Saturday, June 6, 2020
#संस्मरण_भाग_02-#बाल_विद्या_मंदिर_का_स्वर्णकाल#सह_शैक्षणिक_गतिविधियों_में_भी_पाया_शिखर 【प्रणय प्रभात】#
श्योपुर के पहले निजी शिक्षण #संस्थान बाल विद्या मंदिर की #गाथा का यह दूसरा भाग है। आज हम इस संस्था के #स्वर्णकाल की चर्चा करेंगे। सभी संबंधितों के लिए #स्मरणीय यह दौर स्थापना के बाद शुरुआती डेढ़ दशक तक रहा। जिसका #साक्षी मैं स्वयं रहा। वर्ष 1978 से 1988 तक #शैक्षणिक ही नहीं #सहशैक्षणिक क्षेत्र में भी बाल विद्या मंदिर का दबदबा रहा। उन दिनों #प्रायमरी बोर्ड की परीक्षा ज़िला स्तरीय व कड़ी होती थी। जिसके परिणाम आज की तरह सौ फ़ीसदी नहीं होते थे। सारा नियंत्रण #मुरैना के हाथ था। इस जटिल परीक्षा में जिला #टॉप करने वाली पहली छात्रा #मोनिका सुपुत्री श्री प्रेमचंद जैन बाल विद्या मंदिर की ही थी। जो अन्यान्य गतिविधियों में भी शाला का गौरव थीं। #प्रावीण्य_सूची में स्थान बनाने का कारनामा अगले एक-डेढ़ दशक में इस शाला के तमाम विद्यार्थियों ने दोहराया। सह-शिक्षण #गतिवोधियों के मामले में विद्यालय वर्षों तक #अग्रणी बना रहा। प्रति वर्ष #शीतकाल में शाला स्तर पर खेल स्पर्धाएं होती थीं। विद्यालय के निजी क्रीडांगण में आयोजित इस खेल #उत्सव की धूम क़रीब सप्ताह भर रहती। कबड्डी, खो-खो, ऊंची व लम्बी कूद, चेयर रेस, जलेबी रेस, स्पून रेस बच्चों के पसंदीदा खेल थे। उत्सव का शुभारंभ व समापन समारोहपूर्वक होता था। जिनमें मुख्य अतिथि तहसील स्तर के आला अफसर व शिक्षाधिकारी होते थे। अध्यक्षता प्रायः शाला प्रमुख श्री आनंद प्रकाश गुप्ता जी के पिता श्री प्रभुदयाल जी गुप्ता (ढोटी वाले) करते थे। जो अत्यंत सहज, सरल, धर्मप्रेमी व मिलनसार थे। उनका आशीर्वाद लगभग हर छोटे-बड़े आयोजन में बच्चों को मिलता था। उन दिनों स्थानीय स्तर पर एसडीएम सबसे बड़ा अधिकारी हुआ करता था। अधिकांश अफसरों के बच्चे बाल विद्या मंदिर में ही पढ़ते थे। लिहाजा अफसरों की आवाजाही आम दिनों में भी बनी रहती थी। बाल विद्या मंदिर की धूम केवल अपनी चारदीवारी तक ही सीमित नहीं थी। शासकीय बालक आदर्श उ.मा. विद्यालय (अब उत्कृष्ट शाला) में लगने वाले #बाल_मेले में भी बाल विद्या मंदिर बढ़-चढ़कर भाग लेता। प्रायः नवम्बर में लगने वाले इस मेले में बाल विद्या मंदिर का बड़ा सा स्टॉल अलग दिखाई देता। देर रात तक विद्यालय परिवार इस मेले में अपने मोर्चे पर डटा नज़र आता। तीन दिवसीय इस मेले में #सर्वश्रेष्ठ स्टॉल सज्जा व संचालन के लिए शाला कई बार #अव्वल रही। मेले के दौरान आधी रात तक स्टाफ और बच्चों को ज़िम्मेदारी के साथ घरों तक पहुंचाया जाता। जो अगले दिन दुगने उत्साह से फिर अपनी भूमिका निभाते नज़र आते। बाल विद्या मंदिर का अपना #वार्षिकोत्सव बच्चों व अभिभावकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता था। एक दिन के इस उत्सव के लिए रिहर्सल 20-20 दिन चलती थी। प्रस्तुतियों व प्रतिभागियों का चयन उत्साहपूर्ण माहौल में होता था। गीत, नृत्य की एकल, युगल व सामूहिक प्रस्तुतियों के अलावा प्रहसन, नाटक, मोनो एक्टिंग व क़व्वाली की