Thursday, June 18, 2020
#गजल / #हो_नहीं_सकता 【प्रणय प्रभात】
◆ कभी भी साथ इक शब का गवारा हो नहीं सकता।जो सूरज है वो सूरज है, सितारा हो नहीं सकता।।◆ मुझे अपनी वफा पर नाज है मैं आज कहता हूं।जो मेरा हो नहीं पाया, तुम्हारा हो नहीं सकता।।◆ नहीं था बे-सबब दामन छुड़ाना, हाथ से उसके।हमें लगने लगा था वो, हमारा हो नहीं सकता।।◆ अगर सच्ची मोहब्बत में, तआल्लुक तर्क हो जाए।यकीं मानो कि ऐसा फिर, दुबारा हो नहीं सकता।।◆ जहां पल-पल बदलती सीरतें, आंखों के आगे हों।कसम से ऐसी बस्ती में, गुजारा हो नहीं सकता।।◆ घरोंदा राख कर डाले, कहां आतिश के बस में है?हवा का जब तलक ना हो इशारा हो नहीं सकता।।
#भावाभिव्यक्ति#पिता_को_याद_क्यों_करूं? 【प्रणय प्रभात】"
"मैं अपने पिता को याद नहीं करताकभी नहीं, कभी भी नहीं।और क्यों करूं याद?याद भी उन्हें, जिन्हें कभी भूला ही नहीं,जो शिलालेख पर अंकित वाक्य की तरह,कालजयी हैं मेरे मानस-पटल पर।कौन कहता है कि वो नहीं हैंमैं कहता हूं कि वो आज भी यहीं हैं,मेरे कर्म में, मेरे धर्म में,मेरे जहन में, मेरे मर्म में।मेरे आचार-विचार-व्यवहार में,मेरी हरेक जीत में और हार में।यहां तक कि मेरी सभ्यता और संस्कार में।मुझे महसूस होता है पल-पल पिता के साथ का,मेरा शीश सतत स्पर्श पाता है पिता के हाथ का।मेरे लिए पितृ-दिवस कोई एक दिनी त्यौहार नहीं,मेरे लिए हर दिन पितृ-दिवस हैक्योंकि मेरे अंदर मेरे पिता आज भी हैंजो जीवित रहेंगे मेरे जीवन तक और उसके बाद मेरे सूक्ष्म स्वरूप मेंपहुंच जाऐंगे अपने वंश की अगली पीढ़ी में।सिर्फ इसलिए कि मैने अपने में अपने पिता को जिया है,आखिर मेरे पास जो भी है उन्हीं से तो लिया है।।"(अपने जीवनदाता, अपने मार्गदर्शी, अपने प्रेरणास्त्रोत अपने आदर्श पापा को उनके बेटे की ओर से सादर समर्पित काव्यात्मक भावाभिव्यक्ति)
Wednesday, June 17, 2020
#स्लोगम / #बिटिया 【प्रणय प्रभात】"
◆ गर्मी छाया सर्दी धूप।बिटिया है देवी का रूप।।◆ बेटी दुर्गा का आभास।बेटी में लक्ष्मी का वास।।◆ बेटी चंदा बेटी तारा।बेटी से घर में उजियारा।।◆बेटी कंगन बेटा हार।दोनों हैं कुल के श्रंगार।।बेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियान
#स्लोगन / #बेटी 【प्रणय प्रभात】
◆ बेटा-बेटी दोनों एक।अगर दिलाओ शिक्षा नेक।।◆ बेटी जब पढ़ने जाएगी।साथ शारदा घर आएगी।।◆ बिटिया सारे काम करेगी।पढ़ी-लिखी तो नाम करेगी।।◆जीवन धारा जाए न व्यर्थ।बिटिया को भी करो समर्थ।।◆ दुर्गा लक्ष्मी शारद जानो।बेटी शक्ति-स्वरूपा मानो।।बेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओबेटी बचाओबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओबेटी बचाओ स्वावलम्बी बनाओ
#गीत / #सुख_दुःख 【प्रणय प्रभात】
