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Saturday, December 5, 2020

गीत :--#अपना_जीवन.....!!

#गीत :--
#अपना_जीवन.....!!

"जीवन अपना माना
बहुआयामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।

■ सहा गर्भ में जो कुछ वो सब भूल गया,
बाहर आकर के पलने में झूल गया।
शैशव में घुटनों पर रेंगा तक,
लाड़-प्यार और पोषण पाकर फूल गया।
बाल्यकाल तक उर में अंतर्यामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।

■ वय किशोर, तरुणाई में बस जोश रहा,
भले-बुरे का नहीं तनिक भी होश रहा।
यौवन में बस भोग विलास पसंद रहे,
मनचाहा मिलने पर ही संतोष रहा।
नाम हुआ कम अधिक हुई बदनामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।

■ प्रौढ़ हुए तब तक केवल संचय भाया,
राग-द्वेष, छल-दम्भ मोह ने भरमाया।
वृद्ध देह फिर रोगों का घर-द्वार बनी,
पड़े-पड़े सोचा क्यां खोया क्या पाया?
कल की खूवी आज लगे बस ख़ामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।"
   ©® प्रणय प्रभात

Monday, November 30, 2020

■ #सामयिक_व्यंग्य :--

■ #सामयिक_व्यंग्य :--

°हमारे पास काम हो या पूरा आराम,
सुबह हो दोपहर या फिर शाम।
हम जैसे जड़वत भी
चेतनता का सुबूत देते हैं,
समस्त मानवीय भावों से दिन भर काम लेते हैं।
हम खुलकर हँसते हैं, मुस्कुराते हैं,
कभी ज़ोर का ठहाका तक लगाते हैं।
कभी ऐसे हँसते हैं कि बत्तीसी चमकती है,
कभी गालों पर लाली सी दमकती है।
कभी चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है,
कभी इसी चेहरे पर भूचाल हो जाता है।
दुःख हो तो आँख से आँसू निकलता है।
कभी चेहरे पर ठिठोली का भाव मचलता है।
कभी आँख बंद होते ही जीभ निकलती है,
कभी आँखों व चेहरे पर शोखी मचलती है।
कभी अचंभे से आँखें फ़टी सी रह जाती हैं,
कभी यही आँखें आँसू का सैलाब लाती हैं।
कभी आँखों मे पीड़ा का भाव छलकता है,
कभी चेहरे पर तनाव झलकता है।
मज़े की बात यह है कि 
सब होता है दिखावा,
जिसे कह सकते हैं संवेदनाओं से छलावा।
मतलब सब कुछ होकर भी नहीं होता,
हमारा दिल न मचलता न हँसता न रोता।
हम शहद भूलकर उनके अर्थ खो चुके हैं,
भावों और भावनाओं से विमुख हो चुके हैं।
नक़ली चेहरों पर पल पल परत बदलते हैं,
असल में ना मुस्कान है ना आँसू निकलते हैं।
हम संवेदना, सरोकारों से पल्ला झाड़ लेते हैं,
टसुए बहाते-बहाते ही दांत भी फाड़ लेते हैं।
ज़रा भी झूठ नहीं है कसम रोटी रोज़ी की,
ये सारी मेहरबानी है बस इमोजी की।
अब काहे की संवेदना और कैसे सरोकार?
रस्म-अदायगी के लिए इमोजी है तो सही यार!!"
          #प्रणय_प्रभात

Saturday, November 28, 2020

एक मौलिक #व्यंग्य :--#नौकरशाहों_की_नज़र_में_साहित्यकार

👺 एक मौलिक #व्यंग्य :--
#नौकरशाहों_की_नज़र_में_साहित्यकार 
【प्रणय प्रभात】

सरकारी दामाद (छोटे, बड़े या मंझोले) के तौर पर अन्यत्र कस्बों या गांव-खेड़ों से आकर अपनी ग्रहण क्षमता व खुराक के बलबूते बरगद की तरह आकार पा जाने और हमारे अपने नगर और जिले की धरती का बोझ बढ़ाने वाले कुछ महामूर्ख श्रेणी के तथाकथित बुद्धिजीवियों (महाधूर्तों) के अनुसार "साहित्यकार" उसे ही कहा और समझा जा सकता है जो:-
+ मंगल ग्रह, चन्द्रलोक अथवा अंतरिक्ष का निवासी हो।
+ मां के गर्भ से पैदा ना होते हुए सीधे अवतरित हुआ हो।
+ सामान्य व्यक्तियों से बिल्कुल अलग दिखाई देता हो।
+ जिसकी देह से दिव्य किरणें रह-रहकर फूटती हों।
+ जो खाने-पीने के लिए कम से कम मुंह का उपयोग तो ना करता हो।
+ जो भूख-प्यास, थकान, विश्राम जैसे भावों से सर्वथा परे हो।
+ जिसकी परछाई कभी धरती पर गिरने का साहस नहीं करती हो।
+ जिसके पैर चलते-फिरते समय धरती का स्पर्श ना करते हों।
+ जो इच्छाधारी नाग की तरह जब चाहे प्रकट और लुप्त हो सकता हो।
+ जिसके माथे पर अश्वत्थामा की तरह मणि सुशोभित होती हो।
+ जिसकी खोपड़ी के पिछले हिस्से में आभायुक्त चक्र घूमता हो।
+ जो मानवीय समाज से अलग देवलोक का दूत दिखाई देता हो।
+ जो माथे पर मुकुट लगाकर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित रहता हो।
+ जिसकी कमर में समस्त प्रकार के ज्ञान के भण्डार की चाबी लटकी हो।
+ जो बिना कानों के सुनने और बिना नाक के सूंघने की शक्ति रखता हो।
+ जिसका स्पर्श करने मात्र से हजारों वोल्ट का करेण्ट लगता हो।
+ जिसकी छवि दर्पण या तरल पदार्थ में दिखाई ना देती हो।
+ जिसकी देह से केसर या कस्तूरी की मदमाती गंध सदैव आती हो।
+ जिसके पास भ्रमण करने के लिए एक अदद पुष्पक विमान हो।
+ जिसके श्रीमुख से दिन-रात ज्ञान की गंगा फूटती रहती हो।
+ जिसके पास स्वयं भगवान या मां सरस्वती द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र हो।
+ जिसकी भुजाओं में हजार हाथियों का बल हो।
+ जिसकी चमड़ी पर सर्दी, गर्मी, बरसात का असर नहीं होता हो।
+ जिसकी गति सूर्यदेवता के रथ से कई गुना अधिक हो।
हे मेरे भगवान,,,,,,,,इतने सारे गुण ?
अच्छा किया जो नहीं दिए तूने,,,वर्ना मार डालते लोग ऐलियन समझकर।।
👉 अंततः लानत धूर्तों पर :-
"डूब के मर जाओ कुए के मेंढकों।
पता नहीं क्या देखा था तुम्हारे मां-बापों ने जो तुम्हारी अंधता को नजर-अंदाज कर तुम्हारा नाम नयनसुख रख दिया।" :P :P 
@ (प्रभात प्रणय)

Thursday, June 18, 2020

#गजल / #हो_नहीं_सकता 【प्रणय प्रभात】

◆ कभी भी साथ इक शब का गवारा हो नहीं सकता।जो सूरज है वो सूरज है, सितारा हो नहीं सकता।।◆ मुझे अपनी वफा पर नाज है मैं आज कहता हूं।जो मेरा हो नहीं पाया, तुम्हारा हो नहीं सकता।।◆ नहीं था बे-सबब दामन छुड़ाना, हाथ से उसके।हमें लगने लगा था वो, हमारा हो नहीं सकता।।◆ अगर सच्ची मोहब्बत में, तआल्लुक तर्क हो जाए।यकीं मानो कि ऐसा फिर, दुबारा हो नहीं सकता।।◆ जहां पल-पल बदलती सीरतें, आंखों के आगे हों।कसम से ऐसी बस्ती में, गुजारा हो नहीं सकता।।◆ घरोंदा राख कर डाले, कहां आतिश के बस में है?हवा का जब तलक ना हो इशारा हो नहीं सकता।।

#भावाभिव्यक्ति#पिता_को_याद_क्यों_करूं? 【प्रणय प्रभात】"

"मैं अपने पिता को याद नहीं करताकभी नहीं, कभी भी नहीं।और क्यों करूं याद?याद भी उन्हें, जिन्हें कभी भूला ही नहीं,जो शिलालेख पर अंकित वाक्य की तरह,कालजयी हैं मेरे मानस-पटल पर।कौन कहता है कि वो नहीं हैंमैं कहता हूं कि वो आज भी यहीं हैं,मेरे कर्म में, मेरे धर्म में,मेरे जहन में, मेरे मर्म में।मेरे आचार-विचार-व्यवहार में,मेरी हरेक जीत में और हार में।यहां तक कि मेरी सभ्यता और संस्कार में।मुझे महसूस होता है पल-पल पिता के साथ का,मेरा शीश सतत स्पर्श पाता है पिता के हाथ का।मेरे लिए पितृ-दिवस कोई एक दिनी त्यौहार नहीं,मेरे लिए हर दिन पितृ-दिवस हैक्योंकि मेरे अंदर मेरे पिता आज भी हैंजो जीवित रहेंगे मेरे जीवन तक और उसके बाद मेरे सूक्ष्म स्वरूप मेंपहुंच जाऐंगे अपने वंश की अगली पीढ़ी में।सिर्फ इसलिए कि मैने अपने में अपने पिता को जिया है,आखिर मेरे पास जो भी है उन्हीं से तो लिया है।।"(अपने जीवनदाता, अपने मार्गदर्शी, अपने प्रेरणास्त्रोत अपने आदर्श पापा को उनके बेटे की ओर से सादर समर्पित काव्यात्मक भावाभिव्यक्ति)

Wednesday, June 17, 2020

#स्लोगम / #बिटिया 【प्रणय प्रभात】"

◆ गर्मी छाया सर्दी धूप।बिटिया है देवी का रूप।।◆ बेटी दुर्गा का आभास।बेटी में लक्ष्मी का वास।।◆ बेटी चंदा बेटी तारा।बेटी से घर में उजियारा।।◆बेटी कंगन बेटा हार।दोनों हैं कुल के श्रंगार।।बेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियान

#स्लोगन / #बेटी 【प्रणय प्रभात】

◆ बेटा-बेटी दोनों एक।अगर दिलाओ शिक्षा नेक।।◆ बेटी जब पढ़ने जाएगी।साथ शारदा घर आएगी।।◆ बिटिया सारे काम करेगी।पढ़ी-लिखी तो नाम करेगी।।◆जीवन धारा जाए न व्यर्थ।बिटिया को भी करो समर्थ।।◆ दुर्गा लक्ष्मी शारद जानो।बेटी शक्ति-स्वरूपा मानो।।बेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओबेटी बचाओबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओबेटी बचाओ स्वावलम्बी बनाओ

#गीत / #सुख_दुःख 【प्रणय प्रभात】

अगर वो अपनी लगती है तो यह कैसे पराया है?ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ हमें मीठा निगलने कटु उगलने की जो आदत है।उसी कारण खुशी की चाह है दुःख से शिकायत है।।ये सोचो कल बहिन आई थी भाई आज आया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ लता, पत्ते, सुमन, फल और तरु उपवन सजाते हैं।मगर क्यों भूलिए उद्यान में कंटक भी आते हैं।।इन्हीं ने अनगिनत पुष्पों का जीवन तक बचाया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ बनाएं दृष्टि रुचि अरु सोच सम आदर करें दुःख का।बिना इनके भला क्या स्वाद जीवन में किसी सुख का?वो दुःख ही हैं जिन्होंने ईष्ट का सुमिरन कराया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

Saturday, June 13, 2020

#प्रयोगात्मक_कविता- 【प्रणय प्रभात】

#जन जितने सारे आहत।#गण जितने पाते राहत।#मन व्याकुल करता क्रंदन ।#अधिनायक का अभिनंदन।।#जय कहने में क्या जाता?#है माता आखिर माता।।#भारत वर्ष रहे आबाद।#भाग्य_विधाता ज़िंदाबाद।।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