प्रस्तुतियां आकर्षण का ख़ास केंद्र होती थीं। सारी प्रस्तुतियां रिहर्सल की ही तरह हारमोनियम व ढोलक या तबले पर होती थीं। जिसके लिए श्री बाबूलाल सेन और श्री घनश्याम राय की जोड़ी को विशेष मान-मनुहार कर के बुलाया जाता था। साज श्रंगार व रिहर्सल में लगभग 8-10 साल मेरी भी रुचिपूर्ण भूमिका रही। #दोस्ती शीर्षक से एक नाटक में इंस्पेक्टर आलोक का लीड रोल भी मैने किया। जबकि मैं इस शाला का छात्र नहीं था। मेरा इस संस्थान से जुड़ाव अपनी माँ की वजह से था। जो इस स्कूल में लगभग 12 साल शिक्षिका रहीं। मैं तब मिडिल में पढ़ता था और शासकीय माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-01 का छात्र हुआ करता था। बाल विद्या मंदिर के बड़े बच्चे कक्षा व उम्र के लिहाज से मेरे जूनियर होते थे। खेल प्रतियोगिता और वार्षिकोत्सव के विजेताओं व तमाम प्रतिभागियों को बड़े पैमाने पर पुरुस्कार व प्रमाणपत्र समारोह में वितरित होते थे। कुल मिलाकर नवम्बर और दिसम्बर के महीनों की रौनक ही तब अलग होती थी। बाल फिल्मों का प्रदर्शन भी इन्हीं दिनों में हुआ करता था। बच्चों का क़तार बना कर कृष्णा और जीवन टॉकीज़ तक जाना व लौटना ख़ासा उत्साहपूर्ण होता था। बाल विद्या मंदिर की इस आयोजनधर्मिता को बाद में खुलने वाले स्कूलों ने भी उत्साह से अपनाया। जिसमें एमजी बाल विद्या निकेतन व टैगोर बाल निकेतन अग्रणी रहे। अब वार्षिकोत्सव तथा खेल समागम की परंपरा केवल दो-चार बड़े व मंहगे स्कूलों में बाक़ी बची है। सामूहिक बाल मेले की गौरवशाली परम्परा लुप्त हो गई है। बच्चों, शिक्षकों व अभिभावकों की रुचि पर अब आधुनिकता हावी है। जो उत्साह तब फर्श पर बैठने वाले अभिभावकों में होता था, अब कुर्सियों पर विराजमान होने वाले अभिभावकों में भी नहीं दिखता। तब वो अंतिम प्रस्तुति तक मैदान नहीं छोडते थे। अब अपने बच्चों की प्रस्तुति जल्दी कराना चाहते हैं। ताकि उसे देख कर रवानगी डाल सकें। दूसरे बच्चों की प्रतिभा या प्रस्तुति से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। यह एक बहुत बड़ा फ़र्क़ है तब और अब में। तब आयोजनों के लिए साजो-सामान जुटाना बड़ी चुनौती होने के बावजूद रुचिकर होता था। अब सब कुछ रेडीमेड हो गया है। जिसमें रुचि व्यक्तिगत अभिरुचि पर निर्भर करने लगी है। बात अभी पूरी नहीं हुई है। तीसरे व अंतिम भाग में इस संस्थान की समर्पित शिक्षिकाओं का ज़िक्र होगा। साथ ही उन बच्चों का भी जो कुछ अलग थे और मुझे प्रिय भी। विडम्बना की बात यह है कि कुछ को छोड़कर अधिकांश अब सम्पर्क में नहीं हैं। स्मृति पटल पर तमाम बच्चों के नाम हैं लेकिन अक़्स धुंधला चुके हैं। सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिवोधियों में अव्वल बीते हुए कल के बच्चे आज ख़ुद अभिभावक हैं। जो अपने अतीत को याद करते हुए इस सच को नकार नहीं सकते कि जो विद्यार्थी जीवन सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने जिया वो आज उनके साधन व सुविधासंपन्न बच्चों को भी मयस्सर नहीं है। 【#शेष_फिर】
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