री जेपी गुप्ता भी एक अच्छे इंसान व सदस्य के तौर पर स्मृति में हैं। जो शायद लोक निर्माण विभाग अथवा जल संसाधन विभाग में सेवारत थे। उनकी दो बेटियां पप्पी-बबली मेरी मम्मी की छात्राएं हुआ करती थीं।यह थी शौक़ के संस्थान में बदलने की एक रोचक व प्रेरक कथा। जिसने जीवन को एक दिशा दी। दिशा सही थी या ग़लत, यह अलग से सोचने का विषय है। वो भी अलग-अलग आयामों से। आज ना पापा हैं और ना उनका पुस्तकालय। वक़्त की दीमक सब चाट चुकी है। स्मृति अक्षुण्ण है जिसे अपने पापा के प्रति मेरी कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धांजलि कह सकते हैं आप। इति...💐                      #प्रणय_प्रभात(प्राप्त प्रतिक्रियाओं से मिलने वाली कुछ बातें और जोड़ी जा सकती हैं) पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए अग्रिम आभार।।r

#भावपूर्ण_संस्मरण अलविदा रमा के देव 😢😢😢 ■ मेरी स्मृति में क़ैद एक अमर किरदार ■ अंतिम प्रणाम अनूठे प्रेमरोगी को)

1982 में बनी फ़िल्म #प्रेमरोग हमारे शहर में कुछ माह बाद यानि 1983 में प्रदर्शित हुई। तब मैं हायर सेकेंडरी का छात्र था। बाक़ी मित्रों की तरह #फ़िल्म देखने में कोई ख़ास रुचि नहीं थी मुझे। हाँ, #कर्णप्रिय_गीत_संगीत हमेशा से आकृष्ट करता था। इस फ़िल्म के गीत सैकड़ों बार सुने थे। लगभग रट चुके थे। तब पता भी नहीं था कि इन मधुर गीतों के प्रणेता दादा #संतोषानंद जी से साक्षात भेंट का अवसर #साहित्यिक मंच पर मिलेगा। कभी वो मित्रसूची में भी साथ होंगे। बहरहाल, उस दिन स्कूल जाते समय कृष्णा टॉकीज़ के बाहर लगे बोर्ड पर नज़र गई। पता चला कि #आरके_फिल्मस के बैनर तले बनी प्रेमरोग लग चुकी है। बस,फिर क्या घा। लिया 1 रुपए 20 पैसे का टिकट और पहुंच गए हॉल में। किसी एक ख़ास विषय पर बना #कथानक दिल को कैसे छूता है। #रजतपट के चंद #किरदार हमारे दिलो-दिमाग़ पर कैसे हावी होते हैं। बेहतरीन गीत-संगीत #रूह में कैसे समाता है। एक-एक संवाद, एक-एक दृश्य #ज़हन में कैसे उतरता है, यह इसी एक फ़िल्म ने बताया। जिसके पीछे अहम #योगदान महान निर्माता निर्देशक श्री #राज_कपूर_साहब का भी था। जिनके कुशल निर्देशन में फ़िल्म का हरेक दृश्य यादगार बन गया। लाजवाब दृश्यांकन भी कभी नहीं भुलाया जा सकता। #टॉकीज़ में लगभग 3 महीने तक यह फ़िल्म चली। रोज़ फ़िल्म देखना धुन का हिस्सा बन चुका था। एक-एक दिन में दो-दो शो भी देखे मैंने। यह अकेली फ़िल्म थी जिसे क़रीब 150 बार से ज़्यादा देखा मैंने। टॉकीज़ के अलावा व्हीसीआर और टीव्ही पर भी। फ़िल्म के नायक #ऋषि_कपूर (देवधर उर्फ़ देव) और नायिका #पद्मिनी_कोल्हापुरे (मनोरमा उर्फ़ रमा) ने दिल में एक ख़ास जगह बनाई। ऋषि साहब की वो जगह आज भी दिल की गहराइयों में है। #लक्ष्मी_प्यारे जी के मादक संगीत और गीतऋषि #संतोषानंद जी के शानदार गीतों पर मस्ती से झूमते ऋषि दा का हरेक स्टेप आज भी ज़हन में है। इस कालजयी फ़िल्म  की कहानी की माँग के मुताबिक भावपूर्ण अदाकारी करने वाले ऋषि साहब के दुःखद निधन की ख़बर कुछ देर पहले फेसबुक पर मिली। यूं लगा कि जैसे कोई प्रियजन अकस्मात ही बिछड़ गया। लग रहा है कि कोई व्यक्तिगत क्षति हुई है। जो सदैव अपूरणीय रहेगी। नाता दिल का है और अनाम भी। स्तब्ध हूँ अपने बेहद पसंदीदा एक किरदार के हमेशा के लिए चले जाने से। इतना ही कह सकता हूँ #अलविदा_देव।             आप सच मे #ग्रेट_शो_मेन_राज_कपूर_साहब_की_विरासत_के_असली_वारिस_थे।😢   #भावपूरित_श्रद्धांजलि  
                     【प्रणय प्रभात

आओ हम एक गैंग बनाएं.... मंचों की अनंत सच्चाई पर एक अंतहीन कविता #प्रणय_प्रभात°

आओ, हम एक गैंग बनाऐं।सारी दुनिया रखें ताक पर, एक दूसरे की खुजलाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं।। ■तू मेरी, मैं तेरी गाऊं, हां में हां ही सिर्फ मिलाऊं।तू मेरा ग्राइप-वाटर बन,मैं तेरी घुट्टी बन जाऊं।।अपना राग अलग से रेंकें, अपनी ढपली अलग बजाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ आपस में ही कर लें बकबक,एक कुऐं के बन कर मेंढक।बजा करें जग के नक्कारे,सुनें एक दूजे की धक-धक।।राग बेसुरी होवे बेशक, मगर ताल से ताल मिलाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ जैसे-तैसे नाम कर लिया,हमने अपना काम कर लिया।गीत मुन्नियों पे रच-रच कर,खुद को झण्डू बाम कर लिया।।पीठ थपक लें अब आपस में, आपस में ही होड़ लगाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ माइक अपना, मंच हमारा,हर ठेके में, वारा-न्यारा।जीत गया तो अपना जीता,हार गया तो अपना हारा।।पानी में ही तलें पकोड़ी, गुड़ की जगह गुलगुले खाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं। ■ नया भोज, सब्जी बासी दें,खूब चपत, अच्छी-खासी दें।जोड़-जुगाड़ लगाकर धमकें,आपस में ही शाबासी दें।।चिकनाई पर फिसले दुनिया, आज घड़े चिकने बन जाऐं।आओ, हम एक गैंग बनाऐं।#अंततः (एक बहुचर्चित कविता का पैमाना उठाने के लिए मान. अटलबिहारी बाजपेयी जी की आत्मा से अग्रिम क्षमा-याचना,,,,         जिन्हें मिर्ची लगे उन्हें यह सलाह है कि एक बार अपने गिरहबान में जरूर झांकें, फिर जो चाहें, जहां चाहें, जमकर फांकें। #रचनात्मक_गिरोह_और_स्वयम्भू_सरगना

#सीधी_सपाट_खोले_कपाट (पढ़ लो, समझ लो, विचार लो)"