अगर वो अपनी लगती है तो यह कैसे पराया है?ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ हमें मीठा निगलने कटु उगलने की जो आदत है।उसी कारण खुशी की चाह है दुःख से शिकायत है।।ये सोचो कल बहिन आई थी भाई आज आया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ लता, पत्ते, सुमन, फल और तरु उपवन सजाते हैं।मगर क्यों भूलिए उद्यान में कंटक भी आते हैं।।इन्हीं ने अनगिनत पुष्पों का जीवन तक बचाया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ बनाएं दृष्टि रुचि अरु सोच सम आदर करें दुःख का।बिना इनके भला क्या स्वाद जीवन में किसी सुख का?वो दुःख ही हैं जिन्होंने ईष्ट का सुमिरन कराया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊
Saturday, June 13, 2020
#प्रयोगात्मक_कविता- 【प्रणय प्रभात】
#जन जितने सारे आहत।#गण जितने पाते राहत।#मन व्याकुल करता क्रंदन ।#अधिनायक का अभिनंदन।।#जय कहने में क्या जाता?#है माता आखिर माता।।#भारत वर्ष रहे आबाद।#भाग्य_विधाता ज़िंदाबाद।।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊
#कोटा एक_शहर_जो_अब_है_बस_यादों_में 😍【प्रणय प्रभात】😍
राजस्थान की वो कोटा नगरी आज की कोटा महानगरी से बिल्कुल अलग थी। ना बहुत सीमित, ना इतनी विस्तारित। क्षेत्रफल और आबादी के मान से एकदम संतुलित। शोरशराबे और अंधी दौड़ से कोसों दूर। बेहद दर्शनीय, रमणीय और आकर्षक। बात अब से चार दशक पूर्व की है। जब कोटा शहर ना तो एज्यूकेशन हब था, ना ही चिकित्सा के क्षेत्र में इतना आधुनिक। तब हर तिराहे, चौराहे पर ना तो इतने ख़ूबसूरत सर्किल थे, ना ही पार्क। सात अजूबे (सेवन वंडर्स) और हवाई पुल (हैंगिंग ब्रिज) जैसे स्थल तब कल्पनाओं में भी नहीं थे। चंबल गार्डन उस दौर का सर्वाधिक सुंदर और पसंदीदा पिकनिक स्पॉट हुआ करता था। उसके आगे अमर-निवास, श्री गोदावरी धाम, अधर-शिला और भीतरिया कुंड सहित नसिया जी भी सुरम्य पर्यटन स्थल थे। जहां सैलानियों और स्थानीय परिवारों की मौजूदगी रौनक बिखेरा करती थी। चंबल गार्डन की सुंदर लाइटिंग के बीच झाड़ीनुमा पौधों की मनमोहक आकृतियां मन को लुभाती थीं। मद्धिम स्वर में बजतीं मानस की चौपाइयां माहौल में रस घोलती रहती थीं। चंबल की जलधाराओं पर फट-फट की आवाज़ के साथ फर्राटा भरती मोटरवोट की सवारी तब बेहद रोमांचित करती थी। घर से बना कर ले जाया गया भोजन हरी-भरी घास के कालीन पर अत्यंत स्वादिष्ट लगता था। कोटा बैराज, गढ़ पैलेस भी यदा-कदा तफ़रीह के अच्छे विकल्प होते थे। तब आवागमन के तीन साधन ही प्रचलन में थे। लम्बी थूथनी वाले टेम्पू, तांगे और रिक्शे। आवागमन के निजी साधनों में सर्वाधिक संख्या सायकिलों की होती थी। उसके बाद स्कूटर, मोपेड, बाइक आदि का नम्बर आता था। चार पहिया वाहन ख़ास परिवारों के पास होते थे। तारकोल की काली, चिकनी व चौड़ी सड़कों पर साइकिल दौड़ाना तब बेहद मज़ा देता था। बचपन से युवावस्था तक कोटा मेरी पहुंच में रहा और अभिरुचि में भी। मेरे छोटे मामा राजस्थान राज्य विद्युत मंडल (आरएसईबी) में सेवारत थे। किराए के मकान में रहते थे और एक निर्धारित अंतराल पर घर बदलते रहते थे। बहुत छोटा था तब उनका ठिकाना पाटनपोल की किसी गली में था। जिसकी याद बहुत धुंधली है। बाद में उन्होंने