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Tuesday, June 2, 2020

#अद्भुत_सह_सम्बन्ध #दो_महाकवियों_ने_बनाया_एक_अनूठा_दोहा (एक का संशय दूजे का समाधान) 【प्रणय प्रभात】

हिंदी साहित्य में एक दोहा ऐसा भी है जो दो महाकवियों की देन है। प्रमाणिकता कितनी है, नहीं पता। इतना पता है कि इस दोहे की रचना के पीछे एक सुंदर प्रसंग है। जो रोम-रोम पुलकित करता है। प्रसंग यह भी सिद्ध करता है कि साहित्य जोड़ने का माध्यम है। पता यह भी चलता है कि साहित्य मेधावानों के बीच कैसे सह-सम्बन्ध स्थापित करता था।          बात उन दिनों की है जब गोस्वामी श्री तुलसीदास जी चित्रकूट में निवासरत थे। वे मुग़ल शासन को लेकर आशंकित थे। इस कारण श्री रामचरित मानस की रचना अत्यंत सतर्कता व गोपनीयता के साथ कर रहे थे। उन्हें यह आशंका थी कि यदि बादशाह अकबर को पता चला तो उनका यह सृजनयज्ञ भंग हो सकता है। इसी आशंका के कारण वे अपनी पहचान को छुपाए हुए थे। सुकृत्यों की सुगंध कभी नहीं छिपती। यह बात उनके संदर्भ में भी सही साबित हुई। गोस्वामी जी की कीर्ति किसी प्रकार अकबर तक जा पहुँची। हुनर और योग्यता की क़द्र करने वाले अकबर की उत्कण्ठा प्रबल हो उठी। लालसा थी एक बार तुलसीदास जी से प्रत्यक्ष भेंट की। जिनका कोई पता ठिकाना गुप्तचर तक नहीं लगा पा रहे थे। एक दिन सैर के लिए हाथी पर सवार होकर निकले अकबर ने अपनी मंशा राजकवि अब्दुर्रहीम ख़ानखाना को बताई। बादशाह को अपने नवरत्नों में सम्मिलित कविवर रहीम की काव्य प्रतिभा का भान था। साथ ही यह विश्वास भी कि गोस्वामी जी की खोज उनके अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता। कविवर रहीम ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को करने का बीड़ा उठा लिया। संयोगवश हाथी पर सवार रहीम कवि ने अपने हाथी पर ग़ौर किया। जो अपनी सूंड से धूल उठा कर स्वयं के सिर पर डालता हुआ चल रहा था। हाथी की यह क्रिया स्वाभाविक थी किंतु उसने रहीम दास जी को एक युक्ति तत्समय सुझा दी। कविवर रहीम के मानस में एक प्रश्नात्मक पंक्ति का जन्म हो गया-#धूरि_धरत_गज_शीश_पर_कहि_रहीम_केहि_काज?अर्थात गजराज हाथी अपने सिर पर धूल क्यों रखता है?        क़ाफ़िला दरबार में पहुँचने के बाद कवि रहीम ने पंक्ति बादशाह को सुंताई। साथ ही यह दावा भी कर दिया कि इस पंक्ति पर दूसरी पंक्ति धरती पर केवल तुलसीदास जी ही लगा सकेंगे। किसी और में सामर्थ्य नहीं कि वे उनके प्रश्न का सटीक उत्तर देते हुए दोहे को पूर्ण कर सके। तय हुआ कि पंक्ति को एक प्रतियोगिता के रूप में प्रचारित किया जाएगा। जो सही पंक्ति लगाते हुए दोहे को पूर्ण करेगा। उसे हज़ार स्वर्ण मुद्राएं पुरुस्कार के तौर पर दी जाएंगी। दिन बीतते गए। दूर-दूर के कविगण अपनी पंक्ति के साथ दरबार में पहुँचते रहे। यह और बात है कि रहीम कवि उन्हें नकारते और लौटाते रहे। उन्हें जिस सार्थक पंक्ति की प्रतीक्षा थी वो अब तक दरबात में नहीं आई थी। दूसरी ओर पंक्ति व स्पर्द्धा का प्रचार देश भर में हो चुका था। प्रतिभा और प्रतिष्ठा की इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए बेताब कवि दरबार में उमड़ते रहे और लौटाए जाते रहे।         