एक कंकरी फेंक झील में लहरें ला देना।तेल छिड़क के पानी में भी आग लगा देना।।पतझड़ में सूखे वृक्षों की शाख हिला देना।मस्त पवन के झोंको में भी गरल मिला देना।।सन्नाटों को बेध चीखना शोर मचा देना।निद्रामग्न परिन्दों को बेवक़्त जगा देना।।जिस थाली में खाना उसमें छेद बना देना।शांत क़बीलों में घुल मिल के रार ठना देना।।मलय पवन के झोंकों में दुर्गंध घोल देना।जोड़े रखने वाली गांठें सभी खोल देना।।पंख नोच लेना तितली के भ्रमर मार देना।जिए चैन से स्वयं वही सब पल बिसार देना।।आनंदित करते कलरव को कोलाहल करना।बच्चों की मासूम सोच में कालकूट भरना।।नैतिकता वाले बस्तों में आग लगा देना।पंख खोलते चूजों में उन्माद जगा देना।।मादक सुर लहरी को पल में क्रंदन कर देना।बोझिल बोखिल आँखों में अंगारे भर देना।।नहीं समझ इन सबसे तेरा नाता है।मुझको भी हर खेल खेलनाआता है।।मुझको अपनी क्षमताओं पर दर्प नहीं।भूल गया है तू मानव है सर्प नहीं।।मानव मन में मानवता की आस जगा।मत मधुवन में वैमनस्य की आग लगा।।अपने ही घर को यदि मरघट कर देगा।उपवन की क्यारी में शोणित भर देगा।।यूं फूंकेगा ऊपर जाती सीढ़ी को।क्या देकर जाएगा भावी पीढ़ी को??समय अधिक ना शेष विशेष यही दो पल।मिलकर सोचें कैसे सुंदर होगा कल।।                                       #प्रणय_प्रभात

#ख़ुद_के_हवाले_से.... #आंकलन_ख़ुद_का_आह्वान_समस्त_अभिभावकों_का

(अपनी नस्लों की भलाई के लिए पढ़ें)बेशक़, मैं एक दोयम दर्जे का विद्यार्थी रहा। बेशक़, मेरी अंकसूचियों में प्राप्तांकों का ग्राफ़ (एक बार को छोड़ कर) कभी भी 50 फ़ीसदी से ऊपर नहीं उठ पाया। बेशक़, मैंने एक और दो विषय की पूरक परीक्षा में बैठने का लुत्फ़ चार बार लिया। बेशक़, मेरे शिक्षकों का नज़रिया मेरे भविष्य के प्रति अच्छा नहीं रह। बेशक़, मैं अकादमिक योग्यता के बलबूते कोई मुक़ाम हासिल नहीं कर पाया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरा दिमाग़ कुंद था। ऐसा भी नहीं था कि मैं पढ़ने-लिखने में कमज़ोर था। सुविफ या संसाधनों की कमी जैसे हालात से रूबरू माता-पिता ने कभी नहीं होने दिया। कमी कुछ रही तो उस समय और मार्गदर्शन की, जो औरों में बंट गया। संयुक्त परिवार की सभी ज़रूरतों की पूर्ति में जुटे पालकों को यह फुरसत वक़्त ने ही नहीं दी, कि प्रेरक या प्रोत्साहक बन पाते। रही-सही कसर संभावनाओं की तलाश को लेकर बरती गई उदासीनता ने पूरी कर दी। उन दिनों कैरियर काउंसिलिंग जैसी कोई प्रक्रिया भी नहीं थी। सन 1980 में मिडिल पास कर कक्षा 9 में दाखिला लेना था। तभी वाणिज्य (कॉमर्स) विषय वजूद में आया। इस विषय के बारे में कोई इल्म मुझे तो क्या मेरे माता-पिता तक को भी नहीं था। उन्होनें बस सहकर्मियों की सलाह मानी और सिर पर लाद दी वाणिज्य की पोटली। जब तक विषय को लेकर समझ व रुचि पैदा होती, मन स्वाध्याय, धर्म-संस्कृति और सृजन की ओर मुड़ चुका था। हायर सेकेंडरी की परीक्षा श्री गजेंद्र जैन भाई साहब की कृपा से एक बार में पास करना गुनाह बन गया। नतीजा ये निकला कि कॉलेज तक इस विषय ने पीछा नहीं छोड़ा और हमने गज्जू भाई साहब का। रो-पीट कर स्नातक होने के मोड़ तक आए तो फिर से एक अनचाहा अपराध आड़े आ गया। कॉलेज में स्नातकोत्तर (पीजी) कक्षाओं की शुरुआत के लिए कचहरी के बाहर आन्दोलम चला। दिन बीतने लगे परन्तु सुनवाई के आसार नहीं के बराबर बने रहे। आंदोलन साँप के मुँह में छछूंदर यानि गले की हड्डी बन गया। सीनियर छात्र एक दल बनाकर भोपाल कूच कर गए। डेरा-तम्बू हम  छुटमैयों के हाथ आ गया। क्रमिक धरना अब आपदा लगने लगा था सभी को। एक दिन कनात के पास लटके रोलप बोर्ड पर धरने का नेतृत्व मेरे नाम कर दिया गया। यह शायद संयोग रहा कि मज़ाक़ मज़ाक़ में किया गया यह काम मज़ाक़ बनने से बच गया। दोपहर तक पता चला कि कुछ मांगें मां ली गई हैं। सीनियर्स ने बाक़ायदा धरना उठाने का एलान किया। बतौर नेता दो-चार फूल मालाओं के साथ एक गिलास जूस हमें नसीब हुआ। अव शीघ्र शुरू होने जा रही कॉमर्स की पीजी क्लास में प्रवेश लेना अपनी नैतिक जिम्मेदारी बन चुका था। एक दिन सेहरा बंधने की सज़ा दो साल भुगतनी पड़ी। नतीज़ा वही ढाक के तीन पात। थर्ड क्लास स्टूडेंट का तमगा अपने ही क़ब्ज़े में बना रहा। इस तरह जीवन के वो आठ साल वाणिज्य की वेदी में होम हो गए, जो भविष्य के निर्धारक साबित होने थे। अब लगता है कि उस दौर में ट्रेक बदलने की थोड़ी समझ और गंभीरता खुद के ही पास होती। काश #तारे_ज़मीं_पर और #थ्री_इडियट्स टाइप की फिल्म उस दौर में बनी होतीं। साथ ही उन्हें देखने की मोहलत माता-पिता को मिल गई होती। संभव था कि कला के क्षेत्र में भविष्य निर्माण संभव हो पाता। बहुत बड़े #तुर्रम_खां बेशक़ नहीं बन पाते। ना ही अपने नाम का झंडा माउंट एवरेस्ट की चोटी पर लहराता। मगर उतने उपेक्षित भी नहीं रहते, जितने रहे। जिस समाज में #कायस्थ_का_बच्चा_पढ़ा_भला_या_मरा_भला जैसी कहावत प्रचलित हो। जिस समाज में पद के अनुसार पूछ-परख मिलती हो। उस समाज और खानदान में सरकारी नौकरी के बिना पूछ होने का सवाल ही नहीं। सामाजिक व सार्वजनिक क्षेत्र में योगदान के लिए एक अच्छा पद अनिवार्य होता है। जो बेहतरीन अकादमिक पृष्ठभूमि के गर्भ से उपजता है। इन कड़वे तजुर्बों की टीस ने सोचने पर बाध्य किया। तब लगा कि जिन्हें #जाम्बुवान बन कर भूली शक्ति का आभास कराना था, वो पूरी कर्मठता के साथ औरों के पौधों की सिंचाई में जुटे थे। कुछ साल पानी का पाइप हमारे भी हाथ में रहा। पराई धरती के सारे पौधे सरसब्ज़ होते हुए छतनार वृक्ष बन गए। यह और बात है कि बरगद पनपाने की इस कोशिश में अपनी ही जड़ें सूखती चली गईं। हालांकि कालांतर में कुछ और योग्यताएं अपने बलबूते अर्जित कीं। यह और बात है कि तब तक भविष्य को दिशा देने की उम्र बीत चुकी थी। जीवन निर्वाह के लिए बाद में जो किया वो शर्म नहीं गर्व का विषय है। सेवा का जो अवसर मिला वो ईश्वरीय कृपा मान कर स्वीकार किया। थोड़ी-बहुत पहचान भी उसी की प्रेरणा व अनुकम्पा से मिली। जीवन के प्रति क्षोभ या असन्तोष का भाव लेशमात्र भी नहीं है। यह सब लिखने का मक़सद ना किस्मत को कोसना है, ना उलाहना देना। मंशा केवल माँ-बापों को आगाह कराने की है। उन्हें यह बताने की है कि अपनी संतानों को केवल सुविधा ब संसाधन देकर अपने दायित्व की इतिश्री ना करें। उनकी क्षमता व योग्यता का आंकलन करते हुए उनकी रुचि, अभिरुचि को पहचानें। उनके अच्छे भविष्य की संभावनाओं को समय रहते परखें। उन्हें उनके हिस्से के उस समय व प्रोत्साहन से वंचित न करें, जो कोई और नहीं दे सकता। याद रहे कि मंदिर या मस्जिद में दिया जलाना भी तभी सार्थक है जव ख़ुद का घर रोशन हो। अपनी बात का समापन अपने ही एक शेर के साथ करता हूँ अव, जो इस लेख को लिखने की वजह बना। अर्ज़ करता हूँ कि -"मैंने इतनी बार खोई हैं सफ़र में मंज़िलें।अब भटकते देख के औरों को डर जाता हूँ मैं।।"        इति। कल्याणमस्तु।।                         #प्रणय_प्रभात