#कोटा एक_शहर_जो_अब_है_बस_यादों_में 😍【प्रणय प्रभात】😍

राजस्थान की वो कोटा नगरी आज की कोटा महानगरी से बिल्कुल अलग थी। ना बहुत सीमित, ना इतनी विस्तारित। क्षेत्रफल और आबादी के मान से एकदम संतुलित। शोरशराबे और अंधी दौड़ से कोसों दूर। बेहद दर्शनीय, रमणीय और आकर्षक। बात अब से चार दशक पूर्व की है। जब कोटा शहर ना तो एज्यूकेशन हब था, ना ही चिकित्सा के क्षेत्र में इतना आधुनिक। तब हर तिराहे, चौराहे पर ना तो इतने ख़ूबसूरत सर्किल थे, ना ही पार्क। सात अजूबे (सेवन वंडर्स) और हवाई पुल (हैंगिंग ब्रिज) जैसे स्थल तब कल्पनाओं में भी नहीं थे। चंबल गार्डन उस दौर का सर्वाधिक सुंदर और पसंदीदा पिकनिक स्पॉट हुआ करता था। उसके आगे अमर-निवास, श्री गोदावरी धाम, अधर-शिला और भीतरिया कुंड सहित नसिया जी भी सुरम्य पर्यटन स्थल थे। जहां सैलानियों और स्थानीय परिवारों की मौजूदगी रौनक बिखेरा करती थी। चंबल गार्डन की सुंदर लाइटिंग के बीच झाड़ीनुमा पौधों की मनमोहक आकृतियां मन को लुभाती थीं। मद्धिम स्वर में बजतीं मानस की चौपाइयां माहौल में रस घोलती रहती थीं। चंबल की जलधाराओं पर फट-फट की आवाज़ के साथ फर्राटा भरती मोटरवोट की सवारी तब बेहद रोमांचित करती थी। घर से बना कर ले जाया गया भोजन हरी-भरी घास के कालीन पर अत्यंत स्वादिष्ट लगता था। कोटा बैराज, गढ़ पैलेस भी यदा-कदा तफ़रीह के अच्छे विकल्प होते थे। तब आवागमन के तीन साधन ही प्रचलन में थे। लम्बी थूथनी वाले टेम्पू, तांगे और रिक्शे। आवागमन के निजी साधनों में सर्वाधिक संख्या सायकिलों की होती थी। उसके बाद स्कूटर, मोपेड, बाइक आदि का नम्बर आता था। चार पहिया वाहन ख़ास परिवारों के पास होते थे। तारकोल की काली, चिकनी व चौड़ी सड़कों पर साइकिल दौड़ाना तब बेहद मज़ा देता था। बचपन से युवावस्था तक कोटा मेरी पहुंच में रहा और अभिरुचि में भी। मेरे छोटे मामा राजस्थान राज्य विद्युत मंडल (आरएसईबी) में सेवारत थे। किराए के मकान में रहते थे और एक निर्धारित अंतराल पर घर बदलते रहते थे। बहुत छोटा था तब उनका ठिकाना पाटनपोल की किसी गली में था। जिसकी याद बहुत धुंधली है। बाद में उन्होंने किशोरपुरा गेट के पास किन्हीं पारीक जी का घर ले लिया। जो श्री नीलकंठ महादेव मंदिर के पास था। यहां रहते हुए गढ़ पैलेस और नज़दीक स्थित उद्यान तक आना-जाना बेहद आसान होता था। सन 1980 के दशक में दादाबाड़ी कॉलोनी कोटा की सबसे अच्छी कॉलोनी के तौर पर वजूद में आई। यहां स्थित आवास 3/के/4 में चार-पांच साल बेहद यादगार रहे। चंबल गार्डन वाला क्षेत्र यहां से मामूली दूरी पर था। दिन भर बर्फ़ के गोले, नर्म-नर्म ककड़ी, फिरनी, फालसे, जामुन, शहतूत, रसीले तरबूज़, कुल्फ़ी आदि के ठेले घण्टी बजाते, आवाज़ लगाते आया करते थे। सबसे कुछ न कुछ खरीदना दिन भर का काम था। हर ठेले वाले के पास अधिकांश परिवारों का उधार खाता होता था। घर-घर में हड़ और चूरन-चटनी की पेकिंग का काम तब घरेलू रोज़गार होता था। हर रविवार को चंबल गार्डन जाना तब बेहद लाजमी था। गर्मी के दिनों में तब रात बेहद सुहानो होती थी। पानी के छिड़काव से शीतल पूरी छत पर बिस्तर बिछाना और धमाल करना बहुत भाता था। मामी जी और उनके चार बच्चों के साथ हम चार भाई-बहन और मिल जाते थे अपनी मम्मी के साथ। आपस में खूब हंसी-ठठ्ठा होता। न जाने कहाँ-कहाँ के किस्से निकल कर आते थे। कभी-कभी कुछ पलों की हल्की सी झड़प भी हम बच्चों में हो जाती थी। जो दर्ज़न भर बच्चों के बीच स्वाभाविक सी ही थी। थके-हारे मामाजी अपने अनूठे अंदाज़ में भुनभुनाते और अंततः हमारी मस्ती में शरीक़ हो जाते। जिन्हें उनके हमनाम बाल-सखा राजू मामा बहुत छेड़ते और खिजाते थे। हर शाम साइकिल पर सवार होकर आना और देर रात लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल था। खाने-पीने के शौकीन और बेहद मस्तमौला। ईसाई परिवार से ताल्लुक़ रखते थे और ख़ासे मोटे-ताज़े। मैकेनिकल लाइन के थे और तमाम बिगड़ी चीज़ें ख़ुद सुधार देते थे। फेक्ट्री से कुछ न कुछ बनाकर लाना उनका शौक़ था। कॉलोनी के इस हिस्से में तब बहुत गहमा-गहमी नहीं होती थी। वातावरण प्रायः शांत प्रतीत होता था। आधी रात तक एक अदद ट्रांजिस्टर हम सबके मनोरंजन का साझा माध्यम होता था। बिनाका गीतमाला, चित्रपट से, फौजी भाइयों के लिए और बेला के फूल जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत उस दौर के कर्णप्रिय गीत प्रसारित होते थे। पुराने सदाबहार गीत भी आधी रात तक ट्रांजिस्टर से गूंजते थे। एकाध बार टॉकीज़ में फ़िल्म भी देख आते थे। यहां के बाद  अगला ठिकाना बना दादाबाड़ी विस्तार योजना का आवास 3/जी/39, जहां की यादें आज भी रोमांचित करती हैं। इस क्षेत्र में लगभग सभी आवास भरे हुए थे। लिहाजा चहल-पहल की कोई कमी नहीं थी। हल्दी, तेल, दाल, चाय-पत्ती, शक्कर, आटा मांगने और लौटने आने वाले पड़ौसी बेहद क़रीबी  होते थे। इसके पीछे अभाव जैसी स्थिति नहीं थी। बस घरों में अति संचय की आदत नहीं थी शायद। इस आवास के पास ही एक आवास मामीजी के बड़े भाई यानि मुन्ना मामा का था। लिहाजा यहां मौज-मस्ती की कम्पनी का आकार और बड़ा था। यहां से साइकिल लेकर मेला मैदान के रास्ते नयापुरा, घंटाघर, टिपटा, पाटनपोल, कैथूनीपोल, सब्ज़ी मंडी जाना रोज़ का काम था। तीखी धूप में दूर तक सुनसान सड़क पर साइकिल की रफ़्तार भी गज़ब की होती थी। कचौड़ी लाना हर दूसरे दिन का काम था। कच्चे पापड़ और मोटे सेव (सेवड़े) प्रायः सब्ज़ी का विकल्प होते थे। दादाबाड़ी के छोटे चौराहे पर कुंदन पान वाले की दुकान हर शाम हमारी पहुंच में होती थी। दो-तीन गुमटीनुमा दुकानों पर कॉमिक्स व पत्रिकाएं किराए पर मिलती थीं। इसी तरह कुछेक दुकान साइकिलों की थीं। सप्ताह में एक दिन थोक में सब्ज़ी लाने के लिए बड़ी सब्ज़ी मंडी जाने का अपना ही मज़ा था। यहां सब्ज़ी अच्छी और सस्ती मिलती थी। जो आम दिनों में दादाबाड़ी कॉलोनी की गिनी-चुनी दुकानों पर डेढ़ से दो गुना मंहगी मिलती थीं। दिन भर कुछ न कुछ खाना-पीना और मौज-मस्ती करना हर साल गर्मी की छुट्टियों का तक़ाज़ा था। इसके अलावा मनमर्जी से कोटा आना-जाना साल में चार-छह बार हो जाता था। दो-दो कमरों वाले एक छोटे से क्वार्टर में हम दर्ज़न भर लोग चैन से रह लेते थे। यह सोच कर भी अब ताज्जुब होता है। जब सबको अलग कमरों की दरकार होती है। पता चलता है कि गुंजाइशें ईंट-पत्थर के घरों में नहीं दिलों में हुआ करती थीं। खेल-कूद के साधनों के बिना दो-दो महीने कितने मज़े से गुज़र जाते थे। इस बात की कल्पना भी आज की पीढ़ी शायद ही कर पाए। लगता है कि आनंद संसाधनों का मोहताज़ नहीं। यह अंदर से उपजने वाली सहज हिलोर होता है। जिसका वास्ता केवल आपसी सरोकारों और आत्मीयता से होता है। आखिरी पड़ाव गणेश तलाब रहा, जहां मामाजी ने ख़ुद का छोटा सा घर ले लिया। उड़िया बस्ती के पास स्थित घर के सामने सिर्फ़ मैदान हुआ करता था। यहां से काफ़ी दूरी पर बस मोदी कॉलेज नज़र आता था। बहुत से सूने इलाके के बाद जवाहरनगर जैसी कुछ नई कॉलोनियाँ तब आकार पा रही थीं। हमारी दौड़-धूप सामान्यतः कोटा के पुराने क्षेत्रों में रहती थी। कभी-कभी सीएडी और एरोड्रम चौराहे तक की सैर भी साइकिल से हो जाती थी। सीमित साधनों के बीच बेहद यादगार रहे वो दिन। फिर इन्हें किसी की नज़र लग गई। सन 1992 में धुलेंडी के दिन मामाजी अपने परिचितों से रंग खेल कर घर लौट रहे थे। मोदी कॉलेज के सामने किसी नशेड़ी रईसज़ादे की तेज़ रफ़्तार कार ने उन्हें कुचल दिया। जिनकी दुःखद मृत्यु की ख़बर परिवार को अगले दिन मुश्किल से मिली। मामाजी के जाने के बाद परिवार लगभग असहाय सी स्थिति में आ गया। तीन बेटियों की शादी और तमाम कारणों से छोटा सा आशियाना बिक गया। बाद में मामाजी के बेटे को मिली अनुकम्पा नियुक्ति और मामीजी की पेंशन से हालात सामान्य हो गए। परन्तु वो दौर आज तक नहीं लौट पाया जो अब तक यादों में महफ़ूज़ है। कुछ सालों बाद राजू मामा भी दुनिया छोड़ गए। जिनकी गोद में बचपन के कई बरस बीते। बाद में मामीजी ने भी बेटे की बदली के कारण कोटा छोड़ दिया। कुल मिलाकर बरसों तक अपना सा लगने वाला कोटा अब एक पराया सा नगर है। जहां पहुंचकर वो सुखद अहसास अब होता ही नहीं। निस्संदेह बीते तीन दशक में कोटा ने तीव्रगामी व गगनचुंबी विकास की तमाम इबारतें लिखीं। वेशक यहां की विकासयात्रा ने राजस्थान सहित अन्य राज्यों के बाक़ी शहरों को चौंकाया। बावजूद इसके मैंने उस कोटा को फिर कभी नहीं पाया जो मेरे दिल में बसा करता था, या आज तक धड़कता है। आज श्योपुर वालों के लिए कोटा आसानी से पहुंच में है। मेगा हाईवे और ऊँची पुलियाओं ने आवागमन के ज़ोखिम को लगभग खत्म कर दिया है। एक के बाद एक अच्छी बसों का संचालन होने लगा है। बावजूद इसके राजस्थान राज्य परिवहन निगम की बसों का वो सफ़र भुलाए नहीं भूलता, जो बरसात में जटिल हो जाता था। पार्वती और कालीसिंध नदी के कारण रास्ता मामूली बारिश में बाधित हो जाता था। बावजूद इसके कोटा की यात्रा साल में कई बार बदस्तूर कारी रहती थी। जो अब अन्य शहरों की यात्राओं के लिए बतौर जंक्शन एक पड़ाव भर है। जिसका वास्ता भी केवल रेलवे स्टेशन और नयापुरा क्षेत्र से बचा है। जहां अपने लिए अब कोई लगाव या आकर्षण जैसी अनुभूति नहीं। अपना कोटा वर्तमान कोटा के लंबे-चौड़े आँचल में पूरी तरह गुम हो चुका है। बहरहाल, कोटा प्रवास से जुड़े तमाम यादगार व मज़ेदार किस्से कभी फुर्सत में.......।।        #miss_you_old_kota 😍

Tuesday, June 9, 2020

#सिरमौर_बनो_तो_मोरपंख_से 【प्रणय प्रभात】"

अगर सिरमौर बनो तो भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में लगे मोर-पंख की तरह बनो, जिसका स्थान कोई और कभी नहीं ले सकता। किसी दूल्हे के सेहरे में लगी उस मौर की तरह नहीं, जिसे विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद जलधाराओं में प्रवाहित कर दिया जाता है। तात्पर्य किसी की चाहत बनो तो स्थायी रूप से, तात्कालिक तौर पर नहीं....।"

Saturday, June 6, 2020

#संस्मरण_भाग_02-#बाल_विद्या_मंदिर_का_स्वर्णकाल#सह_शैक्षणिक_गतिविधियों_में_भी_पाया_शिखर 【प्रणय प्रभात】#

श्योपुर के पहले निजी शिक्षण #संस्थान बाल विद्या मंदिर की #गाथा का यह दूसरा भाग है। आज हम इस संस्था के #स्वर्णकाल की चर्चा करेंगे। सभी संबंधितों के लिए #स्मरणीय यह दौर स्थापना के बाद शुरुआती डेढ़ दशक तक रहा। जिसका #साक्षी मैं स्वयं रहा। वर्ष 1978 से 1988 तक #शैक्षणिक ही नहीं #सहशैक्षणिक क्षेत्र में भी बाल विद्या मंदिर का दबदबा रहा। उन दिनों #प्रायमरी बोर्ड की परीक्षा ज़िला स्तरीय व कड़ी होती थी। जिसके परिणाम आज की तरह सौ फ़ीसदी नहीं होते थे। सारा नियंत्रण #मुरैना के हाथ था। इस जटिल परीक्षा में जिला #टॉप करने वाली पहली छात्रा #मोनिका सुपुत्री श्री प्रेमचंद जैन बाल विद्या मंदिर की ही थी। जो अन्यान्य गतिविधियों में भी शाला का गौरव थीं। #प्रावीण्य_सूची में स्थान बनाने का कारनामा अगले एक-डेढ़ दशक में इस शाला के तमाम विद्यार्थियों ने दोहराया। सह-शिक्षण #गतिवोधियों के मामले में विद्यालय वर्षों तक #अग्रणी बना रहा। प्रति वर्ष #शीतकाल में शाला स्तर पर खेल स्पर्धाएं होती थीं। विद्यालय के निजी क्रीडांगण में आयोजित इस खेल #उत्सव की धूम क़रीब सप्ताह भर रहती। कबड्डी, खो-खो, ऊंची व लम्बी कूद, चेयर रेस, जलेबी रेस, स्पून रेस बच्चों के पसंदीदा खेल थे। उत्सव का शुभारंभ व समापन समारोहपूर्वक होता था। जिनमें मुख्य अतिथि तहसील स्तर के आला अफसर व शिक्षाधिकारी होते थे। अध्यक्षता प्रायः शाला प्रमुख श्री आनंद प्रकाश गुप्ता जी के पिता श्री प्रभुदयाल जी गुप्ता (ढोटी वाले) करते थे। जो अत्यंत सहज, सरल, धर्मप्रेमी व मिलनसार थे। उनका आशीर्वाद लगभग हर छोटे-बड़े आयोजन में बच्चों को मिलता था। उन दिनों स्थानीय स्तर पर एसडीएम सबसे बड़ा अधिकारी हुआ करता था। अधिकांश अफसरों के बच्चे बाल विद्या मंदिर में ही पढ़ते थे। लिहाजा अफसरों की आवाजाही आम दिनों में भी बनी रहती थी। बाल विद्या मंदिर की धूम केवल अपनी चारदीवारी तक ही सीमित नहीं थी। शासकीय बालक आदर्श उ.मा. विद्यालय (अब उत्कृष्ट शाला) में लगने वाले #बाल_मेले में भी बाल विद्या मंदिर बढ़-चढ़कर भाग लेता। प्रायः नवम्बर में लगने वाले इस मेले में बाल विद्या मंदिर का बड़ा सा स्टॉल अलग दिखाई देता। देर रात तक विद्यालय परिवार इस मेले में अपने मोर्चे पर डटा नज़र आता। तीन दिवसीय इस मेले में #सर्वश्रेष्ठ स्टॉल सज्जा व संचालन के लिए शाला कई बार #अव्वल रही। मेले के दौरान आधी रात तक स्टाफ और बच्चों को ज़िम्मेदारी के साथ घरों तक पहुंचाया जाता। जो अगले दिन दुगने उत्साह से फिर अपनी भूमिका निभाते नज़र आते। बाल विद्या मंदिर का अपना #वार्षिकोत्सव बच्चों व अभिभावकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता था। एक दिन के इस उत्सव के लिए रिहर्सल 20-20 दिन चलती थी। प्रस्तुतियों व प्रतिभागियों का चयन उत्साहपूर्ण माहौल में होता था। गीत, नृत्य की एकल, युगल व सामूहिक प्रस्तुतियों के अलावा प्रहसन, नाटक, मोनो एक्टिंग व क़व्वाली की प्रस्तुतियां आकर्षण का ख़ास केंद्र होती थीं। सारी प्रस्तुतियां रिहर्सल की ही तरह हारमोनियम व ढोलक या तबले पर होती थीं। जिसके लिए श्री बाबूलाल सेन और श्री घनश्याम राय की जोड़ी को विशेष मान-मनुहार कर के बुलाया जाता था। साज श्रंगार व रिहर्सल में लगभग 8-10 साल मेरी भी रुचिपूर्ण भूमिका रही। #दोस्ती शीर्षक से एक नाटक में इंस्पेक्टर आलोक का लीड रोल भी मैने किया। जबकि मैं इस शाला का छात्र नहीं था। मेरा इस संस्थान से जुड़ाव अपनी माँ की वजह से था। जो इस स्कूल में लगभग 12 साल शिक्षिका रहीं। मैं तब मिडिल में पढ़ता था और शासकीय माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-01 का छात्र हुआ करता था। बाल विद्या मंदिर के बड़े बच्चे कक्षा व उम्र के लिहाज से मेरे जूनियर होते थे। खेल प्रतियोगिता और वार्षिकोत्सव के विजेताओं व तमाम प्रतिभागियों को बड़े पैमाने पर पुरुस्कार व प्रमाणपत्र समारोह में वितरित होते थे। कुल मिलाकर नवम्बर और दिसम्बर के महीनों की रौनक ही तब अलग होती थी। बाल फिल्मों का प्रदर्शन भी इन्हीं दिनों में हुआ करता था। बच्चों का क़तार बना कर कृष्णा और जीवन टॉकीज़ तक जाना व लौटना ख़ासा उत्साहपूर्ण होता था। बाल विद्या मंदिर की इस आयोजनधर्मिता को बाद में खुलने वाले स्कूलों ने भी उत्साह से अपनाया। जिसमें एमजी बाल विद्या निकेतन व टैगोर बाल निकेतन अग्रणी रहे। अब वार्षिकोत्सव तथा खेल समागम की परंपरा केवल दो-चार बड़े व मंहगे स्कूलों में बाक़ी बची है। सामूहिक बाल मेले की गौरवशाली परम्परा लुप्त हो गई है।  बच्चों, शिक्षकों व अभिभावकों की रुचि पर अब आधुनिकता हावी है। जो उत्साह तब फर्श पर बैठने वाले अभिभावकों में होता था, अब कुर्सियों पर विराजमान होने वाले अभिभावकों में भी नहीं दिखता। तब वो अंतिम प्रस्तुति तक मैदान नहीं छोडते थे। अब अपने बच्चों की प्रस्तुति जल्दी कराना चाहते हैं। ताकि उसे देख कर रवानगी डाल सकें। दूसरे बच्चों की प्रतिभा या प्रस्तुति से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। यह एक बहुत बड़ा फ़र्क़ है तब और अब में। तब आयोजनों के लिए साजो-सामान जुटाना बड़ी चुनौती होने के बावजूद रुचिकर होता था। अब सब कुछ रेडीमेड हो गया है। जिसमें रुचि व्यक्तिगत अभिरुचि पर निर्भर करने लगी है। बात अभी पूरी नहीं हुई है। तीसरे व अंतिम भाग में इस संस्थान की समर्पित शिक्षिकाओं का ज़िक्र होगा। साथ ही उन बच्चों का भी जो कुछ अलग थे और मुझे प्रिय भी। विडम्बना की बात यह है कि कुछ को छोड़कर अधिकांश अब सम्पर्क में नहीं हैं। स्मृति पटल पर तमाम बच्चों के नाम हैं लेकिन अक़्स धुंधला चुके हैं। सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिवोधियों में अव्वल बीते हुए कल के बच्चे आज ख़ुद अभिभावक हैं। जो अपने अतीत को याद करते हुए इस सच को नकार नहीं सकते कि जो विद्यार्थी जीवन सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने जिया वो आज उनके साधन व सुविधासंपन्न बच्चों को भी मयस्सर नहीं है।                          【#शेष_फिर】