चित्रकूट में एक निर्धन ब्राह्मण रहा करता था। जो लकड़ी काट कर व बेच कर अपने परिवार का उदर पोषण करता आ रहा था। उसकी चिंता अपनी दो पुत्रियों के गौने को ले कर थी। जिसमें उसकी निर्धनता आड़े आ रही थी। लकड़हारा नित्य सृजन करने वाले श्री तुलसीदास जी को देख चुका था। उनकी विद्वता और सज्जनता का अनुमान भी लगा चुका था। उसने सोचा कि यदि बाबा एक पंक्ति लिख दें तो उक्त प्रतियोगिता जीती जा सकती है। वो अपने इस पक्के भरोसे के साथ चित्रकूट के घाट पर जा पहुँचा। गोस्वामी जी को प्रणाम कर उन्हें अपनी पीड़ा से अवगत कराया। साथ ही अपना मंतव्य भी बताया। गोस्वामी जी को इस प्रतियोगिता के पीछे कोई चाल होने का अंदेशा था, किंतु वे निर्धन ब्राह्मण की मदद से पीछे हटना भी नहीं चाहते थे। उन्होंने शर्त रखी कि वो उनकी दी हुई पंक्ति को स्वरचित बता कर दरबार में सुनाए। ईनाम लेकर अपने घर जाए और दायित्व पूर्ण करे। भूल कर भी किसी को उनके बारे में ना बताए। ब्राह्मण को अपनी निर्धनता से पार पाना था। वो तुरन्त इस शर्त को मां गया। तुलसीदास जी ने उसे एक पंक्ति लिख कर दी और समझाइश देते हुए विदा कर दिया। लकड़हारा जैसे-तैसे दरबार के द्वार तक जा पहुँचा। उसकी दयनीय दशा को देख कर द्वार पर तैनात प्रहरियों ने उसे रोक लिया। संयोग से यह दृश्य कविवर रहीम ने देख लिया। उन्होंने उसे आने देने को कहा। लकड़हारा अब दरबार में था। उसने अपनी पंक्ति सुनाने की अनुमति माँगी। जैसे ही उसे अनुमति मिली, उसने गोस्वामी जी द्वारा दी गई पंक्ति सुना दी-#जेहि_रज_मुनि_नारी_तरी_तेहि_ढूँढत_गजराज।।अर्थात प्रभु श्रीराम के चरणों की जिस धूल से ऋषि भार्या अहिल्या का उद्धार हुआ। गजराज उस रज की खोज में है ताकि उसका भी उद्धार हो सके।          पंक्ति को सुनते ही रहीम कवि उछल पड़े। उन्होंने लकड़हारे को गले से लगा लिया। उनकी तलाश एक दोहे की पूर्णता के साथ पूरी हो चुकी थी। यह अलग बात है कि वे इस पंक्ति को न इस ब्राह्मण का मानने को तैयार थे। ना ही उसे तुलसीदास के रूप में स्वीकार पा रहे थे। पारखी निगाहें अब भी सच की तलाश में थीं। लकड़हारे को बंदीगृह में डालने का भय दिखाया गया। भयवश उसने सारा सच उगलते देर नहीं लगाई। कहा जाता है कि इसके बाद अकबर और रहीम कवि ने चित्रकूट पहुँच कर गोस्वामी जी के दर्शन किए और अपनी जिज्ञासाओं को शांत किया। यह प्रसंग साहित्य संसार के मूर्धन्य मनीषियों की विवेकशीलता का एक जीवंत प्रमाण है। जो #खग_की_भाषा_खग_ही_जाने वाली उक्ति को चरितार्थ करता है। साथ ही विभूतियों की पारखी वृत्ति और आत्मविश्वास को भी उजागर करता है। एक पंक्ति में संशय और दूसरी पंक्ति में समाधान का प्रतीक यह दोहा आज भी सोच की समरसता व साझा सृजन का एक नायाब उदाहरण है:-#धूरि_धरत_गज_शीश_पर_कहि_रहीम_केहि_काज?#जेहि_रज_मुनि_नारी_तरी_तेहि_ढूँढत_गजराज।।       #जय_राम_जी_की😊😊😊😊😊😊😊😊😊😢

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