#दौर_बचपन_का #मांझे_की_सुंताई_और_पतंगबाज़ी(दिली रिश्तों के स्वर्णकाल को समर्पित मेरा एक और भावपूर्ण संस्मरण)

चलिए साहब! आज फिर पलटता हूँ #अतीत का एक और पन्ना। अपने #बचपन के हवाले से। यक़ीन है कि आप में से तमाम को #दास्तान के हिस्से #आपबीती जैसे लगेंगे। बात 1970 के दशक के आख़िरी दौर की है। ये वो दौर था जब मनोरंजन भी #सीजनल होता था। गर्मियों की छुट्टी #मनोरंजन के माध्यम तलाशती थीं। सबसे पहले याद आती थी #पतंगबाज़ी। यह एक शग़ल था, जो हर तरह का भेद ख़त्म कर देता था। मोहल्लों की छतें प्रतिद्वंद्वियों का खेमा होती थीं। नीला खुला आसमान रंग-बिरंगी पतंगों का समरांगण। तपती हुई चूने की छतों पर पहुंचने की बेताबी दोपहर को सोने नहीं देती थी। पापा के दफ़्तर से लौटने का इंतज़ार आम बात था। जो अपने साथ लेकर आते थे दर्ज़न भर से भी ज़्यादा पतंगें। अलग-अलग रंग व आकार वाली। बड़े डिग्गे खुद के लिए। छोटी और मंझोली हम तीनों भाइयों के लिए। जिन्हें लम्बा पुछल्ला बांध कर उड़ाना व हवा में साधे रखना आसान होता था। रात को सोते में खटिया से बाँध दो, तो सुबह तक उड़ती मिले। हवा के साथ फर्र-फर्र करते और गच्चे खाते डिग्गों को संभालना बच्चों का खेल था भी नहीं। लिहाजा उन्हें उड़ाने व गोते खिलाने का विशेषाधिकार पापा को हुआ करता था। जो किसी भी शौक को पूरा करने के मामले में बेहद धुनी थे। उनके सब शौक़ दीवानगी की हद तक होते थे। कस्बानुमा श्योपुर में पतंग और डोर (मांझे) की उपलब्धता का इकलौता केंद्र चौराहा होता था। जो अब सूबात चौराहा कहलाता है। बोहरा बाज़ार को ओर जाने वाले मार्ग पर सबसे बड़ी दुकान शाकिर भाई की होती थी। जो बोहरा समाज के थे। गोली-बिस्किय, टॉफी, चॉकलेट की इस सबसे बड़ी दुकान पर गर्मियों में पतंगों का अंबार लग जाता था। पास ही एक गुमटीनुमा दुकान सलीम भाई उर्फ़ #आलाबन्दा की होती थी। जो मूलतः नीलगर (रंगरेज़) थे और यहीं पर कपड़ों को रंगने का काम साल भर करते थे। तीसरा केंद्र मेन बाज़ार की ओर जाने वाले रास्ते के नुक्कड़ पर लगने वाला हैदर भाई का ठेला था। वो भी बोहरा समाज के थे और मूल रूप से सिलाई में काम आने वाली चीजों के विक्रेता थे। चौराहे की पुरानी पुलिस चौकी की सीढ़ियों के पास दीवार से सट कर उनका ठेला लगा करता था। हाथ के पंजे को फैलाकर अंगूठे और छोटी उंगली के बीच मांझे की लच्छी बना कर बेचने में तीनों माहिर थे। हर मांझा #बरेली का बता कर बेचा जाता था। पेंच काटने तक मांझा असली सा लगता था। जिससे पतंग कटते ही मोह भंग भी हो जाता था। इसी पशोपेश में रास्ता खोजा गया, ख़ुद मांझा बनाने का। रोचक परंतु अच्छी-खासी मेहनत, मशक़्क़त वाला काम। अरारोट, सरेस के घोल को रंग डालकर लगातार चलाते हुए पकाना। उसमें बारीक पिसा और छना हुआ कांच मिलाकर गाढ़ी लुगदी तैयार करना।कांच के बेहद बारीक पाउडर के लिए सबसे अच्छा माध्यम होता था बल्ब। जिन्हें अधिक संख्या में तलाशना भी एक समस्या थी। उस समय बिजली बहुत से घरों में नहीं होती थी। आती भी कम थी, लिहाजा बल्ब कम खराब होते थे। फुंके बल्बों का मोल और महत्व हमें पता था। लिहाजा उन्हें संभाल कर रखा जाता था। अडोस पड़ोस से खोज और मांग के लमने में भी कोई संकोच नहीं था। तैयार लुगदी के ठंडा होने से पहले बीच सड़क पर डीएमसी की सूती डोर को बिजली के खम्बों के बीच बांधना हमारा काम था। फिर लुगदी को कपड़े में लेकर डोर पर घिसते हुए परत की तरह चढ़ाना पापा का। परत कितनी बार चढ़ेगी और मांझा कितना कड़क रखा जाएगा, यह विशेष ज्ञान की बात थी। बाद में लुगदी की सामग्री में  अंडा भी धीरे से शामिल हो गया। किसी ने सुझाया होगा ज़रूर इस बारे में। घर मे दादी, मम्मी और दो बुआओं के कारण भारी छुआछूत का संकट था। लिहाजा अंडा छुपाकर मंगाया व डाला जाता था। लुगदी बनाने के लिए पीतल की एक पुरानी सी भगोनी अलग थी। एक काला पड़ चुका स्टील का चमचा भी। ऊपरी मंजिल पर बनी रसोई में जाने की कोई छूट तब थी नहीं। नीचे ही किया जाता था सारा फोफंड। पीतल की गोल टंकी और तीन टांगों वाला एक स्टोव्ह इसी काम के लिए आरक्षित था। पापा बड़े जतन से यह सारा काम करते। हम केवल सामान की उठाई धराई में उनकी मदद करते। ज़ोखिम वाला कोई काम हमसे नहीं कराया जाता था। हम घर के मोड़ और गीता भवन के बाहर लगे बिजली के खम्बों के बीच डोर बांधते। सुंताई के बाद मांझे के सूखने तक गुज़रने वाले राहगीरों का ध्यान उसकी ओर आकृष्ट कराते। बाद में उसे लपेटने के दौरान चरखी पकड़ते। मांझा बाज़ारू मांझे से ज़्यादा धारदार होता था। पतंग तो काटता ही था, उंगलियों में भी कट लग जाते थे। यही काम मोहल्ले के कुछ अन्य पतंगबाज़ भी करते थे। जिनका उल्लेख आगे आएगा। मांझा सूतने और छत पर पहुंचकर पतंगबाज़ी का लुत्फ़ लेने के बीच एक आपदा कॉमन थी। वो थी मांझे में घुडी पड़ने यानि डोर के उलझने की। चरखी घुमाने की धीमी गति इस संकट का सबब बनती थी। यही समय होता था जब मांझे की दुर्गत से भन्नाए पापा में दुर्वासा ऋषि की आत्मा आ जाती थी। कभी कभी वो महर्षि भृगु बनकर प्रसाद भी दे देते थे। उनकी पतंगबाज़ी के दौरान चरखी पकड़ना अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम था। पेंच कटते या पतंग के गच्चा खा कर डूबते ही पापा के इकहरे बदन में मानो बिजली सी दौड़ जाती थी। पतले और लम्बे हाथों से बो सारी डोर तेज़ी से खींच लेते थे। उसे घुडी से बचाने के लिए डोर को खींचने के लिए वो पूरी छत पर घूमते थे। हम पैर में मांझा न उलझने देने को लेकर चौकन्ने रहते और तेज़ गति से चरखी घुमाने का प्रयास करते। सफल होते तो भरपूर शाबासी भी मिलती। #ये_काट्टा और #भक्काटा जैसी जोश भरी आवाज़ें तव मिनट मिनट पर गूंजती थीं। कितनी काटीं और कितनी कटी बाद में डींगमारी और समीक्षा के विषय होते थे। अगले दिन की रणनीति पर विचार भोजन और शयन के बीच हो लेता था। हमारा मोहल्ला बेहद चर्चित और जागृत रहा है हमेशा से। तब अधिक सुरम्य व चेतन था। आपस में जितना मेलजोल था उतनी ही होंडा-होड़ी भी। घर के सामने पूर्व दिशा की ओर अधिकांश मकान बोहरा समाज के हैं। हर छत पर एक झुंड मौजूद होता था। इसी दिशा में कुछ निचाई वाली छत पर मन्नू चाचा उर्फ़ रामभरोसे शर्मा (पोस्टमेन) पतंग उड़ाने और पेंच लड़ाने को तैयार दिखते। उनके सामने सेजने वाली गली की छतों पर हमारे संगी साथी अपनी पूँछदार पतंगें उड़ाया करते। जिनमें ज्ञानचंद गुप्ता, मुकेश गुप्ता, पोखरमल सिंहल, सत्यनारायण गुप्ता उर्फ़ सत्या, विशाल दुबे उर्फ़ टीटू, राकेश मुखीजा उर्फ़ राधे, संतोष बलोठिया और परिजन ख़ास थे। पश्चिम की ओर दबदबा हरिओम गौड़ भाई साहब, जगदीश मुदगल (काका), राजनारायण मुदगल उर्फ़ पप्पू, सुभाष जी शाहीवाले और कचहरी की छत से उड़ने वाली पतंगों का रहता था। घर से सटी छत पर मित्र संतोष गंगवाल कभी साझेदार तो कभी बड़े प्रतिद्वंद्वी होते थे। सामने बाबूलाल शर्मा जी की छत पर किराएदार राजकुमार उर्फ़ राजू पाठक की धाक होती थी। अंकल बाबूलाल जी भी अक्सर जोश में आ जाते थे। पास ही श्री निरंजन बूँदीवाले, लक्ष्मण सोनी भी कभी कभी हाथ आजमा लेते थे। गीता भवन की छत पर सत्यप्रकाश भगत जी के भाई रामप्रकाश गौतम उर्फ़ रामू भाई साहब का आधिपत्य होता था। पास ही सूरज नारायण शर्मा भी यह शौक़ रखते थे। रायपुरा वाले पटवारी जी और मजुमदार साहब के बाड़े की विशाल छतों पर भी तमाम पतंगबाज़ सक्रिय होते थे। हमारे इलाके यानि पंडित पाड़ा की पतंगें हवा की दिशा के मुताबिक बोहरा बाज़ार, छारबाग, अंधेर बावड़ी, सूबात चौराहे और कचहरी तक रुतबे से उड़ान भरती। कुछ फ़तह हासिल कर  शान से लौटतीं और दो-दो दिन जौहर दिखातीं। कुछ उड़ान के बाद ही वीरगति पा जातीं। पतंगों में तंग व कन्नी बांधना तब हुनर माना जाता था। पतंग के ठड्डे को खोपड़ी पर घिसकर लचीला करना, बड़ी पतंगों को किनारों से पकड़कर ऊंचा उठाते हुए छुट्टी देना और उलझने पर सुलझाने के लिए दौड़-धूप करना भी आनंदप्रद होता था। कटी हुई पतंग के साथ मांझे को लूटने की कोशिश में किसी को महमूद गजनवी बनने से गुरेज़ नहीं होता था। शरारती तत्व उड़ती पतंग को लंगड़ डाल कर गिराने व लूटने की बेजा कोशिश भी पूरी विशेषज्ञता के साथ करते थे। मांझा छोड़ने व पतंग लौटाने की लेकर मान मनोव्वल के साथ तक़रार भी आम बात थी। झंझट भी हो जाती थी जिसे अगले ही दिन भुला दिया जाता था। पतंग के साथ कंदील उड़ाना भी तब प्रचलन में था। हालांकि मामला कुछ खर्चीला होने के कारण सबके बस की बात नहीं था। यही वो दौर था जब घरों से ज़्यादा छतें गुलज़ार होती थीं। आपस में जुड़ी छतें पड़ोसियों के प्रति प्रेम और विश्वास की प्रतीक होती थीं। आपस की तनातनी नाम को नहीं थी। बस पतंगों की पेंचबाज़ी से ही काम चल जाता था। आपस में बातचीत और मुलाक़ात की गवाह भी छतें ही होती थीं, जो समय के साथ वीरान होती गईं। अब इन्हीं सूनी छतों पर इंसान नहीं हिंसक बन्दर नज़र आते हैं। लोग अपनी चारदीवारी में क़ैद रहने को सुकून मानने लगे हैं। एक दूसरे से बातचीत भूले-भटके या प्रयोजनवश होती है। दीदार होना भी समय सुयोग पर निर्भर है। भौतिक संसाधनों की भरमार ने उत्साह व ललक को मार सा दिया है। शाकिर भाई, हैदर भाई और सलीम भाई अपने कारोबार बदल चुके हैं। बहुत से पतंगबाज़ दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। बाक़ी अपने घर परिवार में सिमट चुके हैं। मोहल्ला तमाम चेहरों व परिवारों को गंवा कर वीरानगी की कगार पर है। मकानों का जीर्णोद्धार हो गया है और आपसी रिश्ते जीर्ण-शीर्ण होते हुए लगभग खंडहर हो गए हैं। अतीत की स्मृतियों को ताज़गी देने के  पीछे का मेरा एक मक़सद इन्हीं खंडहरों में कृतज्ञता व सम्मान का एक चिराग़ रोशन करना भी है। क्योंकि जो कुछ हूँ, अपने इसी मोहल्ले की मिट्टी और आबो-हवा की वजह से हूँ। कृतज्ञ उस दौर के प्रति भी हूँ जो दिल के #रिश्तों_का_स्वर्णकाल होता था। दिखावे को नहीं बल्कि हक़ीक़त में। उड़ने को श्योपुर के आसमान पर अब साल भर पतंगें उड़ रही हैं, लेकिन वो बात नहीं। अब मामला नई पीढ़ी के शौक का है। जिन्हें नगरी में पतंगबाज़ी के इतिहास का एक अक्षर याद नहीं। इति।।                      #प्रणय_प्रभात#नोट :-(लिखे हुए में कुछ घटेगा नहीं। हां, बढ़ ज़रूर सकता है। याद आने के साथ-साथ। इस आलेख में मैंने #मांझा शब्द उपयोग किया है। जो श्योपुर में नहीं बोला जाता। हम उसे #मंजा कहते रहे हैं हमेशा से। बहरहाल, आभार दादा हरिओम जी गौड़ और भाई संतोष बलोठिया के प्रति, जिन्होंने यह विषय सुझाया) 😊😊😊