Friday, June 5, 2020

#देशी_ग़ज़ल / #वायरस 【प्रणय प्रभात】-

- वो बोले चन्द रोज़ में हारेगा वायरस।मैं जानता था साल भर मारेगा वायरस।।- बाहर के जंक फूड से दिलवाएगा निजात।लोगों को कुछ दिनों में सुधरेगा वायरस।।- घर बैठ के मर जाएंगे तफ़रीह के कीड़े।भटकन पसंद रूह को तारेगा वायरस।।- मिट जाएंगे कुछ रोज़ में सारे मुग़ालते।रिश्तों की ज़िल्द ऐसे उतारेगा वायरस।।- ढूंढेंगे हाथ नींद में भी सैनेटाइज़र।आकर के ख़्वाब में भी पुकारेगा वायरस।।

Wednesday, June 3, 2020

#तेवरी / #राम_मदारी 【प्रणय प्रभात】-

खेल दिखाते हल्के भारी।हम सब बंदर राम मदारी।।- साँस गिने डमरू की लय पे।काल गले में रस्सी डारी।- जब ललाट वनवास लिखा हो।फिर काहे के महल अटारी।।- सँभल सँभल के पग धरना है।जीवन इक तलवार दुधारी।।- समय का डंडा करेइशारा।कब आएगी किसकी बारी।।- बुझती आँखें बता रही हैं।देख चुकीं दुनिया की यारी।।- मुँह देखे की प्रीत निभाना।"प्रणय" यही है दुनियादारी।।

Tuesday, June 2, 2020

#अद्भुत_सह_सम्बन्ध #दो_महाकवियों_ने_बनाया_एक_अनूठा_दोहा (एक का संशय दूजे का समाधान) 【प्रणय प्रभात】

हिंदी साहित्य में एक दोहा ऐसा भी है जो दो महाकवियों की देन है। प्रमाणिकता कितनी है, नहीं पता। इतना पता है कि इस दोहे की रचना के पीछे एक सुंदर प्रसंग है। जो रोम-रोम पुलकित करता है। प्रसंग यह भी सिद्ध करता है कि साहित्य जोड़ने का माध्यम है। पता यह भी चलता है कि साहित्य मेधावानों के बीच कैसे सह-सम्बन्ध स्थापित करता था।          बात उन दिनों की है जब गोस्वामी श्री तुलसीदास जी चित्रकूट में निवासरत थे। वे मुग़ल शासन को लेकर आशंकित थे। इस कारण श्री रामचरित मानस की रचना अत्यंत सतर्कता व गोपनीयता के साथ कर रहे थे। उन्हें यह आशंका थी कि यदि बादशाह अकबर को पता चला तो उनका यह सृजनयज्ञ भंग हो सकता है। इसी आशंका के कारण वे अपनी पहचान को छुपाए हुए थे। सुकृत्यों की सुगंध कभी नहीं छिपती। यह बात उनके संदर्भ में भी सही साबित हुई। गोस्वामी जी की कीर्ति किसी प्रकार अकबर तक जा पहुँची। हुनर और योग्यता की क़द्र करने वाले अकबर की उत्कण्ठा प्रबल हो उठी। लालसा थी एक बार तुलसीदास जी से प्रत्यक्ष भेंट की। जिनका कोई पता ठिकाना गुप्तचर तक नहीं लगा पा रहे थे। एक दिन सैर के लिए हाथी पर सवार होकर निकले अकबर ने अपनी मंशा राजकवि अब्दुर्रहीम ख़ानखाना को बताई। बादशाह को अपने नवरत्नों में सम्मिलित कविवर रहीम की काव्य प्रतिभा का भान था। साथ ही यह विश्वास भी कि गोस्वामी जी की खोज उनके अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता। कविवर रहीम ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को करने का बीड़ा उठा लिया। संयोगवश हाथी पर सवार रहीम कवि ने अपने हाथी पर ग़ौर किया। जो अपनी सूंड से धूल उठा कर स्वयं के सिर पर डालता हुआ चल रहा था। हाथी की यह क्रिया स्वाभाविक थी किंतु उसने रहीम दास जी को एक युक्ति तत्समय सुझा दी। कविवर रहीम के मानस में एक प्रश्नात्मक पंक्ति का जन्म हो गया-#धूरि_धरत_गज_शीश_पर_कहि_रहीम_केहि_काज?अर्थात गजराज हाथी अपने सिर पर धूल क्यों रखता है?        क़ाफ़िला दरबार में पहुँचने के बाद कवि रहीम ने पंक्ति बादशाह को सुंताई। साथ ही यह दावा भी कर दिया कि इस पंक्ति पर दूसरी पंक्ति धरती पर केवल तुलसीदास जी ही लगा सकेंगे। किसी और में सामर्थ्य नहीं कि वे उनके प्रश्न का सटीक उत्तर देते हुए दोहे को पूर्ण कर सके। तय हुआ कि पंक्ति को एक प्रतियोगिता के रूप में प्रचारित किया जाएगा। जो सही पंक्ति लगाते हुए दोहे को पूर्ण करेगा। उसे हज़ार स्वर्ण मुद्राएं पुरुस्कार के तौर पर दी जाएंगी। दिन बीतते गए। दूर-दूर के कविगण अपनी पंक्ति के साथ दरबार में पहुँचते रहे। यह और बात है कि रहीम कवि उन्हें नकारते और लौटाते रहे। उन्हें जिस सार्थक पंक्ति की प्रतीक्षा थी वो अब तक दरबात में नहीं आई थी। दूसरी ओर पंक्ति व स्पर्द्धा का प्रचार देश भर में हो चुका था। प्रतिभा और प्रतिष्ठा की इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए बेताब कवि दरबार में उमड़ते रहे और लौटाए जाते रहे।         चित्रकूट में एक निर्धन ब्राह्मण रहा करता था। जो लकड़ी काट कर व बेच कर अपने परिवार का उदर पोषण करता आ रहा था। उसकी चिंता अपनी दो पुत्रियों के गौने को ले कर थी। जिसमें उसकी निर्धनता आड़े आ रही थी। लकड़हारा नित्य सृजन करने वाले श्री तुलसीदास जी को देख चुका था। उनकी विद्वता और सज्जनता का अनुमान भी लगा चुका था। उसने सोचा कि यदि बाबा एक पंक्ति लिख दें तो उक्त प्रतियोगिता जीती जा सकती है। वो अपने इस पक्के भरोसे के साथ चित्रकूट के घाट पर जा पहुँचा। गोस्वामी जी को प्रणाम कर उन्हें अपनी पीड़ा से अवगत कराया। साथ ही अपना मंतव्य भी बताया। गोस्वामी जी को इस प्रतियोगिता के पीछे कोई चाल होने का अंदेशा था, किंतु वे निर्धन ब्राह्मण की मदद से पीछे हटना भी नहीं चाहते थे। उन्होंने शर्त रखी कि वो उनकी दी हुई पंक्ति को स्वरचित बता कर दरबार में सुनाए। ईनाम लेकर अपने घर जाए और दायित्व पूर्ण करे। भूल कर भी किसी को उनके बारे में ना बताए। ब्राह्मण को अपनी निर्धनता से पार पाना था। वो तुरन्त इस शर्त को मां गया। तुलसीदास जी ने उसे एक पंक्ति लिख कर दी और समझाइश देते हुए विदा कर दिया। लकड़हारा जैसे-तैसे दरबार के द्वार तक जा पहुँचा। उसकी दयनीय दशा को देख कर द्वार पर तैनात प्रहरियों ने उसे रोक लिया। संयोग से यह दृश्य कविवर रहीम ने देख लिया। उन्होंने उसे आने देने को कहा। लकड़हारा अब दरबार में था। उसने अपनी पंक्ति सुनाने की अनुमति माँगी। जैसे ही उसे अनुमति मिली, उसने गोस्वामी जी द्वारा दी गई पंक्ति सुना दी-#जेहि_रज_मुनि_नारी_तरी_तेहि_ढूँढत_गजराज।।अर्थात प्रभु श्रीराम के चरणों की जिस धूल से ऋषि भार्या अहिल्या का उद्धार हुआ। गजराज उस रज की खोज में है ताकि उसका भी उद्धार हो सके।          पंक्ति को सुनते ही रहीम कवि उछल पड़े। उन्होंने लकड़हारे को गले से लगा लिया। उनकी तलाश एक दोहे की पूर्णता के साथ पूरी हो चुकी थी। यह अलग बात है कि वे इस पंक्ति को न इस ब्राह्मण का मानने को तैयार थे। ना ही उसे तुलसीदास के रूप में स्वीकार पा रहे थे। पारखी निगाहें अब भी सच की तलाश में थीं। लकड़हारे को बंदीगृह में डालने का भय दिखाया गया। भयवश उसने सारा सच उगलते देर नहीं लगाई। कहा जाता है कि इसके बाद अकबर और रहीम कवि ने चित्रकूट पहुँच कर गोस्वामी जी के दर्शन किए और अपनी जिज्ञासाओं को शांत किया। यह प्रसंग साहित्य संसार के मूर्धन्य मनीषियों की विवेकशीलता का एक जीवंत प्रमाण है। जो #खग_की_भाषा_खग_ही_जाने वाली उक्ति को चरितार्थ करता है। साथ ही विभूतियों की पारखी वृत्ति और आत्मविश्वास को भी उजागर करता है। एक पंक्ति में संशय और दूसरी पंक्ति में समाधान का प्रतीक यह दोहा आज भी सोच की समरसता व साझा सृजन का एक नायाब उदाहरण है:-#धूरि_धरत_गज_शीश_पर_कहि_रहीम_केहि_काज?#जेहि_रज_मुनि_नारी_तरी_तेहि_ढूँढत_गजराज।।       #जय_राम_जी_की😊😊😊😊😊😊😊😊😊😢

😢 #लघुकथा / #फ़रमान 【प्रणय प्रभात】

शवयात्रा कस्बे के बीच से गुज़र रही थी। कुल आधा दर्ज़न लोग थे। पाँच ज़िंदा और एक मुर्दा। चार अर्थी उठाए थे। एक हँडिया लिए आगे चल रहा था। सरकारी फ़रमान का पालन जो ज़रूरी था। रास्ते में मदिरा के ठेके पर जमा आधा सैकड़ा लोगों ने एक उचटती सी नज़र इस नज़ारे पर डाली। देखते ही देखते शवयात्रा आगे गुज़र गई। 😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢

Monday, June 1, 2020

#दास्य_भाव_की_पराकाष्ठा_गोस्वामी_तुलसीदास। (धर्म और साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए) 【 प्रणय प्रभात】

एक प्रेरक वक्ता के रूप में लगभग डेढ़ दशक सक्रिय रहा। ईश कृपा से एक हज़ार के आसपास कार्यक्रमों में उद्बोधन का अवसर मिला। श्री रामचरित मानस के महान पात्र व प्रसंग मेरे वक्तव्यों में सहज ही शामिल रहे। क्योंकि जीवन पर इस महाग्रंथ का सर्वाधिक प्रभाव रहा। हिंदी साहित्य के विद्यार्थी के रूप में भी गोस्वामी तुलसीदास जी मेरे सर्वाधिक प्रिय कवि रहे। संवाद शैली में अपने उद्बोधन के बीच प्रश्न करना मुझे सदैव भाया। इससे वक्ता व श्रोताओं के बीच एक रुचिकर सामंजस्य जो स्थापित होता है। कई कार्यक्रमों में मैंने यह प्रश्न विद्यार्थियों के बीच रखा कि-#बंदहु_गुरुपद_पदमु_परागा_सुरुचि_सुवास_सरस_अनुरागा में गोस्वामी जी ने किस की वंदना की है। हर बार सतही उत्तर मिला- #गुरु_चरणों की। चौपाई के मर्म तक महाविद्यालय के विद्यार्थी भी नहीं पहुंचे। यूँ भी कह सकते हैं कि उन्होंने महाकवि की अगाध श्रद्धा के स्तर को जानने का प्रयास ही नहीं किया। ऐसे तमाम विद्यार्थियों को बताना पड़ा कि इस एक चौपाई में गुरु या गुरु चरण नहीं बल्कि #चरण_रज (धूल) की वंदना की गई है। जो गोस्वामी जी को दास्य भाव का सर्वोत्कृष्ट कवि सिद्ध करती है। इस चौपाई का भावार्थ दास्यभाव का उत्कर्ष है। महाकवि की गुरु के प्रति विनम्र आस्था का प्रमाण भी। स्मरण रहे कि यह वंदना श्री हनुमान जी महाराज के श्रीचरणों की है। जिनकी प्रेरणा से श्री तुलसीदास जी ने इस संसार को श्री रामचरित मानस जैसा महान ग्रंथ दिया। गुरु के कमल रूपी चरणों के परागकण अर्थात रज-कण की वंदना कर बाबा तुलसीदास जी ने गुरु-महात्म्य को नए आयाम भी दिए। जिनके लिए गुरु चरणों में आसक्त प्रत्येक गुरुभक्त को उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।  ध्यान रहे कि दास्यभाव की पराकाष्ठा का यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। बाबा तुलसी श्री हनुमान चालीसा का श्रीगणेश #श्री_गुरु_चरण_सरोज_रज के साथ करते हुए गुरु चरणों की रज के प्रति अपनी इसी निष्ठा को दोहरा चुके हैं।   #जय_रामजी_की#कोटिशः_प्रणाम_गोस्वामी_जी_को

