अगर सिरमौर बनो तो भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में लगे मोर-पंख की तरह बनो, जिसका स्थान कोई और कभी नहीं ले सकता। किसी दूल्हे के सेहरे में लगी उस मौर की तरह नहीं, जिसे विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद जलधाराओं में प्रवाहित कर दिया जाता है। तात्पर्य किसी की चाहत बनो तो स्थायी रूप से, तात्कालिक तौर पर नहीं....।"
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