Thursday, May 21, 2020

#लघुकथा / #बेरहमी 【प्रणय प्रभात】

आठ बाय आठ का एक कमरा। फ़र्श पर आड़े-तिरछे पसरे आठ प्राणी। कोशिश ढाई हजार के लोकल कूलर में घुस जाने की। आखिर पहली बार पेट काट कर लाया गया था वो। ठंडी हवा पर सबका साझा हक़ था। कमरे का माहौल लगभग अगहनी सा था। अचानक एक झटके से बिजली चली गई। बेरहम आषाढ़ ने सभी को झकझोर कर जगा दिया। कोने में रखा छोटा सा कूलर आँखें मलते बेबसों को देख कर अब बेहद शर्मिंदा था।😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢

#आज_की_रेसिपी / प्रणय प्रभात #ओला_का_घोला (बनाइए, खाइए और खिलाइ ए)

😊 सामग्री :-■ 10 ओले (50-50 ग्राम के)■ सरसों का तेल 100 ग्राम■ मिक्स गरम मसाला 25 ग्राम■ बारीक कुटे हुए मेवे 75 ग्राम■ अदरक, लहसुन का पेस्ट 2 चम्मच■ नमक, मिर्च, हल्दी स्वादानुसार     जैसा कि आप सब जानते हैं। इन दिनों हर तरह की सब्ज़ी पर बैन है। फल-फ्रूट भी उपलब्ध नहीं हैं। हाँ, 100% शुद्ध व प्राकृतिक ओलों की आपूर्ति भरपूर हो रही है। आइए, उन्हीं से बनाते हैं आज का लज़ीज़ व्यंजन #ओला_का_घोला।😊 विधि :-सबसे पहले जलती हुई गैस पर एक पतीला चढ़ाइए। पतीले के अच्छे से गर्म हो जाने के बाद धार बनाकर सरसों का तेल डालिए। तेल कड़कने के बाद अदरक, लहसुन का पेस्ट डालकर काला होने तक भूनिए। अब ऊपर से गरम मसाला डालते हुए मिश्रण को चलाते जाइए। जली-भुनी सी गंध आने पर एक-एक ओला उठा कर सावधानी से मिश्रण में डालिए। उन्हे मिश्रण में लपेटते हुए तब तक चलाएं। जब तक कि वो दिखने बन्द न हो जाएं। अब सारा मेवा ऊपर से डाल दें। अंत में नमक, मिर्ची, हल्दी मिलाकर झोंक दें और गर्मागर्म सर्व करें। याद रहे कि पानी बिल्कुल नहीं डालना है। ओले ख़ुद पर्याप्त मात्रा में पानी छोड़ते हैं। पकाते समय "ओले, ओले, ओले, ओले, ओले, ओले" वाला गीत भी गुनगुनाएंगे तो स्वाद में और इज़ाफ़ा होगा।                 #प्रणय_पकाऊ😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜#लॉकडाउन_की_चकल्लस

#तेवरी / फिर क्या तू है? (ग़ज़ल ठेठ देशी भाषा में) 【प्रणय प्रभात】

■ तू ऐसा है, तो क्या तू है?तंत्र यही है तो फिर थू है।।■ मत दे परिचय मुझे पता है।वैशाली की नगर-वधू है।।■ बतलाता फिरता है मेहंदी।हाथों में जो लगा लहू है।।■ तेरी दुनिया मरघट जिसमें।बू का मतलब बस बदबू है।।■ ये अंधेर नगरी चौपट की।जिस को देखो बेकावू है।।■ ऊधो-माधो एक सरीखे।वो फांकू है ये हांकू है।।                          #प्रणय_प्रभात