Sunday, May 31, 2020

#अतीत_की_गाथा... #बाल_विद्या_मंदिर_स्कूल_श्योपुर 【प्रणय प्रभात】

#अंचल_का_पहला_निजी_शिक्षण_संस्थान_जिसने_रचे_कई_कीर्तिमान                      【प्रणय प्रभात】"बाल विद्या मंदिर" स्कूल यानि श्योपुर का पहला निजी शिक्षण संस्थान। जिसने इस अंचल की धरती पर अशासकीय शिक्षा को नए आयाम दिए। शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक गतिविधियों में अग्रणी इस संस्थान ने ही सिखाया कि शिक्षा व्यवसाय कितना सार्थक व सफल हो सकता है। सन 1977 में स्थापित इस एक विद्यालय ने उन बाहरी अधिकारियों व कर्मचारियों की दुविधा को ख़त्म किया जो उनके बच्चों की बेहतर प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी थी। यह वही दौर था जब नौकरशाह इस क्षेत्र को "काला पानी" मानते थे। उनकी इस सोच के पीछे कई कारण थे। जिनमें अच्छी प्राथमिक शिक्षा भी एक थी। हालांकि सरकारी प्रायमरी और मिडिल स्कूल कई थे। फिर भी अशासकीय स्कूलों में बच्चों को भेजने की सोच शासकीय सेवकों और समृद्ध परिवारों के मन में थी। निम्न व उच्च मध्यम वर्ग के पालक भी अपने बच्चों की बुनियादी शिक्षा के लिए एक बेहतर विकल्प चाहते थे। इसी सोच के साथ क्षेत्र की शैक्षणिक रिक्तता को सही समय पर भांपा श्री आनंद प्रकाश गुप्ता ने। जिन्होंने वर्ष 1977 में इस संस्थान की नींव डाली। कस्बे के मेन बाज़ार स्थित सेठ श्री लालचंद जैन को विशाल इमारत का एक बड़ा हिस्सा इस संस्थान का साक्षी बना। बाहरी परिसर में संचालित सहकारी व्यावसायिक एवं औद्योगिक बैंक वाला सारा हिस्सा इस शाला के लिए लिया गया। फिर पीछे का भवन भी किराए पर ले लिया गया। जिसके पहले कक्ष को प्रधानाध्यापक कार्यालय बनाया गया। इस कक्ष के बाहर ही शुद्ध पेयजल की व्यवस्था थी। सामने ही स्थित एक छोटे से कक्ष को स्टाफ रूम के तौर पर इस्तेमाल में लिया गया। मैहराबों और स्तम्भों वाले एक बड़े हॉल को लकड़ी की दीवारों से तीन भागों में विभाजित किया गया। प्रार्थना और खेलकूद के लिए एक अच्छा खासा प्रांगण इसी हॉल के पिछवाड़े था।  बच्चों की संख्या बढ़ने के साथ ही बाहरी परिसर में भी दो कक्ष अलग से लिए गए। इन सभी का उपयोग कक्षाओं के तौर पर होता था। बाद में बाहरी परिसर का बड़ा हिस्सा बैंक के लिए किराए पर दे दिया गया। बहरहाल, सुबह व दोपहर की दो पालियों में संचालित यह शाला एलकेजी से पाँचवीं तक के बच्चों के लिए थी। सुबह की पाली में बड़ी कक्षाएं लगती थीं। दोपहर की पाली छोटी कक्षाओं के लिए थी। नेवी वेल्यू और व्हाइट ड्रेस में लकदक बच्चे तब सरकारी स्कूलों के बच्चों से बिल्कुल अलग दिखाई देते थे। लाल रंग की टाई, बेल्ट और मोजे उन्हें सरकारी स्कूलों के बच्चों से कुछ ख़ास बनाते थे। माँ सरस्वती के चित्र वाला एक नीला-सफेद बेज भी बच्चों को लगाना होता था। काले चमकदार जूते भी पूर्ण गणवेश का हिस्सा थे। बच्चों को लाने ले जाने के लिए एक रिक्शा भी था। जिसे ग़नी चाचा नामक एक अधेड़ सज्जन चलाते थे। स्कूल में प्रेम बाई नामक एक महिला भृत्य थीं। बेहद मिलनसार, मेहनती, समर्पित और मृदुभाषी। उनके कान कार्यालय से बजने वाली घण्टी पर होते थे और आँखें बच्चों पर। शाला प्रधान श्री आनंद प्रकाश गुप्ता का सौम्य व्यक्तित्व अभिभावकों को आकर्षित करता था। छरहरा शरीर, गोरा रंग, स्टाइलिश बाल और शानदार कलम उनकी छवि को और निखारती थीं। वे अपने स्कूटर से स्कूल आते थे। तब उनका आवास मसालेदार मोहल्ले में हुआ करता था। वे स्कूटर बाहरी प्रांगण में खड़ा करते। खिली हुई मुस्कान के साथ सभी का अभिवादन स्वीकार करते और अपने कक्ष में बैठ जाते। कार्यालय छोटा लेकिन सुव्यवस्थित था। बड़ी सी मेज के पीछे श्री गुप्ता जी की कुर्सी होती थी। दाहिने हाथ पर गोदरेज की आलमारी। जिसकी छत पर करीने से कुछ फाइलें रखी होती थीं। बाएं हाथ पर लकड़ी की एक रैक, जिसमें रजिस्टर व स्टेशनरी रखी होती थी। इसी रैक पर माँ सरस्वती की एक बड़ी प्रतिमा विराजती थी। जिनके गले में मोटा सा कृत्रिम हार होता था। सफेद मोतियों की एक माला भी। कार्यालय के एक हिस्से में लकड़ी की चार-छह कुर्सियां होती थीं। टेबल पर मोटे काँच के नीचे वर्ष भर के कैलेंडर सहित कुछ अन्य जानकारियों वाले कागज़ होते थे। ऊपर टेलीफोन का काले रंग का चोंगा। इस फोन का नम्बर 103 होता था। यह वो दौर था जब कॉल करने के लिए नम्बर एक्सचेंज से कनेक्ट कराना पड़ता था। बाद में उसकी जगह नम्बर डायल करने वाले चोंगे ने ले ली। जो कार्यालय को कार्यालय का लुक देता था। श्री गुप्ता जी को बच्चे सर कहते थे जबकि स्टाफ मेम्बर भाई साहब। भाई साहब की कार्यप्रणाली भी समय की माँग के अनुसार कुछ अलग थी। अधीनस्थ स्टाफ को निर्देश वे पर्ची पर लिख कर दिया करते थे। ताकि अध्ययन व अध्यापन कार्य में कोई व्यवधान न आए। फोन पर बात करने का उनका ढंग भी कुछ अलग होता था। वे फोन के माउथपीस को मुँह के बजाय गले पर रखते थे। बातचीत की शैली संयमित, शालीन व आत्मीय होती थी। कार्यालय आने वाले हर अभिभावक को पूरी तरज़ीह दी जाती थी। बैठते ही बाई काँच के साफ-सुथरे गिलासों में ठंडा पानी पेश कर देती थी। कुछ देर बाद बाहर से चाय भी आ जाती थी। श्री गुप्ता की अनुपस्थिति में अभिभावकों की बात को सुनने व समस्या को निपटाने की ज़िम्मेदारी वरिष्ठ शिक्षिकाओं की थी। जो बेहद व्यवहार कुशल, निपुण होने के साथ-साथ संस्थान के प्रति घोर निष्ठावान व समर्पित थीं। पारस्परिक सामंजस्य और आत्मीयता रखने वाली योग्य शिक्षिकाओं की कर्तव्यनिष्ठा ने शाला को हर मामले में शीर्ष पर ले जाने का काम किया। जिनके पीछे श्री गुप्ता की नेतृत्व कुशलता की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका थी। स्कूल ने पहले ही साल कामयाबी के वो झंडे गाड़े कि अगले ही साल दूसरा अशासकीय स्कूल टैगोर बाल विद्या निकेतन के तौर पर अस्तित्व में आ गया। इस स्कूल की स्था पना 1978 में श्री रशीद अहमद कुरैशी ने की। इसके बाद प्रायवेट स्कूलों की श्रृंखला बढ़ती चली गई। जिसके पीछे बाल विद्या मंदिर के जलवे की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। इनमें एमजी बाल विद्या निकेतन और ज्ञानोदय विद्या मंदिर अग्रणी थे। यह थी स्कूल की स्थापना और शुरुआती ढाँचे से जुड़ी बातें। अगले अंक में बात करेंगे उन तमाम उपलब्धियों की, जो इस संस्थान ने हासिल कीं। शिक्षा सत्र 2010/11 में यह स्कूल सीताराम जी और नवग्रह मंदिर के बीच वाली गली में स्थानांतरित हो गया। जो अब भी विधिवत संचालित है। विरासत की कमान विगत कई वर्षों से श्री गुप्र के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री अनिल गुप्ता के हाथ है। इससे पहले पाली रोड स्थित सात नीमड़ी और नर्सरी के सामने निजी भवन में इस शाला की शाखाएं भी स्थापित व संचालित हुईं। जो कालांतर में खुलने वाले बड़े संस्थानों के सामने संसाधनों की लड़ाई में कामयाब नहीं रह पाईं। तथापि शुरुआती दो दशक तक श्योपुर के आसमान पर बाल विद्या मंदिर की कीर्ति पताका पूरी शान से लहराई। इस संस्थान के तमाम विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। तमाम उच्च पदों पर हैं। जिनके सुंदर भविष्य को ठोस आधार देने का श्रेय इस संस्थान को बिना किसी संकोच के दिया जा सकता है। साधुवाद श्री गुप्ता जी को। आप दीर्घायु हों और स्वस्थ रहें, यह कामनाएं हैं। शुरुआती एक दशक में बहुत स्नेह पाया आपसे।            (#शेष_अगले_अंक_में.....)r

Saturday, May 30, 2020

😢 #भावनात्मक_स्मरण #अलविदा_मित्र_इंद्रकुमार। (सोचा भी न था कि आखिरी होगी वो आरसे बाद की एक मुलाक़ात)

अब से महज कुछ देर पहले ही अपने मित्र व सहपाठी रहे श्री इंद्र कुमार जैन (नत्थू बेल्डिंग वाले) के प्रयाण का दुःखद समाचार मिला। आहत हूँ अपने एक मित्र के यूँ अलविदा कह जाने से। हायर सेकेंडरी में मेरे सहपाठी रहे इंद्र कुमार से मेरी पिछली व अंतिम भेंट उसी शाला परिसर में हुई थी, जहाँ हम साथ पढ़ा करते थे। प्रसंग था शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय श्योपुर में आयोजित सामूहिक सूर्य नमस्कार कार्यक्रम का। इस कार्यक्रम में मुझे मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। जबकि इंद्र कुमार अभिभावक के तौर पर विशिष्ट अतिथि थे। मंच साझा करते हुए हम दोनों ही आह्लादित थे। एक ही शहर के निवासी होने के बाद भी तक़रीबन तीन दशक बाद जो मिले थे हम। लगभग छह-सात वर्ष पूर्व बेहद आत्मीय माहौल में हुई यह भेंट अंतिम होगी, इसकी कल्पना तक नहीं थी। मेरे उद्बोधन पर हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव करते हुए इंद्र कुमार ने बहुत सी पुरानी यादों को भी वार्तालाप के दौरान दोहराया था। मैंने विद्यार्थी जीवन वाली उसी सौम्यता और विनम्रता को एक बार फिर से महसूस किया था। जो उनके व्यक्तित्व की पहचान हुआ करता था। आज वे इस नश्वर संसार से अकस्मात विदा हो गए। स्तब्ध हूँ और दुःखी भी। प्रभु श्री जिनेन्द्र दिवंगत मित्र की आत्मा को परम शांति व मोक्ष प्रदान करें। शोक संतप्त परिजनों के प्रति मेरी आत्मीय संवेदनाएं। दिवंगत मित्र को भावपूरित श्रद्धांजलि 💐💐💐                     【प्रणय प्रभात】

Friday, May 29, 2020

#लघुकथा / #लेनदार 【प्रणय प्रभात】

रामदयाल को बहुत दिनों से बाबूलाल की तलाश थी। उसे उधार दिए हुए हज़ार रुपए जो वसूलने थे। तीन महीनों के लॉकडाउन ने कड़कनाथ अलग से बना रखा था। अचानक उसकी आँखों में चमक आई। बाबूलाल सामने से चला आ रहा था। पास आते ही दोनों की नजरें मिलीं। बाबूलाल ने अचानक मास्क पर मुट्ठी लगा कर ज़ोर ज़ोर से खाँसना चालू कर दिया। तक़ाज़े के शब्द बेचारे रामदयाल के गले में ही घुट कर रह गए। उसने कन्नी काट कर बग़ल से गुज़र जाने में ही ख़ैर समझी। दूसरी ओर बाबूलाल कोरोना को मन ही मन धन्यवाद देता जा रहा था।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

Sunday, May 24, 2020

आज_का_दिन_ऐतिहासिक ■ चार बलिदानों की नींव पर रखी गई बुनियाद। ब ■ आज 22 साल का हुआ हमारा अपना ज़िला श्योपुर। ■ भुला दिया गया लम्बे व कठिन संघर्ष का इतिहास। 【प्रणय प्रभात】

आज 25 मई को मध्यप्रदेश का सरहदी जिला 22 साल का यानि कि पूर्ण बालिग हो गया है। यह और बात है कि जिले की 22वीं सालगिरह को भी आम दिनों की तरह बिता दिया जाना पहले से तय था। इस खास दिन ना तो कोई आयोजन बीते 21 सालों की तरह हुआ। ना ही लोगों ने जिला निर्माण के संघर्ष और चार निरीह नागरिकों के बलिदान को याद किया। चार जिंदगियों के बलिदान और तमाम लोगों के संघर्ष का 47 साल पुराना वाकया भूली-बिसरी दास्तान बना रहा। गौरतलब है कि श्योपुर को जिला बनाए जाने की मांग वर्ष 1974 में शुरू हुई थी। समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ अभिभाषक रोशनलाल गुप्ता थे जो अब दुनिया में नहीं हैं। पूर्व विधायक तथा महामंत्री रामस्वरूप वर्मा का भी देहावसान हो चुका है। उपाध्यक्ष रहे वरिष्ठ अधिवक्ता देवीशंकर सिंहल तथा पूर्व विधायक सत्यभानु चौहान जिले के लिए जनसंघर्ष के गवाह आज भी हैं। मांग को प्रबल बनाने की कोशिशें तत्समय उपलब्ध संसाधनों के बलबूते जारी रही। जिला निर्माण हेतु गठित आंदोलन समिति को लगा कि सरकार सुनवाई के मूड में नहीं है। वर्ष 1975 में इसे जनांदोलन का रूप देते हुए अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन सूबात कचहरी के सामने शुरू कर दिया गया। - इसी दौरान 21 मई 1975 को आया वो काला दिन, जो बाद में इस मांग को आंच देने वाला भी रहा। सरकार से चर्चा के लिए भोपाल गया आंदोलनकारियों का शिष्टमंडल मांग नामंजूर होने की मायूसी के साथ श्योपुर लौटा। धरना स्थल पर जमा बड़ौदा व श्योपुर के वाशिंदों में रोष व असंतोष व्याप्त हो गया। धरना खत्म करने का निर्णय लिए जाने के साथ डेरे-तंबू समेट लिए गए। आंदोलनकारियों की वापसी के दौरान चौपड़ बाजार स्थित स्टेट बैंक पर तैनात गार्ड को उपद्रव की आशंका हुई। इसी दौरान दो-चार पत्थर बैंक की ओर फेंके गए और जवाब में पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में चार निरपराध नागरिकों गप्पूमल वैश्य, वजीर खां, मुंशी हसन मोहम्मद और जुम्मा भाई का बलिदान हो गया। भीड़ बेकाबू हो गई और गुस्से की आग तत्कालीन न्यायालय व तहसील सूबात कचहरी तक जा पहुंची। फिर लगा दिया गया कफर््यू और शुरू हो गया पुलिस का तांडव, जिसकी जद में समूचा शहर आया। जिला निर्माण आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी करने वाले सर्वोदयी नेता मंगलदेव फक्कड़, समिति के सदस्य पं. रमाशंकर भारद्वाज, कैलाशनारायण गुप्ता, प्रेमचंद जैन, रामबाबू जाटव, शिवनारायण नागर, कैलाश सेन आदि को पुलिस ने घरों में घुसकर बर्बरता के साथ पीटा। - मामला शांत होने के बाद गोलीकांड की जांच के लिए जस्टिस एमएल मलिक की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया। आयोग ने तथ्यों व साक्ष्यों की सुनवाई करने के बाद माना कि जिला निर्माण की मांग जायज है। आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वालों ने सरकार पर दवाब बनाना एक बार फिर से शुरू कर दिया। श्योपुर आने वाले हरेक राजनेता से लेकर बड़े अधिकारियों तक को ज्ञापन देना इस लड़ाई का शांतिपूर्ण हिस्सा रहा। तमाम बार प्रतिनिधिमंडल राजधानी पहुंचकर प्रदेश के मुखियाओं से मिलते रहे। इसी मांग और दवाब का नतीजा जस्टिस बीआर दुबे की अध्यक्षता में गठित जिला पुनर्गठन बोर्ड के रूप में सामने आया। आंदोलन समिति के सदस्य और तत्कालीन युवा नेता कैलाशनारायण गुप्ता पहला आवेदन लेकर बोर्ड के सामने पहुंचे। इसके बाद बोर्ड के समक्ष मांगों और प्रस्तावों का अम्बार लगता रहा। श्योपुर के विकास के लिए अपेक्षित जिला निर्माण की मांग निरंतर जोर पकड़ती गई। - संभावनाऐं जिले की घोषणा को लेकर बनीं मगर एक कांग्रेसी नेता ने प्रदेश के राजकोष पर भार पडऩे का हवाला देेते हुए याचिका लगा दी। जिला निर्माण का रथ बीच रास्ते में अटक गया। कालांतर में कानूनी पेचीदगियां एक-एक कर खत्म होती चली गईं। जीत जनता के सामूहिक प्रयास और विश्वास की हुई। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि श्योपुर सहित 16 नए जिलों की घोषणा 1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा द्वारा की गई थी। ये और बात है कि भाजपा सरकार की इस घोषणा के खिलाफ कांग्रेसी नेता गुलाबचंद तामोट न्यायालय की शरण में चले गए। उनका तर्क था कि इतने जिलों के एक साथ गठन के बाद राजकोष पर भारी दवाब पड़ेगा। बाद में पटवा सरकार की इसी घोषणा को अमली जामा दिग्विजय सरकार ने पहनाया। - वर्ष 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांगे्रस सरकार ने प्रदेश में 16 नए जिलों के गठन का साहसिक फैसला किया। जिला निर्माण की घोषणा 21 मई 1998 को हुई और राजपत्र में अधिसूचना के प्रकाशन के साथ ही 25 मई को श्योपुर जिले का विधिवत लोकार्पण कर दिया गया। श्योपुर जिले के विधि-विधान से वजूद में आने का जोश जनमानस पर हावी रहा। दो-चार साल जिला निर्माण की सालगिरह भी मनाई गई। उसके बाद लोग इस सौगात के लिए हुए लंबे संघर्ष को भूल गए। लिहाजा 25 मई का एतिहासिक दिन आम दिनों की तरह गुजरता चला गया। - अब जिला उम्र के लिहाज से बालिग हो चुका है। यथार्थ के धरातल पर इसकी अवस्था एक बिगड़ैल किशोर के जैसी है। आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का अभाव जिले की रगों में समाया हुआ है। वजह राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक सभी प्रकार की हैं। बात विकास की करें तो भवनों और भौतिक संसाधनों की दौड़ में जिला काफी आगे जा चुका है। वनों की बहुलता, कृषि उत्पादन की विपुलता के साथ कला-संस्कृति और शांतिप्रियता जिले की पुरानी पहचान बरकरार रखे हुए है। बावजूद इसके मैदानी धरातल पर जिस तीव्रगामी विकास की दरकार थी उसका गति पकड़ पाना आब भी बाकी है। सरकार और उसके अलमबरदार हाल-फ़िलहाल सीमेंट कांक्रीट के जंगल खड़े कर ख़ुद को विकास का मसीहा साबित करने पर तुले हैं। आम लोगों की बुनियादी दिक़्क़तों के साथ युवाओं के लिए समुचित आजीविका के अभाव आज भी मुँह बाए खड़े हैं। लघु, कुटीर धंधों, व्यवसायों व उद्योगों के नाम पर जिला अब भी किसी बेवा की माँग की तरह सूना है। बरसों पुरानी सँकरी रेल लाइन के चौड़ीकरण का काम कछुआ चाल से चल रहा है। आमान परिवर्तन का मुद्दा आज भी अधर में है। कूनो वन्यजीव अभ्यारण्य की स्थापना ने विकास की जो आस जगाई थी। उस पर गुजरात सरकार की हठधर्मिता का ग्रहण लगा हुआ है। दुर्लभ प्रजाति के एशियाई शेरों को इस अभ्यारण्य में लाने के प्रयास नहीं के बराबर हैं। कृषि तथा वनोपज पर आधारित व्यवसाय व उद्योगों का वजूद में न आ पाना भी शर्मनाक है। देखना यह है कि भौतिकतावादी विकास की पगडंडी पर दौड़ता ज़िला असली विकास से रूबरू कब तक हो पाता है?
                【प्रणय प्रभात】
#पुनश्च:
आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना व लम्बा है। आलेख स्मृतियों व संग्रहित जानकारियों पर आधारित है। कुछ नहीं बहुत कुछ छूटा होगा। ख़ास कर कुछ महानुभावों के नाम। इस तरह की त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा याचना। सुझावों के अनुसार संशोधन की गुंजाइश सदैव रहती है। यहाँ भी है। मंतव्य एक साझा संघर्ष की दास्तान को रेखांकित करना है। किसी को महिमा-मंडित करना नहीं। विघ्नसंतोषी  जन कृपया सियासत की गंदगी यहाँ न फैलाएं।
Narendra Singh Tomar
Kailash Narayan Gupta
D.S. Singhal