#संस्मरण- प्रणय प्रभात #पीला_डिब्बा_हरा_खजूर (इस घी की बात ही अलग थी हुजूर।

मेरे साथ के ##पीला_डिब्बा_हरा_खजूर(इस घी की बात ही अलग थी हुजूर)#संस्मरण / #प्रणयमेरे साथ के जी नहीं मुझसे पुराने लोग #टीन के इस #डिब्बे से बख़ूबी वाकिफ़ होंगे। ये हमारे दौर के निम्न मध्यम व निम्न ही नहीं उच्च वर्ग  का भी पसंदीदा घी था। जिसे #डालडा के नाम से देश भर में पहचाना जाता था। डालडा यानि वनस्पति तेल से निर्मित शुद्ध, स्वादिष्ट व दानेदार घी। जिनके बज़ट में शुद्ध देशी नहीं आता था। उनके लिए यह एक शानदार और #किफ़ायती_विकल्प था। एक और पांच किग्रा वज़न के डिब्बों में यह आता था। जो बाद में 15 किग्रा के कनस्तर में भी आने लगा। #सीधी_उंगली_से_घी_नहीं_निकलता वाली कहावत शायद तभी जन्मी होगी। हमारा बचपन इस घी पर काफ़ी हद तक निर्भर रहा। लिहाजा इस का स्वाद आज भी याद है। परांठों के लिए तो यह चिकनाई का एक माध्यम था ही। बासी रोटी निपटाने में भी मददगार था। इसे गर्म कर के एक बासी रोटी पर लगाना। फिर नमक और मिर्च बुरक कर दूसरी रोटी पर चुपड़ना रोज़ का काम था। रोटी की पुंगी बना कर खाना और अघाना भी दिनचर्या का अंग। इस घी ने ना कभी पेट बिगाड़ा, ना कोई और व्याधि दी। इससे घर परिवार का नाता सालों तक रहा। बाद में इसकी जगह तमाम ब्रांड आते गए और यह रसोई से ग़ायब हो गया। यह अलग बात है कि इसकी गुणवत्ता और स्वाद को कोई भी ब्रांड आज तक चुनौती नहीं दे पाया है। कम से कम दस सदस्यों की मौजूदगी वाले मेरे घर में डालडा का उपयोग दो दशक से भी ज़्यादा समय तक हुआ। वजह थी शाम को पक्का भोजन बनना। सुबह चौके में लक़ीर खींच कर कच्चा भोजन दादी या बुआ बनाती थीं। शाम को पक्का भोजन मम्मी। दादी और बड़ी बुआ मम्मी के हाथों बना कच्चा भोजन (जिसे "सकरा" कहते थे) नहीं करती थीं। इसके पीछे की वजह आज तक नहीं पता। बस इतना याद है कि सुबह रोटी तो शाम को तिकोने व गोल परांठे बनाए जाने की परंपरा घर में प्रचलित थी। मज़ेदार बात यह थी कि रसोई में खड़िया से खींची गई लक़ीर किसी लक्ष्मण-रेखा से कम नहीं थी। किसी की मजाल नहीं थी कि उस लक़ीर को छू भी पाए। चूल्हे की आंच पर बनने वाली रोटी एक-एक कर लक़ीर से बाहर आती और बारी-बारी से मिलती। इस चक्कर में रोटियां कुछ ज़्यादा ही खाने में आतीं। ज़ोर की भूख लगने या सब्र न हो पाने की स्थिति में हम भाई अपनी थाली की रोटी की अधबंटाई भी कर लेते थे। भूख और बेसब्री का एक कारण भोजन बनने में होने वाली देरी भी होता था। जिसके पीछे की वजह दादी व बुआ का पूजा-पाठ व नियमित सत्संग भी था। जिसका केंद्र घर से सटा गीता भवन होता था। अवसर रात के बचे परांठे सुबह अचार के साथ निपटाए जाते थे। सुबह की बची रोटी दोपहर बाद डालडा चुपड़कर खाई जाती थी। अन्न के प्रति आदर का भाव होता था। क्योंकि उसकी क़ीमत का अंदाज़ा था। शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में बनने वाली पूड़ियाँ भी गुजिया जैसे अन्य पकवानों की तरह इसी घी में तली जाती थीं। बची हुई पूड़ियों को धूप में सुखा कर रखने और पतले दही में गलाने के बाद मिर्च, नमक डाल कर खाने का भी अलग मज़ा था। यह प्रयोग बरसों बाद देशी घी से निर्मित पूड़ियों पर भी कर के देखा। यक़ीन मानिए, वो स्वाद आया ही नहीं। बासी रोटी पर देशी घी के साथ नमक, मिर्च लगा कर खाने में वो लुत्फ़ नहीं मिला, जो बचपन में मिलता था। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में गिरावट का यह नायाब उदाहरण हो सकता है। हम दावे से कह सकते हैं कि तब का नक़ली घी आज के असली घी से कई दर्जा बेहतर था। बताते हैं कि सन 1930 के आसपास यह घी नीदरलैंड से भारत आया। जहां डाडा एंड कंपनी इसे बनाती थी। इसकी पहचान हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल के रूप में हुई। भारत में इसे शुद्ध देशी घी के सस्ते विकल्प के रूप में स्वीकारा गया और यह देखते ही देखते रसोई का राजा बन गया। यहां इसकी बिक्री व खपत ज़ोर की रही। तो इसका निर्माण भी यहीं होने लगा। डाडा के बीच हिंदुस्तान लीवर लि. का "एल" जुड़ा और इसका नाम #डांडा से #डालडा हो गया। इस ब्रांड की स्वीकार्यता और महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज किसी भी ब्रांड के वनस्पति घी को डालडा ही कहा जाता है। ठीक वैसे ही जैसे लोहे की हर आलमारी #गोदरेज_की_आलमारी कहलाती है। उम्मीद है नक़ली घी के ज़ायके की ये असली दास्तान आज की पीढ़ी को भी लुभाएगी। वहीं पुरानी पीढ़ी इस संस्मरण की सत्यता पर पुष्टि की मोहर लगाएगी।                       #प्रणय_प्रभात(आपके अनुभव इस लेख में कुछ बातें और भी जुड़वा सकते हैं। जैसे आदरणीय भाई साहब श्री अरुण ओसवाल जी की मेरे इस लेख पर यह सटीक प्रतिक्रिया, जो अपने आप में इस लेख के अगले हिस्से की तरह रोचक एवं पठनीय है। पढ़िए आप भी :-#श्री_अरुण_जी_ओसवाल_उवाचःवाह प्रभात जी ...."दास्तांने डालडा ओर उसकी निजी जीवन में  उपयोगिता"  शानदार आत्मकथ्य। इस डालडा ने उन तमाम परिवारों की आबरु भी बचायी जो शुद्ध घी के अभाव में किसी के सामने रूखी रोटी खाने मेंं शर्मिंदगी महसूस करते थे। इस घी की लोकप्रियता का आलम यह था कि बडे नाम वालों के यहाँ भी थेलों में छिपकर जाते हुए देखा है।कभी वनस्पति घी के नाम से प्रचलित हेय दृष्टि से देखे जाने वाले इस घी के हर घर तक पहुंच बनाने के किस्से भी कम दिलचस्प नहीं रहे।ग्रामीण परिवेश और कुछ गिने चुने सम्पन्न लोगों को छोड कर अधिकांश निम्न उच्च मध्यम वर्ग वाले इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाने के लिए डालडा कम्पनी वाले यहाँ पोस्टआफिस के बाहर बाकायदा स्टाल लगाकर वहीं हल्वा बनाने और लोगों को मनुहार कर फ्री में खिलाने की बात बुजुर्गों से सुनी है।