Saturday, May 23, 2020

#सरस्वती_वंदना :- 【प्रणय प्रभात】-

वीणापाणी, पद्मासना, कमलासना, ब्रह्म-अजा,माँ तू मुझे विद्या औ विनय का शुभ दान दे।कण्ठ में विराज मेरी क़लम को सिद्धि सौंप,मेरी इस लेखनी को गति अविराम दे।।- सत्य लिखूँ सत्यवादिता के पथ पे ही चलूँ,मेरी स्वर शक्ति को तू सरगमों का ज्ञान दे।दीप मन मंदिर में ज्ञान का जला दे मातु,नित्य नव सृजन करूँ ये वरदान दे।।- यश नहीं, रूप नहीं तेरी भक्ति चाहता हूँ,भक्ति गंगा ज्ञान गंगा का ही स्नान दे।करता नमन तुझे शत शत शारदा मैं,मुझे ऐश्वर्य नहीं आन बान शान दे।।- शब्द चुन छंद रचूँ छंद चुन गीत रचूँ,गीतों में बहाव माँ तू भावों को वितान दे।उड़े पंख तान ताकि छुए आसमान,मेरे मन के मराल को विचारों की उड़ान दे।।💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

#संस्मरण छोले_के_पत्ते_पर_रबड़ी_वाली_बर्फ़(उस स्वाद का आज भी नहीं कोई मुक़ाबला) 【प्रणय प्रभात】

एक छोटे से क़द का सीधा-सादा सा बुजुर्ग। उसके कंधे पर लटका चमकीले नीले रंग का बड़ा सा थर्मस फ्लास्क। थर्मस में ऊपर तक जमी ठंडी-ठंडी रबड़ी वाली बर्फ। आप में से बहुतों को याद आ रहा होगा वो थर्मस। जिसका ढक्कन बड़े सलीके से खोला जाता। हम बच्चे  ललचाई सी नज़र से उसमें भरी रबड़ी बर्फ़ को ताकते। बुजुर्ग एक चाकू से रबड़ी वाली बर्फ़ की एक परत काटता। उसे छोले के हरे पत्ते पर रखता और पत्ता हाथों में थमा देता। दस और बीस पैसे में मिलने वाली इस रबड़ी वाली बर्फ़ का लुत्फ़ हमनें सन 1973-74 में लिया। कसम से, वो अनूठा और विशुद्ध स्वाद आज तक ज़ुबान भूली नहीं है। लच्छेदार रबड़ी बर्फ़ कैसे और कहाँ बनती थी यह आज तक नहीं पता। याद है तो बस इतना कि हम उसका स्वाद पारख जी के बाग़ में लेते थे। छुट्टी वाले दिन टोड़ी बाज़ार से जुड़ीं गलियों में भी। जिनमें से एक गली में हमारा घर हुआ करता था। उस गली को छोड़ने के बाद भी यह रबड़ी बर्फ़ साल में एक बार नसीब होती रही। शायद अगले चार-छह साल तक। मौक़ा होता था चैत्र शुक्ल तीज का। जब वस्त्राभूषणों से सुसज्जित महिलाएं गणगौर पूजन के बाद पारख जी के बाग में जमा होती थीं। अलग-अलग समूहों में बंटी महिलाएं लोकगीत गाते हुए जम कर नृत्य करतीं। साथ आई बाल मंडली इस मेले जैसे माहौल का मज़ा लेती। बाग़ के बीच वाले गलियारे में चाट-पकोड़ी और कुल्फी के ठेलों सहित बच्चोँ को ललचाने वाले तमाम आइटम उपलब्ध होते थे। जिनमें घूमने वाली फिरकियाँ, भोंपू, सरकंडे के फोल्डिंग साँप, लाल पन्नी वाले गत्ते के चश्मे, बम्बई की मिठाई और बुढ़िया के रंग-बिरंगे बाल ख़ास थे। इसी भीड़ के बीच गूंजती रहती थी रबड़ी वाली ठंडी बर्फ़ की आवाज़। जो सब की ख़ास पसंद थी। धीरे-धीरे इस बर्फ़ की जगह दूध-मावे वाली कुल्फी और रंगीन पानी वाली चुस्की ने ले ली। जो स्थानीय स्तर पर बनाई और बेची जाती थीं। कुछ सालों बाद बाज़ार पर ब्रांडेड आइसक्रीम का कब्ज़ा हो गया। चुस्की, कुल्फ़ी और कम्पनियों की आइसक्रीम के बीच आज भी मुक़ाबला जारी है। वक़्त के साथ अगर कुछ गुम हुआ है तो वो बड़ा सा नीला थर्मस, जिसमें भरी बर्फ़ के स्वाद को टक्कर देने वाली कोई आइसक्रीम आज भी बाज़ार में नहीं है। थर्मस वाली उस बर्फ़ को बेचने वाले उस इकलौते बुजुर्ग के साथ ही वो स्वाद भी अतीत की वादियों में कहीं गुम हो गया। जिसकी अब मुझ जैसे लोग बस चर्चा ही कर सकते हैं। छोले के हरे पत्तों से बनने वाले पर्यावरण मित्र दोने भी अब कहीं नज़र नहीं आते। जो एक समय घरेलू उद्योग का आधार होते थे। कुल मिला कर हरे-भरे पत्ते पर लच्छेदार बर्फ़ अब स्मृति का विषय है। जो कभी नहीं धुंधला सकता।😋😋😋😋😋😋😋😋😋😋

#नज़्म :--#एक_कहानी_है_रूमानी.…..! प्रणय प्रभात

वक़्त हो तो आइएइक #दास्तां सुन लीजिए।कुछ रुमानी #ख़्वाब अपनीआँख में बुन लीजिए।।#इश्क़ कैसे जागता हैजागती हैं #ख़्वाहिशें।दो #दिलों को किस तरह सेजोड़ती हैं #बारिशें।।आज भीगी सी है #रुतमहकी हुई सी #रात है।हम #जवां होने को थेये उन दिनों की #बात है।।था वो महीना #जून काहो कर चुकी #बरसात थी।थोड़ी #तपिश थी #आसमां पे#अब्र की #बारात थी।।#वाकिफ़ नहीं थे #इश्क़ सेना #आशिक़ी के रंग में।#मासूम सी इक #गुलबदनअल्हड़ सी #लड़की संग में।।#पहचान थी कुछ #रोज़ कीज़्यादा न जाना था उसे।था #हुक्म घर वालों का तो#घर छोड़ आना था उसे।।घर से निकल कुछ देर मेंकच्ची #सड़क पर आ गए।इके बार फिर से आसमां पेकाले #बादल छा गए।।घर दूर था उसका अभीरफ़्तार बेहद मंद थी।बरसात के आसार थेबहती हवा अब बंद थी।।मौसम के तेवर भांप केसंकोच अपना छोड़ कर।कुछ तेज़ चलिए ये कहामैने ही चुप्पी तोड़ कर।।ठिठकी, रुकी, बोली लगाझरना अचानक से बहा।मैंने सुना उस शोख़ ने इक अटपटा जुमला कहा।थे लफ़्ज़ मामूली मगर मानी दुधारी हो गए।बेसाख़्ता बोली वो मेरेपाँव भारी हो गए।।ये तो समझ आया नहींदिल आह बोले या कि वाह।मासूम से चेहरे पे उसकेथम गई मेरी निगाह।एकटक देखा उसेमौसम शराबी हो गया।मरमरी रूख शर्म से बेहद ग़ुलाबी हो गया।।पल भर में ख़ुद की बातख़ुद उसकी समझ मे आ गई।क्या कह गई ये सोच केवो नाज़नीं शरमा गई।।नीचे निगाहें झुक गई।लब भी लरज़ने लग गए।बरसात होने लग गईबादल गरजने लग गए।।नज़रों से नज़रें मिल गईंमाहौल में कुछ रस घुला।उसने दिखाया पाँव अपनाराज़ तब जाकर खुला।।गीली मिट्टी में मुझेलिथड़ी दिखीं जब जूतियां।पाँव भारी क्यों हुए थेये समझ आया मियां।।वाक़या छोटा था परइक ख़ास किस्सा हो गया।।मुख़्तसर सा वो सफ़रयादों का हिस्सा हो गया।।          #प्रणय_प्रभात

#लघुकथा / #संतुष्टि 【प्रणय प्रभात】

रोहन आज बड़ा खिन्न था। खिन्नता की वजह था उसका सहपाठी तरुण। जो अरसे बाद आज अचानक बाज़ार में टकराया। पता चला कि दुबई में इंजीनियर है। ठाठ-बाट की ज़िंदगी जी रहा है। वही तरुण जो ख़ुद का लिखा नहीं पढ़ पाता था। किस्मत को कोसता रोहन चल नहीं रहा था। क़दम घसीट रहा था। अचानक सड़क किनारे लगे ठेले पर पॉपकॉर्न बना कर बेचने वाले ने नमस्कार ठोका। उसी ने रोहन के पशोपेश को अपना परिचय देते हुए दूर किया। पता चला कि वो उसका सहपाठी हेतराम है। दिन भर में डेढ़ सौ रुपए कमा पाता है। हर महीने 50 हज़ार रुपए पगार पाने वाला रोहन संतुष्ट था। अब उसे अपनी तक़दीर पर कोई नाराज़गी नहीं थी।

Friday, May 22, 2020

एक्सक्लूसिव्ह :- संकरी पटरियों पर लगातार जारी है मौत का सफर। अनगिनत मुसाफिरों की जिंदगी से खिलवाड़ मजबूरी में मवेशी बनने पर मजबूर हैं यात्री। (प्रभात प्रणय)"