और इसके बाद लगभग घर मेंं इसने  तब तक अपना जलवा कायम रखा जब तक इसका प्रतिद्वंद्वी "रथ" वनस्पति बाजार में नहीं आया।डालडा के साथ एक मजेदार किवदंती और थी कि डालडा की रसोई खाने के बाद चाय पीली जाए तो यह जल्दी पच जाता है तो एक समय की चाय के चलन वाले उस दौर में किसी आयोजन की अथवा तीज त्योहार की रसोई खाने के बाद दुबारा चाय मिलने का आनन्द ही कुछ और होता था।आपका आत्मकथ्य लेख अच्छा और सराहनीय है।Arun OswalHariom GaurAnand BhatnagarSuchetan Bhatnagarइस घी की बात ही अलग थी हुजूर)#संस्मरण / #प्रणयमेरे साथ के जी नहीं मुझसे पुराने लोग #टीन के इस #डिब्बे से बख़ूबी वाकिफ़ होंगे। ये हमारे दौर के निम्न मध्यम व निम्न ही नहीं उच्च वर्ग  का भी पसंदीदा घी था। जिसे #डालडा के नाम से देश भर में पहचाना जाता था। डालडा यानि वनस्पति तेल से निर्मित शुद्ध, स्वादिष्ट व दानेदार घी। जिनके बज़ट में शुद्ध देशी नहीं आता था। उनके लिए यह एक शानदार और #किफ़ायती_विकल्प था। एक और पांच किग्रा वज़न के डिब्बों में यह आता था। जो बाद में 15 किग्रा के कनस्तर में भी आने लगा। #सीधी_उंगली_से_घी_नहीं_निकलता वाली कहावत शायद तभी जन्मी होगी। हमारा बचपन इस घी पर काफ़ी हद तक निर्भर रहा। लिहाजा इस का स्वाद आज भी याद है। परांठों के लिए तो यह चिकनाई का एक माध्यम था ही। बासी रोटी निपटाने में भी मददगार था। इसे गर्म कर के एक बासी रोटी पर लगाना। फिर नमक और मिर्च बुरक कर दूसरी रोटी पर चुपड़ना रोज़ का काम था। रोटी की पुंगी बना कर खाना और अघाना भी दिनचर्या का अंग। इस घी ने ना कभी पेट बिगाड़ा, ना कोई और व्याधि दी। इससे घर परिवार का नाता सालों तक रहा। बाद में इसकी जगह तमाम ब्रांड आते गए और यह रसोई से ग़ायब हो गया। यह अलग बात है कि इसकी गुणवत्ता और स्वाद को कोई भी ब्रांड आज तक चुनौती नहीं दे पाया है। कम से कम दस सदस्यों की मौजूदगी वाले मेरे घर में डालडा का उपयोग दो दशक से भी ज़्यादा समय तक हुआ। वजह थी शाम को पक्का भोजन बनना। सुबह चौके में लक़ीर खींच कर कच्चा भोजन दादी या बुआ बनाती थीं। शाम को पक्का भोजन मम्मी। दादी और बड़ी बुआ मम्मी के हाथों बना कच्चा भोजन (जिसे "सकरा" कहते थे) नहीं करती थीं। इसके पीछे की वजह आज तक नहीं पता। बस इतना याद है कि सुबह रोटी तो शाम को तिकोने व गोल परांठे बनाए जाने की परंपरा घर में प्रचलित थी। मज़ेदार बात यह थी कि रसोई में खड़िया से खींची गई लक़ीर किसी लक्ष्मण-रेखा से कम नहीं थी। किसी की मजाल नहीं थी कि उस लक़ीर को छू भी पाए। चूल्हे की आंच पर बनने वाली रोटी एक-एक कर लक़ीर से बाहर आती और बारी-बारी से मिलती। इस चक्कर में रोटियां कुछ ज़्यादा ही खाने में आतीं। ज़ोर की भूख लगने या सब्र न हो पाने की स्थिति में हम भाई अपनी थाली की रोटी की अधबंटाई भी कर लेते थे। भूख और बेसब्री का एक कारण भोजन बनने में होने वाली देरी भी होता था। जिसके पीछे की वजह दादी व बुआ का पूजा-पाठ व नियमित सत्संग भी था। जिसका केंद्र घर से सटा गीता भवन होता था। अवसर रात के बचे परांठे सुबह अचार के साथ निपटाए जाते थे। सुबह की बची रोटी दोपहर बाद डालडा चुपड़कर खाई जाती थी। अन्न के प्रति आदर का भाव होता था। क्योंकि उसकी क़ीमत का अंदाज़ा था। शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में बनने वाली पूड़ियाँ भी गुजिया जैसे अन्य पकवानों की तरह इसी घी में तली जाती थीं। बची हुई पूड़ियों को धूप में सुखा कर रखने और पतले दही में गलाने के बाद मिर्च, नमक डाल कर खाने का भी अलग मज़ा था। यह प्रयोग बरसों बाद देशी घी से निर्मित पूड़ियों पर भी कर के देखा। यक़ीन मानिए, वो स्वाद आया ही नहीं। बासी रोटी पर देशी घी के साथ नमक, मिर्च लगा कर खाने में वो लुत्फ़ नहीं मिला, जो बचपन में मिलता था। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में गिरावट का यह नायाब उदाहरण हो सकता है। हम दावे से कह सकते हैं कि तब का नक़ली घी आज के असली घी से कई दर्जा बेहतर था। बताते हैं कि सन 1930 के आसपास यह घी नीदरलैंड से भारत आया। जहां डाडा एंड कंपनी इसे बनाती थी। इसकी पहचान हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल के रूप में हुई। भारत में इसे शुद्ध देशी घी के सस्ते विकल्प के रूप में स्वीकारा गया और यह देखते ही देखते रसोई का राजा बन गया। यहां इसकी बिक्री व खपत ज़ोर की रही। तो इसका निर्माण भी यहीं होने लगा। डाडा के बीच हिंदुस्तान लीवर लि. का "एल" जुड़ा और इसका नाम #डांडा से #डालडा हो गया। इस ब्रांड की स्वीकार्यता और महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज किसी भी ब्रांड के वनस्पति घी को डालडा ही कहा जाता है। ठीक वैसे ही जैसे लोहे की हर आलमारी #गोदरेज_की_आलमारी कहलाती है। उम्मीद है नक़ली घी के ज़ायके की ये असली दास्तान आज की पीढ़ी को भी लुभाएगी। वहीं पुरानी पीढ़ी इस संस्मरण की सत्यता पर पुष्टि की मोहर लगाएगी।                       #प्रणय_प्रभात(आपके अनुभव इस लेख में कुछ बातें और भी जुड़वा सकते हैं। जैसे आदरणीय भाई साहब श्री अरुण ओसवाल जी की मेरे इस लेख पर यह सटीक प्रतिक्रिया, जो अपने आप में इस लेख के अगले हिस्से की तरह रोचक एवं पठनीय है। पढ़िए आप भी :-#श्री_अरुण_जी_ओसवाल_उवाचःवाह प्रभात जी ...."दास्तांने डालडा ओर उसकी निजी जीवन में  उपयोगिता"  शानदार आत्मकथ्य। इस डालडा ने उन तमाम परिवारों की आबरु भी बचायी जो शुद्ध घी के अभाव में किसी के सामने रूखी रोटी खाने मेंं शर्मिंदगी महसूस करते थे। इस घी की लोकप्रियता का आलम यह था कि बडे नाम वालों के यहाँ भी थेलों में छिपकर जाते हुए देखा है।