घर से निकलो तो पता जेब में रख के निकलो।हादसा चेहरों की पहचान मिटा देता है..........।।"हिन्दुस्तान के नामचीन शायर डॉ. बशीर बद्र का यह चर्चित शेर सौ फीसदी सटीक साबित होता है श्योपुर से ग्वालियर के बीच बेनागा दौड़ती उस छुकछुक गाड़ी के वजूद पर जो अपने अस्तित्व पर हावी अनगिनत मुसाफिरों के लिये सफर का इकलौता माध्यम होने के साथ-साथ सफर की दुरूहता और जीवन के लिए जोखिम का भी पर्याय बनी हुई हैै। लोहे की संकरी पटरियों पर निर्भर छोटे-छोटे पहियों पर टिकी चंद डिब्बानुमा बोगियों में अन्दर से लेकर दरवाजे के पायदान, कपलिंक और छत तक सम्पूर्ण साहस व दक्षता के साथ लदी सवारियों से भरपूर बेनागा सफर पर रवाना होने वाली इस टे्रन का जहां अपना एक समृद्घ इतिहास भी हैै और शर्मनाक वर्तमान भी, जिस पर विचार किये जाने की संभावनाओं व आवश्यकताओं के बावजूद आज तक उतनी शिद्दत से विचार नहीं किया गया हैै जो समय की मांग भी है और न्यायोचित भी। मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिला मुख्यालय के रूप में अधोसंरचनात्मक विकास के मामले में लगभग सभी मोर्चों पर ठगे से नजर आने वाले श्योपुर जिला मुख्यालय स्थित प्राचीन स्टेशन से शुरू होने वाले छोटी रेल के इस सफर पर नजर डाली जाये तो सहज ही यह देखा, समझा और जाना जा सकता है कि जान हथेली पर लेकर यात्रा के लिये निकलने वाले उन हजारों यात्रियों को अदम्य शौर्य व पराक्रम के एवज में कोई पुरूस्कार जरूर दिया जा सकता है जो चाहे-अनचाहे इस रेल पर सवार होते हैैं। यहां उल्लेखनीय है कि श्योपुर से ग्वालियर के बीच परिवहन के लिये प्रायवेट कम्पनियों की बसों और सड़क मार्ग के बावजूद छोटे-बड़े ऐसे गांवों की संख्या सैंकड़ों में है जहां के हजारों लोग आवागमन के लिये इसी गाड़ी के वजूद पर निर्भर हैैं तथा अपनी इसी मजबूरी के चलते मवेशियों की तरह लगभग ठुंसने वाले अंदाज में सफर पर विवश हैं। श्योपुर से सबलगढ़ और ग्वालियर तक सुबह और दोपहर की पारियों में दो-दो गाडिय़ों के परम्परागत चक्करों पर टिका जिले का रेलवे यातायात कितना दुर्गम और जोखिम भरा हैै इसका अंदाजा केवल संचालित होने वाली गाडिय़ों और सवारियों की हालत से नहीं उन पुल-पुलियाओं की स्थिति से भी आसानी से लगाया जा सकता हैै जिन पर से गुजरकर यह छुकछुक गाड़ी अपने गंतव्य तक पहुंचती हैै। आजादी से बरसों पहले अंग्रेजों द्वारा बनवाये गये पुलों से होकर मंजिल की ओर कूच करने वाली यह गाड़ी वस्तुत: सिंधिया राजवंश की धरोहर के रूप में मान्य की जाती हैै, जिसे आम जनता की मांग के अनुसार आमान परिवर्तन करते हुऐ आधुनिक रूप दिये जाने के वायदों व आश्वासनों का बोझ जनजीवन की सोच पर हावी बना हुआ हैै। *** दावे, वादे, आडम्बर, आश्वासन और घोषणाऐं.....यह बात अलग है कि प्रदेश से लेकर देश तक पर काबिज इंका व भाजपा के नामचीन राजनेताओं के वादों, दावों, आडम्बरों, आश्वासनों और घोषणाओं के बावजूद इस गाड़ी का वजूद पूर्ववत कामचलाऊ बना हुआ हैै तथा आम लोगों के लिये आवागमन का यह साधन हमेशा की तरह खास साबित होता आ रहा हैै। आये-दिन किसी न किसी तरह की छोटी-बड़ी घटनाओं की साक्षी बनने तथा चलते-चलते राह में पसर जाने वाली इस गाड़ी के मुसाफिरों के लिये सुविधा नाम की कोई चीज बेशक उपलब्ध न हो किन्तु दुविधा उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों और परेशानियों का कहीं कोई टोटा नहीं हैै। स्टेशनों की हालत से लेकर रेल की बोगियों की हालत का मिलान आसानी से किया जा सकता है और इसी के आधार पर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है उन बेहिसाब यात्रियों की जान-माल की सलामती की संभावनाओं का, जो भगवान की कृपा पर निर्भर है। फिलहाल लब्बो-लुआब इतना सा है कि एक गौरवशाली अतीत रखने वाली इस छुकछुक गाड़ी का वर्तमान बेहाल हैै और अपने भविष्य की सलामती के लिये उस तंत्र की ओर आशा भरी नजरों से निहार रहा हैै, जो हजारों जिन्दगियों की सुरक्षा को लेकर लगातार बेपरवाह बना हुआ हैै तथा शायद आगे भी बना रहेगा। ऐसे में समय का तकाजा यही है कि आम यात्री अपनी किस्मत और अपने ईष्टï के भरोसे सफर पर निकलें और उनके बाल-बच्चे उनके सकुशल गंतव्य तक पहुंचने की प्रार्थना करें, जो प्राय: करते भी हैैं।*** जनता की माँग और आन्दोलनों का अपना इतिहास....श्योपुर-ग्वालियर रेलखण्ड पर आजादी के पूर्व रियासत काल से संचालित नेरो-गैज टे्रन को जनता की मांग और तीव्रगामी समय की आवश्यकताओं के अनुरूप ब्रॉड गेज में बदले जाने की मांग का अपना एक अलग इतिहास रहा हैै। इस रेल-पथ के आमान परिवर्तन की मांग को लेकर जहां कई बार सियासी दलों के बैनर तले आन्दोलन तक छेड़े जा चुके हैैं वहीं जिले के विकास से जुड़ी इस मांग को लेकर अनेकों प्रतिनिधिमण्डल अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की अगुवाई में रेल मंत्रालय तक जा चुके हैैं जो आश्वासन पाकर लौटने के बाद मुंगेरीलाल के हसीन सपने बरसों तक जनता को दिखाते भी रहे हैं और चुनावी माहौल में वोटों के तौर पर भुनाते भी रहे हैं लेकिन मुद्दा बीरबल की उस खिचड़ी जैसा बना हुआ है जो पकने को तैयार ही नहीं है। गौरतलब है कि अंचल के विकास का दावा करते हुए कभी जनता के भगवान बनने तो कभी जनता को भगवान बताने वाले राजनेताओं ने भी आम जनमानस से जुड़ी इस मांग की मंद आंच पर अपने-अपने स्वार्थों की रोटियां सेंकने का काम आश्वासनों के बलबूते लगातार किया है तथापि आम जनता का यह सपना आज भी महज सपना बना हुआ हैै। हालांकि इस रेल पथ के सर्वेक्षण का काम पूरा होने तथा आमान परिवर्तन की कार्रवाही का घोड़ा अस्तबल से बाहर निकलने का दावा कई बार समाचारों की सुर्खियों के रूप में सामने आ चुका है किन्तु प्रति वर्ष पेश किये जाने वाले रेल-बजट में इससे जुड़े किसी भी प्रावधान का अभाव जनमानस की उम्मीदों को धूमिल करने का कारनामा अंजाम देता आ रहा हैै।*** घाटा बताकर सुविधा छीने जाने तक की कोशिशें....श्योपुर जिला मुख्यालय से इस टे्रन के कारण जुड़े तमाम गांवों के लोगों को आवागमन के पर्याप्त साधन मुहैया कराने की दिशा में भले ही कोई प्रयास कभी नहीं हो पाये हों किन्तु उनकी आवा-जाही सुलभ बनाने वाली इस गाड़ी का संचालन बन्द करने की दिशा में कुत्सित प्रयास लगातार किये जाते रहे हंै जो अब कहीं जाकर मंद पड़े हैंं। हास्यास्पद बात यह है कि जिस गाड़ी में बोगियों के अन्दर से लेकर छतों के ऊपर तक तिल रखने तक की जगह का अभाव प्रतिदिन नजर आता हो तथा जिसके आरम्भिक रेलवे स्टेशन पर टिकट हासिल करने के लिए यात्रियों की कतारें टे्रन की रवानगी से घण्टे दो घण्टे पहले लगनी शुरू हो जाती हों, उसे घाटे में बताकर टे्रन का संचालन बंद किये जाने तक का संकेत कई बार दिया जा चुका हैै जो जन-विरोध के बाद येन-केन-प्रकारेण वापस भी लिया जाता रहा है। बेशुमार यात्रियों को अपने में समेटकर चलने वाली इस टे्रन के संचालन में घाटे की स्थिति का मूल कारण स्टाफ की उदासीनता है या फिर यात्रियों की मनमानी, यह अलग से शोध का विषय हो सकता हैै तथापि यह कहने से परहेज नहीं किया जा सकता कि घाटे जैसे कोई हालात इस रेल-पथ पर ना कभी रहे हैं और ना ही रहने हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की हैै कि इस पथ पर चलने वाली टे्रनों में टिकटधारक यात्रियों का परीक्षण नियमित किया जाये जो कुछ समय से किया जाने लगा है तथा अच्छे नतीजे भी सामने ला रहा है।*** आंकड़े खुद बताते हैैं सच्चाई की दास्तान....प्रतिदिन भोर की पहली किरण के साथ श्योपुर और ग्वालियर से विपरीत दिशाओं में सात या आठ घण्टे से अधिक के सफर की शुरूआत करने वाली टे्रनों में खचाखच भरी सवारियों और इंजन तक पर लदे हुऐ सामान को देखने के साथ-साथ यदि विभिन्न स्टेशनों से बेचे जाने वाले टिकटों और अर्जित की जाने वाली राशि के आंकड़ों पर नजर डाली जाये तो यह सहज ही पता लगाया जा सकता है कि इस पथ पर टे्रन का संचालन हर हालत में मुनाफे  की गारण्टी देता है। बावजूद इसके यदि रेलवे परिमण्डल नुकसान की बात करता हैै तो फिर इस सच का खुलासा होना जरूरी हैै कि श्योपुर से ग्वालियर तक आने-जाने वाली इस पथ की गाडिय़ों में बिना टिकट यात्रा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा कौन दे रहा हैै। उल्लेखनीय है कि इस पथ पर जहां कम दूरी के स्टेशनों के बीच अक्सर बेटिकट यात्रा करने वाले यात्रियों की समस्या प्राय: सामने आती है वहीं ऐसे यात्रियों की तादाद भी कम नहीं हैै जो किराया तो देते हैैं किन्तु टिकट नहीं ले पाते। ऐसे में किराये के नाम पर ली जाने वाली राशि बीच में ही खुर्द-बुर्द हो जाती है तो यह भी जरूर बताया जाना चाहिये कि इसके लिये जिम्मेदार आखिर कौन है? जहां तक जोखिमपूर्ण सफर का सवाल है टे्रन पर यात्रियों की अनियंत्रित चढ़ाई से चिन्तित कर्मचारियों का कहना है कि इस तरह के दृश्यों पर रोक लगाये जाने के लिये कार्यवाही स्टेशन क्षेत्र मेें समय-समय पर की जाती है तथापि चलती गाड़ी पर सवार होने वाले यात्रियों पर रोक लगाया जाना संभव नहीं है। जहां तक यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं व टिकटों की बिक्री का सवाल है प्रत्येक गाड़ी में 40 सीटों वाली सात से आठ बोगियां लगाई जाती हैं तथा टिकटों की बिक्री निर्धारित यात्री संख्या की तुलना में दो से तीन गुना जबकि यात्रियों की संख्या चार से छह गुना तक अधिक होती है जो सीजन में और भी बढ़ जाया करती है। *** रेल पथ पर संचालित टे्रन.......श्योपुर से ग्वालियर के बीच नेरो गैज की टे्रन प्रति चक्कर कुल 200 कि.मी. की दूरी तय करती है। इस मार्ग पर कुल चार टे्रनों का संचालन आवा-जाही के लिऐ अप एण्ड डाउन के रूप में होता है। श्योपुर से ग्वालियर की ओर जाने वाली इकलौती टे्रन प्रात: 06.10 बजे रवाना होती है वहीं इसी समय पर ग्वालियर से चलने वाली टे्रन श्योपुर की ओर कूच करती है जो सामान्य परिस्थितियों में अपराह्रï 04.25 बजे श्योपुर पहुंचती है। उक्त दोनों टे्रनों के अलावा श्योपुर से सबलगढ़ के बीच दो टे्रनें परस्पर विपरीत दिशा में प्रस्थान करती हैं। श्योपुर से सबलगढ़ की ओर जाने वाली टे्रन के स्टेशन से रवाना होने का समय दोपहर 02.25 बजे नियत है। इन सभी टे्रनों में यात्रियों और उनके सामानों की मौजूदगी इंजन से लेकर बोगियों के अंदर, पायदान पर और छतों तक पर देखी जा सकती है जो टे्रन और सवारियों के बीच के गहरे रिश्ते को प्रमाणित करती है। श्योपुर-ग्वालियर रेल-खण्ड के प्रमुख स्टेशनों में श्योपुर सहित गिरधरपुर, खोजीपुरा, इकडोरी, वीरपुर, सबलगढ़, कैलारस, जौरा अलापुर, सुमावली, बामोर गांव, मोतीझील, घोसीपुरा, ग्वालियर शामिल हैं वहीं दांतरदा, दुर्गापुरी, सिरोनी, टर्रा कलां, सिल्लीपुर, कैैमारा कलां, विजयपुर रोड, रामपहाड़ी, पीपल वाली चौकी, सैमई, भटपुरा, सिकरोदा, थरा, अम्बिकेश्वर तथा मिलावली को हॉल्ट स्टेशन का दर्जा मिला हुआ है। शुरूआती ओर आखिरी स्टेशनों को छोड़कर शेष सभी स्टेशनों के निवासियों की मुसीबत यह है कि उनके क्षेत्र में आवागमन के साधनों का टोटा अभी भी कायम है लिहाजा यह टे्रन ही उनकी उम्मीदों का केेन्द्र है।

😊 #जानिए_मुझे (बतौर मित्र #दिलचस्पी हो तो। अन्यथा उपेक्षा तो आपका अधिकार है ही)"

एक अदना सा फ़क़ीर हूँ और काल के कपाल पर विधाता की खींची लकीर हूँ। हूँ तब तक हूँ बस।       इस धरा-धाम पर आगमन हुआ 13 फरवरी को। ननिहाल जयपुर के रास्ते। उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद से पैतृक रिश्ता रहा कभी। अब प्रयोगवाद के जनक महाकवि गजानन माधव "मुक्तिबोध" की जन्मस्थली श्योपुर (मध्यप्रदेश) का मूल निवासी हूँ। जो शौर्य भूमि के रूप में मान्य चम्बल संभाग का एक जिला है। फिलहाल, दो साल के लिए काले पानी की सज़ा भुगतने ग्वालियर नगरी के प्रवास पर था। वक़्त के थपेड़ों की मार से बाबा महाकाल को शरण में हूँ। ल घर-वापसी मई-2020 तक संभावित मान कर। मृत्युलोक में पदार्पण की दास्तान को कुछ यूं समझें। याद रहेगा।■ दूसरे भारत-पाक युद्ध के 3 साल बाद और तीसरे भारत-पाक युद्ध से 3 साल पहले हुई पैदाइश। वो भी कथित प्रणय दिवस (वेलेंटाइन डे) से एक दिन पूर्व ब्रह्म-मुहूर्त के उपरांत सूर्योदय वेला में। मामा ने नामकरण कर दिया "प्रभात।"कायस्थ कुल में जन्म हुआ तो लेखनी की साधना करनी ही थी। साढ़े तीन दशक से शब्द-साधना ही चल रही है। वाणिज्य और हिंदी साहित्य सहित पत्रकारिता और जनसंचार का छात्र रहा। अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, अपराध शास्त्र सहित उपन्यासों में रुचि रही। अन्वेषण अउर विश्लेषण का शौक़ भी। यायावर के तौर पर रेल यात्रा और छायांकन मेरी खास पसन्द है। मंच संचालन सहित हिंदी, उर्दू के मंचों पर काव्यपाठ करता रहा हूँ। किसी मठाधीश का गुर्गा या गैंग का सदस्य बन पाता तो पांचों उंगलियां घी में होतीं। हो सकता था कि सर भी कढाई में होता। चापलूसी का हुनर नहीं था तो बिना शह के मात होनी ही थी। हुई भी ऊपर वाले की कृपा से। आडम्बरमुक्त आस्थावादी जो हूँ।■ सामान्यतः वो ही हूँ जो हूँ। वैसा ही हूँ जैसा दिखता हूँ। जो महसूस करता हूँ वही लिख डालता हूँ। यूं तो एक संवेदनशील सृजनधर्मी ही हूँ। मगर मुझ में छिपा एक स्वाभाविक व्यंग्यकार और जन्मजात विद्रोही अक़्सर मुखरित हो उठता है। कभी विद्रोह की चिंगारी भी जागती है। जिसे शांत करने का काम लेखनी से कर लेता हूँ।■ सतत सृजन का उद्देश्य अपने उद्वेग से पार पाना भर है। किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की भावनाओं को आहत करना कतई पसंद नहीं। दोस्तों का दोस्त रहा हूँ। अब थोड़ा ऊबने लगा हूँ। व्यवहार निभाने में अव्वल रहा लिहाज ठगा भी खूब गया। खून के रिश्तों पर नहीं दिल के नातों पर भरोसा रहा है बस। इसके लिए खुद रिश्ते ही ज़िम्मेदार हैं। पार्ट टाइम रिश्ते या सम्बन्ध कोई महत्व नहीं रखते मेरे लिए। मैं पूर्णकालिक सम्बन्धों का पक्षधर हूँ। सुप्त ज्वालामुखी मानते हैं कुछ करीबी। मेरा मानना है कि थोड़ा गुस्सा ज़रूरी है। जो शीघ्र निकल जाए और दिमाग मे घर ना करे। खिलवाड़ करता नहीं, सहता भी नहीं। अपेक्षा करता नहीं और उपेक्षा भाती भी नहीं। सिर पर बिठाता हूँ नम्रता के साथ। धृष्टक पर धराशायी करना भी जानता हूँ। जो नज़र से गिर गया वो इस जन्म में तो स्वीकार नहीं। अगले जन्म का मुझे खुद नहीं पता। ग़लत को गलत कहने से खुद को रोक नहीं पाता। तमाम बार खामियाजा भुगतने के बाद भी। थोड़ी बहुत हाज़िर-जवाबी सतत अभ्यास की वजह से है। कुछ अनुभव होना चाहिए बस, व्यक्त करने में देर नहीं लगती। यह माँ वाणी की कृपा है। ■ लेखन और पत्रकारिता से पूर्व शिक्षक रहा। प्रेरक वक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय अब भी हूँ। लगातार हाशिए पर धकेले जाने के बाद भी। चला कर ठंसने और धंसने की आदत नहीं। अपमान और अवमानना से डरता हूँ। लिहाजा बेहद संकोची हूँ। इस्तेमाल होता रहा हूँ। करना कभी सीख नहीं पाया। अब उम्मीद भी नहीं कुछ सीख पाने की। किसी को गिरा कर आगे निकलना न आया, न भाया। बावजूद इसके गर्व है अपने पिछड़े रहने पर। बेक बेंचर था विद्यार्थी जीवन मे। शिक्षा स्कूल, कॉलेज से ज़्यादा दुनिया से पाई। स्वाधीनता पसंद थी इसलिए सरकारी सेवा में नहीं रही रुचि। कोई गॉड-फादर नहीं बनाया। फादर खुद गॉड थे मेरे। उन्ही के आदर्श रहे कि खुद का निर्माण खुद कर सका। सामाजिक, पारिवारिक और सार्वजनिक दायित्व निभा पाया अब तक। इसका समूचा श्रेय जीवन-संगिनी को, जिसने मुझे राष्ट्रीय और सार्वजनिक संपदा स्वीकार कर लिया। बिना किसी शिकवा-शिकायत के। ■ गर्व है भारतीय होने पर। गर्वित हूँ अपनी धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विरासतों पर। संतोषी हूँ और संचय से दूर भी। कर्म और भाग्य पर साझा भरोसा है। आशावादी और आस्थावादी हूँ। लिहाजा ऊपर वाले की रज़ा का मज़ा लेता आया हूँ। हर हाल में खुश होकर जीने में विश्वास है। ज़िंदादिली ग़म में ठहाका लगाने का साहस देती है। औरों की पीड़ा, बेबसी द्रवित करती है। दुनिया का भय नहीं क्योंकि श्री रामचरित मानस से प्रेरित हूँ। पता है कि :-"हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ।"जो करेगा ईश्वर करेगा।वो बुरा करता नहीं। इतना सा पता है। और हां, लल्ली-चप्पो यानि ठकुर-सुहाती नहीं कर पाता। जो आज के युग मे अपने पिछड़ेपन की मूल वजह मान सकता हूँ। जीवन खुली किताब की तरह रखा। कमज़ोरियाँ कभी नहीं छुपाईं। लिहाजा शुभचिंतकों को आसानी से पता चलता रहा कि दुखती रग कौन सी है और चोट कहाँ करना है। किसी की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप पसंद नहीं रहा। अपनी ज़िंदगी मे कथित अपनों के हस्तक्षेप की कोई कमी नहीं। ईश्वर फ़टे में टांग देने वालों को सद्बुद्धि दे। शायद मेरा चौथापन सुधर सके।■ यहाँ ना मिलूं कभी तो गूगल पर सर्च कर लेना बस। कभी भी छोड़ सकता हूँ ये प्लेटफॉर्म। "छोटा सिरचन" जो हूँ रेणु जी का। किशोरावस्था से युवावस्था तक आधा लाख उपन्यास पढ़ने और कथा प्रवचन सुनने का जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा, जो आज तक बरकरार है।बहरहाल,आपकी तमाम इनायतों और नवाज़िशों को सलाम।। अपने मिज़ाज की नुमाइंदगी करती इस कविता के साथ :--"पक्षपात की आस करो मत।चिंतन का उपहास करो मत।।मिथ्या नहीं प्रशंसा होगी।ना झूठी अनुशंसा होगी।।स्वागत, वंदन, मान न होगा।क़द, पद का यशगान न होगा।।ना छेदन विच्छेदन होगा।ना ही प्रणय निवेदन होगा।।ना दावा, ना खंडन होगा।ना ही महिमा मंडन होगा।।पढ़ना चाहो जो मनभाता।हे जगती के भाग्य विधाता!कोई और किताब उठाओ।।मैं जगभाता कब लिखता हूँ?"शब्दों की, भावों की ढेरी।मेरी सोच, क़लम भी मेरी।।रात, दोपहर, सांझ, सवेरे।जड़-चैतन्य सभी हैं मेरे।।शब्दब्रह्म का मैं साधक हूँ।शब्दनाद का आराधक हूँ।।मुझ पर नहीं किसी का पहरा।मनमौजी, यायावर ठहरा।।मैं कब मनुहारों का आदी?बात करूंगा सीधी-सादी।।जो पसंद आते हैं तुझ को।स्वांग सुहाते कब हैं मुझको।।अंदर से ले कर बाहर तक।वैसा हूँ जैसा दिखता हूँ।।"       मैं जगभाता कब लिखता हूँ??"◆ 07 मई 1987 से शुरू हुआ था शायरी का सफर। लगभग 7 हज़ार से अधिक गीत, ग़ज़ल, नज़्म, क़तआत, कविताएं और व्यंग्य आदि हैं। दिल्ली के अंकुर पब्लिकेशंज़ के लिए हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी गज़लों और नज़्मों पर 2 दर्जन से अधिक संकलनों का सम्पादन कर चुका हूँ वर्ष 1985 से 98 तक। जो दुनिया भर में पहुंचे हैं। मंचों से भी वास्ता रहा है। यहीं बहुत क़लाम है शुरुआती दौर का। बस ज़रा गहराई में उतरना पड़ेगा आपको।◆ "संजीदा किस्म की मसखरी" कर लेता हूँ। उससे, जिससे खुल जाऊं थोड़ा सा। सामान्यतः अदब को रिश्तों की नींव मानता हूँ। जिनसे विशेष लगाव होता है उनसे साधिकार झगड़ लेता हूँ। अधिकार के साथ कोई दे तो गाली खाने से भी परहेज़ नहीं। आडम्बर विमुख आस्तिक हूँ और ऊपर वाले को धोखा देने की कोई मंशा नहीं रखता। भक्ति और अंधभक्ति के बड़े अंतर की थोड़ी-बहुत समझ है। पता है कि उसे बाहर क्या तलाशना जो अंदर घुसा बैठा है। भीड़ में धक्के खाने का कोई शौक़ नहीं। थोथा प्रदर्शन और दिखावे का अनुकरण आता तो राजनीति में होता। रफू करने की कला आती है। बखिया उधेड़ने में पीएचडी मान सकते हैं आप। मानना चाहें तो। ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं है कोई। भाषण वाले नहीं कर्म वाले राष्ट्रवाद से प्रेरित हूँ। राजनीति के अखाड़े में लंगोट फहराते किसी भी छोटे-बड़े राजनेता या उसके दल के साथ कोई जायज़-नाजायज़ रिश्ता नहीं। किसी भी विचारधारा से कोई वैमनस्य नहीं। धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग उपवर्ग, रंग, भाषा, क्षेत्र या सीमाओं के आधार पर राग-द्वेष से कोई सरोकार नहीं। सहमति या असहमति का सम्बंध विषय से होता है। जिसमे देशकाल, वातावरण की अहम भूमिका होती है। बहरहाल, अपना काम कर रहा हूँ। दृष्टि-बाधा की स्थिति में भी शब्दबाण चलाने का काम मिला हुआ है। चंद वरदाई जैसे मित्र बनकर लक्ष्य सुझाएंगे तो शर-संधान और लक्ष्ण-बेधन सहज होगा मेरे लिए। दृष्टिकोण स्पष्ट होने के बावजूद दृष्टिबाधा से पीड़ित हूँ। शाब्दिक, मात्रिक त्रुटि संभावित है। आप बता सकते हैं बिना किसी संकोच या भूमिका के।       जय हिंद, वन्दे मातरम। जय राम जी की। जय हनुमान जी की।       #प्रणय_प्रभात  डेरा तम्बू @ यंत्र-तंत्र    (निवासी-श्योपुर)

#प्रसंगवश :- जा की रही भावना जैसी..... (जो #सोचोगे ना, वही #सूझेगा श्रीमान)"

एक हलवाई अपनी दुकान पर रोज़ की तरह जलेबियाँ बनाने में मशगूल था। ग्राहकों को संभालने के लिए पास ही उसके कुछ सहयोगी बैठे थे। जलेबी के थाल के पास ताज़े दही का एक कुंडा रखा था। जिसकी मलाई पर एक कौए की नज़र थी। कौआ झपट्टा मारने वाले अंदाज़ में कुंडे की ओर लपकता था। सतर्क नौकर तुरन्त उसे लाठी फटकार कर उड़ा देते थे। यह सिलसिला देर तक चलता रहा। नौकर कौए की ढीठता से परेशान हो चुके थे। अब एक नौकर लाठी लेकर तैयार था। इंतज़ार कौए के पास आने का था। इस बार चाल कामयाब रही। पास आया कौआ लाठी की जद में आ गया और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। इस घटना के तमाम गवाहों में एक कवि भी था। जो इस घटना से काफ़ी आहत हुआ। उसने भट्टी के पास पड़ा एक कोयला उठाया और दीवार पर एक पंक्ति लिख दी। जो कुछ इस तरह थी-#काग_दही_पर_प्राण_गँवायो। अर्थात कौए ने दही के लिए प्राण गंवा दिए। कवि के वहां से जाने के बाद एक सरकारी बाबू दुकान पर आया। जो स्तकारी कागज़ों की हेराफेरी के मामले में निलंबित चल रहा था। उसकी नज़र दीवार पर लिखी पंक्ति पर गई। उसने कूच करते हुए पंक्ति को यूं पढ़ा-      #कागद_ही_पर_प्राण_गँवायो। अर्थात कागज़ के चक्कर में मारा गया। कुछ देर बाद दुकान पर एक मनचला युवक आया। जिसकी कुछ ही समय पहले एक युवती के बाप और भाइयों ने जमकर कुटाई की थी। संयोग से कुटे-पिटे युवक का ध्यान भी पंक्ति पर गया। उसने पंक्ति को अपने हिसाब से कुछ ऐसे पढ़ा-      #का_गदही_पर_प्राण_गँवायो।अर्थात क्यों गधी (गधैया) के चक्कर मे पिटा।कुल मिला कर सारा खेल आपके नज़रिए का है। आपको जो कुछ दिखता या सूझता है। उस पर आपके हालात और मनोभावों का असर होता है।।                  प्रस्तुति- #प्रणय_प्रभात

😊 यादों का झरोखा :- #पहली बारात के हम बाराती (बहुत कुछ पहली बार / यादगार अनुभव)

बात 1985 की है, जब मैं पहली बार खुद के बूते किसी बारात का हिस्सा बना। परिजनों के बिना किसी बारात में जाने का पहला मौका था। लिहाजा उसे भुला पाना संभव ही नहीं। बारात थी नगरी के अभिभाषक श्री महेंद्र जी जैन की। जो उस दौर के प्रसिद्ध संस्थान ओसवाल भोजनालय के संचालक श्री अरुण जी ओसवाल के लघु भ्राता हैं। संयोगवश मैं उनके अनुज श्री गजेंद्र जी जैन का पुराना छात्र और बीकॉम द्वितीय वर्ष का विद्यार्थी था। अपने बाल सखा, पड़ोसी और सहपाठी रमेश गुप्ता (नागदा वाले) के साथ। हालांकि मेरा बचपन ओसवाल परिवार के पड़ोस में ही स्थित श्री मोतीलाल जी सुनार के बाड़े में बीता था। परिवार के साथ सम्बन्ध पारिवारिक भी थे। किंतु बारात का आमंत्रण श्री गजेंद्र भाई साहब के चेलों के तौर पर मिला था। यात्रा श्योपुर से इंदौर की थी। तब इंदौर का केवल नाम भर सुना था। खटारा वाहनों के दौर में लग्जरी बस में सवारी का पहला मौका मिलने जा रहा था। एबी रोड जैसे राजमार्ग पर यात्रा की कल्पना बेहद रोमांचक थी। उससे पहले कोटा, जयपुर, शिवपुरी और ग्वालियर की ही यात्राएं की थीं। संयोग से सभी रास्ते तब ऊबड़-खाबड़ हुआ करते थे। बहरहाल, बारात में जाने का उत्साह सातवें आसमान पर था। बाज़ार से एक एयरबैग लाया गया। दो जोड़ी नए कपड़े, जूते-मौजे भी। चार्ली का इंटीमेट स्प्रे और हैलो का शेम्पू ही उन दिनों सहज उपलब्ध था। वो भी पवन फैंसी स्टोर पर। जहां उधारी की सुविधा थी। संयोग से मामला माह के पहले हफ़्ते का था। पापा ने 100 रुपए मांगने पर 150 पकड़ाए। कड़कड़ाते हुए दो नोट 50-50 के। दो 20-20 के और एक 10 का। हिदायत वही कि बच जाए तो लौटा देना। ये और बात है कि लौट कर घर आने तक 140 रुपए जेब में थे। जो ना मांगे गए और ना ही लौटाए गए। बहरहाल, तैयारी पूरी थी और बेसब्री से इंतज़ार था रवानगी का।      आख़िरकार 07 फरवरी का वो सुखद दिन आ ही गया। बस श्री रामतलाई हनुमान मंदिर के पास लग चुकी थी। सामान हाथ ठेलों पर लद कर वहां पहुंच चुका था। उन दिनों श्योपुर एक कस्बा ही था। जहां हाथ ठेला इकलौता पब्लिक ट्रांसपोर्ट होता था। सारा सामान सेट कराने से पहले हम दोनों मित्रों ने कन्डक्टर सीट के पीछे वाली डबल सीट कब्ज़े में कर ली थी। यात्रा को आरामदायक व यादगार बनाने की मंशा से। एक आशंका सीट से हटाकर पीछे भेजे जाने की भी थी। लिहाजा एक डबल सीट अलग से रोकी जा चुकी थी। ज़ोरदार उल्लास के बीच श्योपुर से बस रवाना हुई। बस का पहला पड़ाव शिवपुरी था। सभी के रात्रि भोजन की व्यवस्था टू स्टार पुलिस अधिकारी श्री योगेश गुप्ता जी के आवास पर थी। जो अरुण भाई साहब के मित्र थे और शिवपुरी में पदस्थ। आत्मीय माहौल में किसी पुलिस अधिकारी के घर भोजन तब गर्व का आभास कराने वाला था। भोजन के बाद बस ने इंदौर के लिए कूच किया। कुछ ही देर बाद बस की उछलकूद बन्द हो गई। पता चला कि हाई-वे आ गया है। हाई-वे की यात्रा के अनुभव की बात थी। नींद का नामो"-निशान तक आंखों में नहीं था। गुना में चाय-पानी के बाद आगे की यात्रा शुरू हुई। अब नींद के झोंके सोने पर मजबूर कर रहे थे। पता नहीं कब गुदगुदी सीट पर आंख लग गई। अलसुबह शोरगुल से नींद टूटी तो पता चला कि बस मक्सी के बस स्टैंड पर खड़ी थी। हम आनन-फानन में नीचे उतरे। प्राथमिकता में था राजमार्ग का साक्षात दर्शन, जो बस में बैठकर रात के अंधेरे में नहीं हो पाया था। दोहरी चौड़ी और चमक बिखेरती काली सड़क ने मंत्रमुग्ध किया। हाई-वे के शानदार ढाबे का दीदार भी पहली बार हुआ था। चाय-नाश्ते से फारिग होने के बाद सब फिर से बस में सवार हो चुके थे। वर देवता के परम मित्र श्री नारायण दास गर्ग और श्री रमाकांत चतुर्वेदी सभी के बीच आकर्षण का प्रमुख केंद्र थे। उनकी हंसी-ठिठोली और हाज़िर-जवाबी माहौल को सरस् व रोचक बनाए हुए थी। आख़िरी पड़ाव इंदौर ही था। खिड़की से इस महानगर की झलक मन लुभा रही थी। अंततः बस एक विशाल भवन के बाहर रुकी। जो रामबाग क्षेत्र की दादाबाड़ी के बड़े से परिसर में था। सभी बारातियों का सामान सम्मान के साथ उतारा गया। तब व्हीआईपी जैसा शव्द बहुत प्रचलित नहीं था, मगर आभास लगभग वैसा ही था। फरवरी के गुलाबी मौसम में स्नान के लिए गर्म पानी अलग से उपलब्ध था। वधु पक्ष की संपन्नता और प्रभाव की झलक व्यवस्थाओं से मिल रही थी। बावजूद इसके घरातियों का मृदु और विनम्र व्यवहार आनन्द की अनुभूति करा रहा था। घरातियों की ओर से एक रोचक शर्त स्वल्पाहार के समय आई। शर्त समोसे को लेकर थी। बताना यह था कि उनमें भरा क्या गया है? सब "आलू" पर एक-राय थे। सबका जवाब ग़लत निकला। दरअसल समोसे कच्चे केले से निर्मित थे। तब पहली बार जाना कि जैन मत में "आलू" का सेवन अधिकांश लोग नहीं करते। इसके बाद दिन का भोजन विशुद्ध मालवी ज़ायका लिए हुए था। तब जानने को मिला कि हमारे क्षेत्र में प्रचलित "बाटी" के गौत्र का एक व्यंजन "बाफला" भी होता है। शाम के भोजन के साथ बारात, विवाह आदि की रस्म भव्य और स्मरणीय रही। कुल मिलाकर बहुत कुछ पहली बार जानने को मिला। बहुत से अनुभव प्रथम बार हुए। आयु-भेद जैसा कोई बंधन 09 फरवरी को श्योपुर वापसी तक नहीं दिखा। लिहाजा पूरा लुत्फ़ निर्बाध बना रहा। इसके बाद साढ़े तीन दशक के सार्वजनिक जीवन में तमाम बारातों में शरीक़ होने का अवसर मिला। सैकड़ों समारोहों में भागीदारी जीवन का हिस्सा रही। लेकिन जो बात श्योपुर से इंदौर की इस यात्रा में थी, वो दोबारा कभी महसूस नहीं हुई। मज़ेदार बात यह है कि 1985 मेंअरुण भाई साहब के सामने जाने का साहस नहीं होता था। वजह उम्र के बीच का अच्छा-खासा अंतर था। कालांतर में हम पत्रकारिता के क्ष्रेत्र में सक्रिय होने की वजह से कर्मक्षेत्र के परम मित्र हो गए। यह अलग बात है कि है कि हास-परिहास के बावजूद सम्मान व नेह का भाव आज भी बना हुआ है। हायर सेकेंडरी से बीकॉम तक गुरु (ट्यूटर) रहे श्री गजेंद्र भाई साहब से बाद में सम्बंध गुरु-शिष्य परम्परा से इतर मित्रवत हुए। आदर का भाव सदैव विद्यमान रहा। आज भी है। इससे भी ज़्यादा रोचक बात यह है कि जिनकी बारात में गए थे उनके सुपुत्र युवा भाजपा नेता व कर सलाहकार नकुल जैन अगली पीढ़ी के होने के बाद भी हमारी मित्रमंडली का हिस्सा हैं। अब आप खुद समझ लीजिए कि हमारी सार्वभौमिकता व सर्वकलिकता कितनी रही होगी।।                                      #प्रणय_प्रभात                       😍😍😊😊😊😍😍(मामला 35 साल पहले का है। भूल-चूक हो सकती है। संशोधन किया जा सकता है)#Sheopur_Indore