कभी वनस्पति घी के नाम से प्रचलित हेय दृष्टि से देखे जाने वाले इस घी के हर घर तक पहुंच बनाने के किस्से भी कम दिलचस्प नहीं रहे।ग्रामीण परिवेश और कुछ गिने चुने सम्पन्न लोगों को छोड कर अधिकांश निम्न उच्च मध्यम वर्ग वाले इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाने के लिए डालडा कम्पनी वाले यहाँ पोस्टआफिस के बाहर बाकायदा स्टाल लगाकर वहीं हल्वा बनाने और लोगों को मनुहार कर फ्री में खिलाने की बात बुजुर्गों से सुनी है।और इसके बाद लगभग घर मेंं इसने  तब तक अपना जलवा कायम रखा जब तक इसका प्रतिद्वंद्वी "रथ" वनस्पति बाजार में नहीं आया।डालडा के साथ एक मजेदार किवदंती और थी कि डालडा की रसोई खाने के बाद चाय पीली जाए तो यह जल्दी पच जाता है तो एक समय की चाय के चलन वाले उस दौर में किसी आयोजन की अथवा तीज त्योहार की रसोई खाने के बाद दुबारा चाय मिलने का आनन्द ही कुछ और होता था।आपका आत्मकथ्य लेख अच्छा और सराहनीय है।Arun OswalHariom GaurAnand BhatnagarSuchetan Bhatnagar मुझसे पुराने लोग #टीन के इस #डिब्बे से बख़ूबी वाकिफ़ होंगे। ये हमारे दौर के निम्न मध्यम व निम्न ही नहीं उच्च वर्ग  का भी पसंदीदा घी था। जिसे #डालडा के नाम से देश भर में पहचाना जाता था। डालडा यानि वनस्पति तेल से निर्मित शुद्ध, स्वादिष्ट व दानेदार घी। जिनके बज़ट में शुद्ध देशी नहीं आता था। उनके लिए यह एक शानदार और #किफ़ायती_विकल्प था। एक और पांच किग्रा वज़न के डिब्बों में यह आता था। जो बाद में 15 किग्रा के कनस्तर में भी आने लगा। #सीधी_उंगली_से_घी_नहीं_निकलता वाली कहावत शायद तभी जन्मी होगी। हमारा बचपन इस घी पर काफ़ी हद तक निर्भर रहा। लिहाजा इस का स्वाद आज भी याद है। परांठों के लिए तो यह चिकनाई का एक माध्यम था ही। बासी रोटी निपटाने में भी मददगार था। इसे गर्म कर के एक बासी रोटी पर लगाना। फिर नमक और मिर्च बुरक कर दूसरी रोटी पर चुपड़ना रोज़ का काम था। रोटी की पुंगी बना कर खाना और अघाना भी दिनचर्या का अंग। इस घी ने ना कभी पेट बिगाड़ा, ना कोई और व्याधि दी। इससे घर परिवार का नाता सालों तक रहा। बाद में इसकी जगह तमाम ब्रांड आते गए और यह रसोई से ग़ायब हो गया। यह अलग बात है कि इसकी गुणवत्ता और स्वाद को कोई भी ब्रांड आज तक चुनौती नहीं दे पाया है। कम से कम दस सदस्यों की मौजूदगी वाले मेरे घर में डालडा का उपयोग दो दशक से भी ज़्यादा समय तक हुआ। वजह थी शाम को पक्का भोजन बनना। सुबह चौके में लक़ीर खींच कर कच्चा भोजन दादी या बुआ बनाती थीं। शाम को पक्का भोजन मम्मी। दादी और बड़ी बुआ मम्मी के हाथों बना कच्चा भोजन (जिसे "सकरा" कहते थे) नहीं करती थीं। इसके पीछे की वजह आज तक नहीं पता। बस इतना याद है कि सुबह रोटी तो शाम को तिकोने व गोल परांठे बनाए जाने की परंपरा घर में प्रचलित थी। मज़ेदार बात यह थी कि रसोई में खड़िया से खींची गई लक़ीर किसी लक्ष्मण-रेखा से कम नहीं थी। किसी की मजाल नहीं थी कि उस लक़ीर को छू भी पाए। चूल्हे की आंच पर बनने वाली रोटी एक-एक कर लक़ीर से बाहर आती और बारी-बारी से मिलती। इस चक्कर में रोटियां कुछ ज़्यादा ही खाने में आतीं। ज़ोर की भूख लगने या सब्र न हो पाने की स्थिति में हम भाई अपनी थाली की रोटी की अधबंटाई भी कर लेते थे। भूख और बेसब्री का एक कारण भोजन बनने में होने वाली देरी भी होता था। जिसके पीछे की वजह दादी व बुआ का पूजा-पाठ व नियमित सत्संग भी था। जिसका केंद्र घर से सटा गीता भवन होता था। अवसर रात के बचे परांठे सुबह अचार के साथ निपटाए जाते थे। सुबह की बची रोटी दोपहर बाद डालडा चुपड़कर खाई जाती थी। अन्न के प्रति आदर का भाव होता था। क्योंकि उसकी क़ीमत का अंदाज़ा था। शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में बनने वाली पूड़ियाँ भी गुजिया जैसे अन्य पकवानों की तरह इसी घी में तली जाती थीं। बची हुई पूड़ियों को धूप में सुखा कर रखने और पतले दही में गलाने के बाद मिर्च, नमक डाल कर खाने का भी अलग मज़ा था। यह प्रयोग बरसों बाद देशी घी से निर्मित पूड़ियों पर भी कर के देखा। यक़ीन मानिए, वो स्वाद आया ही नहीं। बासी रोटी पर देशी घी के साथ नमक, मिर्च लगा कर खाने में वो लुत्फ़ नहीं मिला, जो बचपन में मिलता था। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में गिरावट का यह नायाब उदाहरण हो सकता है। हम दावे से कह सकते हैं कि तब का नक़ली घी आज के असली घी से कई दर्जा बेहतर था। बताते हैं कि सन 1930 के आसपास यह घी नीदरलैंड से भारत आया। जहां डाडा एंड कंपनी इसे बनाती थी। इसकी पहचान हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल के रूप में हुई। भारत में इसे शुद्ध देशी घी के सस्ते विकल्प के रूप में स्वीकारा गया और यह देखते ही देखते रसोई का राजा बन गया। यहां इसकी बिक्री व खपत ज़ोर की रही। तो इसका निर्माण भी यहीं होने लगा। डाडा के बीच हिंदुस्तान लीवर लि. का "एल" जुड़ा और इसका नाम #डांडा से #डालडा हो गया। इस ब्रांड की स्वीकार्यता और महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज किसी भी ब्रांड के वनस्पति घी को डालडा ही कहा जाता है। ठीक वैसे ही जैसे लोहे की हर आलमारी #गोदरेज_की_आलमारी कहलाती है। उम्मीद है नक़ली घी के ज़ायके की ये असली दास्तान आज की पीढ़ी को भी लुभाएगी। वहीं पुरानी पीढ़ी इस संस्मरण की सत्यता पर पुष्टि की मोहर लगाएगी।                       #प्रणय_प्रभात(आपके अनुभव इस लेख में कुछ बातें और भी जुड़वा सकते हैं