अतीत का दर्शन / यादों की खिड़की से :-#शौक़_शौक़_में_उपज_गया_एक_प्रतिष्ठान #प्रभात_पुस्तकाल_श्योपुर_की_पहली_प्रायवेट_लाइब्रेरी, जिसने मुझे पठन-पाठन से जोड़ कर लेखन तक पहुंचाया)

कल सन 1985 का एक संस्मरण आप सभी ने पसंद किया। उसी सराहना की देन है कि आज अतीत का एक और पृष्ठ उलटने का मन किया। तमाम विषय किशोरावस्था के साथी रहे पत्रकार मित्र अश्विनी उर्फ़ संतोष बालोठिया ने सवेरे-सवेरे अपनी प्रतिक्रिया में सुझा ही दिए। उन्हीं में से एक याद को साझा करता हूँ आपके साथ। बात 45 साल पुरानी यानि 1975 की है। तब मेरे परिवार को किराए के दो कमरों और एक बारामदे से निजि घर में आए चंद माह ही बीते थे। तब मेरी उम्र थी कुल 7 साल। मेरे "पापा" (यही कहता था इसलिए पिताजी या पिताश्री लिखने का कोई अर्थ नही) वन विभाग में एलडीसी (निम्न श्रेणी लिपिक) थे। पत्रिकाएं और हर तरह के उपन्यास पढ़ने का उन्हें बेहद शौक़ था। तन्ख्वाह कम थी, दायित्व बहुत ज़्यादा, मगर शौक़ के साथ कोई समझौता नहीं। पापा उन दिनों नियत अंतराल से प्रकाशित कुछ पत्रिकाएं खरीद कर लाया करते थे। इन पत्रिकाओं में रविवार, दिनमान, साप्ताहिक हिन्दुस्ताम, धर्मयुग, कादम्बिनी के अलावा मेरे लिए चंदा मामा, नंदन, चंपक व गोलगप्पे शामिल थीं। नवनीत और सर्वोत्तम रीडर्स डायजेस्ट हर महीने डाक से आया करती थीं। पापा की तरह मैं भी बहुत धुनी था। एक बार में एक पत्रिका पूरी चाट जाने की गति मेरी भी थी। नतीजा यह निकला कि छोटी उम्र में बाल पत्रिकाओं के साथ सामयिक पत्र पत्रिकाओं में रुझान बढ़ गया। संकट पापा के सामने भी ऐसा ही था। पत्रिकाएं मुश्किल से हफ़्ते भर में निपट जाती थीं। अख़बार तब बहुत प्रचलित व उपलब्ध थे नहीं। इसी पशोपेश में पापा को एक युक्ति सूझी। अब उन्होंने अपना ध्यान मोटे-मोटे उपन्यासों की ओर केंद्रित किया। वो शाम को दफ़्तर से वापसी के बाद देर रात तक उपन्यास पढ़ते। दिन में उपन्यास मेरे हाथ लगता। आलम यह था कि खाने-पीने की सुध नहीं। अम्मा (दादी) या बड़ी बुआ एक-एक निवाला मुँह में डालतीं और मेरी आँखें उपन्यास में गढ़ी रहतीं। साल भर में यह अहसास पापा को हो गया कि अल्प वेतन में यह शौक़ पूरा कर पाना दिक़्क़त का सबब बनता जा रहा है। घर में इकट्ठे हुए सौ से ज़्यादा उपन्यास अब तक कई-कई बार पढ़े जा चुके थे। उन्हीं की ढेरी को देखकर पापा को ख़याल आया एक पुस्तकालय शुरू करने का। अपना शौक़ पूरा करना एक मक़सद था। दूसरा मक़सद अपने जैसे उन तमाम लोगों की सेवा था, जो खरीद कर उपन्यास नहीं पढ़ सकते थे। मनोरंजन के दूसरे कोई साधन तब थे नहीं। कस्बे के दो पुस्तक भंडार प्रतिदिन के हिसाब से किराया वसूलते थे। जो पाठकों को मंहगा पड़ता था। कई बार उपन्यास का किराया उसकी क़ीमत से ज़्यादा हो जाता था। ऐसे में पुस्तकालय की परिकल्पना सच में बेहद महत्वपूर्ण थी। एक शाम पापा दफ़्तर से लौटे तो उनके हाथ मे लकड़ी की एक तख़्ती थी। उस पर सुंदर अक्षरों में-#प्रभात_पुस्तकालय लिखा हुआ था। घर की बैठक के दरवाजे पर तख़्ती ठोक दी गई। देर रात तक बैठक की आलमारियों से लेकर टांड तक सारे उपन्यास सलीके से सजा दिए गए। तय किया गया कि पाठकों से कुल 2 रुपए प्रति माह लिए जाएंगे। जो राशि महीने भर में जमा होगी, उतनी ही जेब से मिलाई जाएगी। यही राशि नए उपन्यास खरीदने के काम आएगी। छोटी सी नगरी में यह पहल बिना प्रचार-प्रसार के रंगत पा गई। पापा के कुछ सहकर्मी लायब्रेरी के सदस्य बने। बात उनके परिचितों तक पहुंची तो सदस्यों की संख्या और बढ़ने लगी। शुरुआती  माह में एक सैकड़ा के आसपास सदस्य बन चुके थे। अमानत राशि (डिपॉज़िट) के तौर पर अधिकतम 5 (न्यूनतम 3) रुपए अग्रिम जमा कराने का प्रावधान था। सदस्य यह राशि सहर्ष जमा करा रहे थे। सोच फलीभूत हो रही थी। विभागीय काम से ग्वालियर गए पापा #नॉवेल्टी_बुक_सेंटर से अनुबंध कर आए। वहां से नए उपन्यास व्हीपीपी के जरिए डाक से आते। पैकेट को खोलना और साथ आई सूची देखना बेहद रोचक होता था। हरेक किताब पर खाकी रंग का चिकना व मज़बूत कवर चढ़ाना हमारा ही काम था। किताबों की पंजी में नाम लिखना, किताब पर नम्बर डालना और सील (मुहर) लगाना भी। इन कामों में मुझसे चार साल छोटा भाई "अन्नू" भी अब होशियार हो चुका था। बाद में तीसरे नम्बर के भाई "पिन्नू" सहित दिन भर साथ रहने वाले कुछ सखाओं ने भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया। उपन्यासों की संख्या सदस्यों की तरह तेज़ी से बढ़ रही थी। लिहाजा दीवारों से सटे लकड़ी के रैक बनवाए गए। छह माह में बैठक की दीवारें कम पड़ गई। किताबों की व्हीपीपी अब सीधे दिल्ली से आने लगी थीं। सभी नामी और चर्चित प्रकाशनों से हम सीधे संपर्क में थे। डाक से प्रकाशित उपन्यासों की सूचियां आती थीं। हम पसंद के उपन्यासों पर टिक लगाकर फिर प्रकाशन को भेजते। वही किताबें व्हीपीपी से कुछ रोज़ में आ जाती थीं। जिन्हें पढ़ने का उत्साह सभी सदस्यों की तरह हम भाइयों और पापा में भी रहता था। अगले कुछ सालों में हमारी छोटी सी लायब्रेरी बाज़ू वाले कमरे के रास्ते अंदर वाले तीसरें कमरे तक पहुंच गई। सुबह-शाम सदस्य आते और हम उन्हें पंजी (रजिस्टर) थमा देते। वो पन्ने पलटते हुए उपन्यास का नम्बर बोलते। हम तुरन्त निकाल कर उन्हें थमा देते। वाकई बहुत रुचिकर और मज़ेदार था यह काम। लगभग एक दशक से अधिक समय तक चले इस पुस्तकालय ने हज़ारों उपन्यास पढ़ने व औरों को पढ़ाने की राह आसान बनाई। शायद ही कोई उपन्यासकार होगा, जिसकी किताब लायब्रेरी में न रही हो। सामाजिक, जासूसी और थ्रिलर उपन्यास।  क्रमश: 21 और 24 खण्डों वाले चंद्रकांता संतति व भूतनाथ (बाबू देवकीनंदन खत्री) से लेकर सत्यार्थ प्रकाश (महृषि दयानन्द सरस्वती) तक। मशहूर लेखक जेम्स हेडली चैइस से लेकर वेदप्रकाश शर्मा और गुलशन नंदा से लेकर रानू व सरला रानू तक। आचार्य चतुरसेन शास्त्री, अमृत लाल नागर, वृंदावन लाल वर्मा, रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, मुंशी प्रेमचंद, रामकुमार वर्मा 'भ्रमर", अमृता प्रीतम, शिवानी, नरेंद्र कोहली, भीष्म साहनी, धर्मवीर भारती जैसे लेखको के बहुचर्चित उपन्यास भी हमारे इस नायाब संग्रह की शान थे। इनके अलावा शौक़त हुसैन थानवी, इब्ने सफ़ी बीए, कर्नल रंजीत, आदिल रशीद, ओमप्रकाश शर्मा, ओमप्रकाश कम्बोज, समीर, चंदन, लोकदर्शी, प्रियदर्शी, भारत, ऋतुराज जैसे कई लोकप्रिय लेखकों, के नाम आज भी ज़हन में हैं। यही नहीं सैकड़ों उपन्यासों के कथानक और पात्र भी। आधा लाख के आसपास पढ़े गए इन उपन्यासों ने शब्दकोष को बढाने का काम तो किया ही, दिमाग़ पर धार भी ख़ूब हुई। लायब्रेरी में मौजूद राधेश्याम रामायण और मटरूलाल अत्तार कृत आल्हा-ऊदल के सभी खण्ड काव्य शैली जागृत करने वाले रहे। जिन्होंने उस छोटी सी उम्र में मात्रिकता, गेयता व लयात्मकता से अवगत कराया। आज बिना किसी संकोच कह सकता हूँ कि पढ़ने के शौक ने लेखन तक पहुंचाया। आज जितना सा भी टूटा-फूटा लिख पा रहा हूँ, इन्ही उपन्यासों और लेखकों की देन है। लेखन के अतिरिक्त तर्क-वितर्क, अन्वेषण, विश्लेषण जैसी कुछ खूबियां भी उसी दौर की देन है। स्मृतियों के झरोखे में बैठ कर इस लायब्रेरी के आधार कुछ सदस्य पाठकों के नामों का उल्लेख न करूं तो धृष्टता होगी। इनमें पहला नाम श्री अकोलकर साहब का है जो कचहरी के सामने विट्ठल मंदिर में अकेले रहते थे। दूसरा नाम शासकीय कन्या शाला की शिक्षिका श्रीमती शालिनी कांटे का है। जिनकी बेटी अंजली बाद में मेरी सहपाठी भी रही। इसी शाला की श्रीमती प्रभा टोकेकर, श्रीमती तारे मैडम, प्राथमिक कन्या शाला की शिक्षिका श्रीमती लीला शर्मा, हम तीनों भाइयों के शिक्षक व मार्गदर्शक रहे श्री विट्ठल राव जी आचार्य, महाराष्ट्र समाज के वरिष्ठ सदस्य श्री जीएम टिकेकर, इसी परिवार की सौ. करुणा टिकेकर, श्री श्याम मोहन पंड्या और घर के सामने रहने वाले श्री बाबूलाल जी शर्मा व अन्नपूर्णा बुआजी, ज़िला अस्पताल में लेब टेक्नीशियन रहे श्री केएम कुरैशी आदि के नाम अच्छे व नियमित सदस्यों में रहे। दो नाम विशेष रूप से याद हैं। इनमें एक श्री गोकुल प्रसाद सिंह कुशवाह नामक बुजुर्ग थे। कभी सेना में रहे मृदुभाषी श्री कुशवाह मुझ छोटे बालक को भी "प्रभात जी" कह कर संबोधित करते थे। महीना पूरा होते ही 2 रुपए का नोट थमाने वाले नुज़ुर्ग सदस्य पापूजी मोहल्ले में कहीं रहते थे। स्मृति में है वो दिन, जब उन्हें चुस्की ( रंगीन पानी की आइसक्रीम) का डिब्बा लिए सब्ज़ी मंडी में घूमते देखा। उनसे सदस्यता शुल्क लेना अब अपराध-बोध का विषय बन गया था मेरे लिए। तमाम बार मना किया किंतु वे नहीं माने। आग्रहपूर्वक पैसे हाथ में थमाते रहे। अरसे तक सदस्य रहे यह आदर्श बुजुर्ग बाद में बीमार हुए और इस दुनिया को अलविदा कह गए। ईमानदारी यह थी कि इससे पहले वे 2 रुपए और आखिरी उपन्यास लौटा चुके थे। उस दिन वे बेहद थके हुए नज़र आ रहे थे। उखड़ी साँसें अधिक बोलने की इजाज़त नहीं दे रही थीं। इतना ही बोल पाए कि अब किताब वो तबीयत ठीक होने के बाद ही लेने आएंगे। काश, वे आ पाते और आते रहते अरसे तक। अपने बाबा (दादा) की झलक देखने लगा था मैं उनमें। असली बाबा तो मुझे देखने से पहले ही स्वर्ग सिधार चुके थे। स्मृति में रची-बसी उन कृशकाय बुज़ुर्गवार की बेहद शालीन छवि आज भी आंखें भिगो देती हैं।  अब ये बात सच लगती है कि अच्छे इंसान याद रह जाते हैं।उन्हें याद किया नहीं जाता। एक सज्जन का नाम उदय कुमार हुआ करता था। घनी काली दाढ़ी-मूंछ और बेहद शानदार व्यक्तित्व। वे शायद न्यायालय में पदस्थ थे और पुरानी कचहरी के सामने वाली गली में स्थित श्री सुभाष बूँदीवाले के घर मे भूतल पर किराए से रहा करते थे। परिवार से आत्मीयता बढ़ी तो हमें भोजन पर बुला लिया एक दिन। जबकि वो ख़ुद अकेले हुआ करते थे तब। कृतित्व और व्यक्तित्व की अच्छाई से जुड़े ये दो उदाहरण बताते हैं कि आपके पास एक भी हो तो बहुत है। हमारे ही मोहल्ले में रायपुरा वाले पटवारी जी के मकान में किराए से रहने वाले श्री जेपी गुप्ता भी एक अच्छे इंसान व सदस्य के तौर पर स्मृति में हैं। जो शायद लोक निर्माण विभाग अथवा जल संसाधन विभाग में सेवारत थे। उनकी दो बेटियां पप्पी-बबली मेरी मम्मी की छात्राएं हुआ करती थीं।यह थी शौक़ के संस्थान में बदलने की एक रोचक व प्रेरक कथा। जिसने जीवन को एक दिशा दी। दिशा सही थी या ग़लत, यह अलग से सोचने का विषय है। वो भी अलग-अलग आयामों से। आज ना पापा हैं और ना उनका पुस्तकालय। वक़्त की दीमक सब चाट चुकी है। स्मृति अक्षुण्ण है जिसे अपने पापा के प्रति मेरी कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धांजलि कह सकते हैं आप। इति...💐                      #प्रणय_प्रभात(प्राप्त प्रतिक्रियाओं से मिलने वाली कुछ बातें और जोड़ी जा सकती हैं) पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए अग्रिम आभार।।r