#एक_नज़्म_ख़ुद_पर सफ़र में हूँ नज़र के सामने केवल अँधेरा है 【प्रणय प्रभात】

सफ़र में हूँ नज़र के सामने केवल अँधेरा है।अँधेरा यानि गुमनामी जो मेरे साथ है अब तक,अँधेरा यानि नाकामी जो मेरे साथ है अब तक।अँधेरा यानि गर्दिश वक़्त की जो साथ चलती है,अँधेरा यानि वो हसरत अँधेरों में जो पलती है।धुंधलका देखते ही देखते होता घनेरा है।।सफ़र में हूँ नज़र के सामने केवल अँधेरा है।हैं कुछ यादों के जुगनू साथ रह कर जगमगाते है,अकेला तू नहीं अहसास जो अब भी दिलाते हैं।दुआएं चमचमाती हैं कभी बर्क़े-तपां बन कर,हमेशा साथ लगती हैं पिता बन के या माँ बन कर।बहुत महफ़ूज़ रखता है ये जो रहमत का घेरा है।सफ़र में हूँ नज़र के सामने केवल अँधेरा है।क़दम साँसों के संग उट्ठे मिले रफ़्तार धड़कन से,हमेशा से रही कोशिश लगे ना दाग़ दामन से।बड़ी ख़्वाहिश थी फूलों की मगर कुछ ख़ार पा बैठे।कभी सर आ गिरी शबनम कभी अंगार पा बैठे।लबों ने बस कहा रब से बड़ा अहसान तेरा है।सफ़र में हूँ नज़र के सामने केवल अँधेरा है।हज़ारों रोज़ो-शब बीते महीने फिर बरस गुज़रे,कई मौसम गए आए लगा आए कि बस गुज़रे।लगीं कुछ उम्र की गाँठें गया बचपन जवानी भी,हुआ अक़्सर लहू जब बन गया आँखों का पानी भी।मगर थकना नहीं रुकना नहीं बस अह्द मेरा है।सफ़र में हूँ नज़र के सामने केवल अँधेरा है।कहाँ पे ख़त्म होगा ये सफ़र मंज़िल कहाँ होगी,मगर इतना समझता हूँ वहीं होगी जहाँ होगी।बहुत ऊँची पहाड़ी के तले सूरज छिपा होगा,उसी को खोजना होगा तभी चाहा हुआ होगा।भले नज़रों में शब हो फिर भी ख़्वाबों में सवेरा है।सफ़र में हूँ नज़र के सामने केवल अँधेरा है।सफ़र मंज़िल का वायज़ है सफ़र ही खुशनुमा घर है,दुआओं पर भरोसा है नहीं तक़दीर का डर है।हज़ारों नेकियाँ कहतीं तुझे सूरज उगाना है,कई कसमें बताती हैं सवेरा ले के आना है।क़दम उस ओर उठते हैं जिधर सूरज का डेरा है।मेरी आँखों में शब हो फिर भी सपनों में सवेरा है।।#अपनी_ज़िंदगी_की_तमाम_अधूरी_ख्वाहिशों_को_समर्पित 😊😊😊