किशोरपुरा गेट के पास किन्हीं पारीक जी का घर ले लिया। जो श्री नीलकंठ महादेव मंदिर के पास था। यहां रहते हुए गढ़ पैलेस और नज़दीक स्थित उद्यान तक आना-जाना बेहद आसान होता था। सन 1980 के दशक में दादाबाड़ी कॉलोनी कोटा की सबसे अच्छी कॉलोनी के तौर पर वजूद में आई। यहां स्थित आवास 3/के/4 में चार-पांच साल बेहद यादगार रहे। चंबल गार्डन वाला क्षेत्र यहां से मामूली दूरी पर था। दिन भर बर्फ़ के गोले, नर्म-नर्म ककड़ी, फिरनी, फालसे, जामुन, शहतूत, रसीले तरबूज़, कुल्फ़ी आदि के ठेले घण्टी बजाते, आवाज़ लगाते आया करते थे। सबसे कुछ न कुछ खरीदना दिन भर का काम था। हर ठेले वाले के पास अधिकांश परिवारों का उधार खाता होता था। घर-घर में हड़ और चूरन-चटनी की पेकिंग का काम तब घरेलू रोज़गार होता था। हर रविवार को चंबल गार्डन जाना तब बेहद लाजमी था। गर्मी के दिनों में तब रात बेहद सुहानो होती थी। पानी के छिड़काव से शीतल पूरी छत पर बिस्तर बिछाना और धमाल करना बहुत भाता था। मामी जी और उनके चार बच्चों के साथ हम चार भाई-बहन और मिल जाते थे अपनी मम्मी के साथ। आपस में खूब हंसी-ठठ्ठा होता। न जाने कहाँ-कहाँ के किस्से निकल कर आते थे। कभी-कभी कुछ पलों की हल्की सी झड़प भी हम बच्चों में हो जाती थी। जो दर्ज़न भर बच्चों के बीच स्वाभाविक सी ही थी। थके-हारे मामाजी अपने अनूठे अंदाज़ में भुनभुनाते और अंततः हमारी मस्ती में शरीक़ हो जाते। जिन्हें उनके हमनाम बाल-सखा राजू मामा बहुत छेड़ते और खिजाते थे। हर शाम साइकिल पर सवार होकर आना और देर रात लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल था। खाने-पीने के शौकीन और बेहद मस्तमौला। ईसाई परिवार से ताल्लुक़ रखते थे और ख़ासे मोटे-ताज़े। मैकेनिकल लाइन के थे और तमाम बिगड़ी चीज़ें ख़ुद सुधार देते थे। फेक्ट्री से कुछ न कुछ बनाकर लाना उनका शौक़ था। कॉलोनी के इस हिस्से में तब बहुत गहमा-गहमी नहीं होती थी। वातावरण प्रायः शांत प्रतीत होता था। आधी रात तक एक अदद ट्रांजिस्टर हम सबके मनोरंजन का साझा माध्यम होता था। बिनाका गीतमाला, चित्रपट से, फौजी भाइयों के लिए और बेला के फूल जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत उस दौर के कर्णप्रिय गीत प्रसारित होते थे। पुराने सदाबहार गीत भी आधी रात तक ट्रांजिस्टर से गूंजते थे। एकाध बार टॉकीज़ में फ़िल्म भी देख आते थे। यहां के बाद अगला ठिकाना बना दादाबाड़ी विस्तार योजना का आवास 3/जी/39, जहां की यादें आज भी रोमांचित करती हैं। इस क्षेत्र में लगभग सभी आवास भरे हुए थे। लिहाजा चहल-पहल की कोई कमी नहीं थी। हल्दी, तेल, दाल, चाय-पत्ती, शक्कर, आटा मांगने और लौटने आने वाले पड़ौसी बेहद क़रीबी होते थे। इसके पीछे अभाव जैसी स्थिति नहीं थी। बस घरों में अति संचय की आदत नहीं थी शायद। इस आवास के पास ही एक आवास मामीजी के बड़े भाई यानि मुन्ना मामा का था। लिहाजा यहां मौज-मस्ती की कम्पनी का आकार और बड़ा था। यहां से साइकिल लेकर मेला मैदान के रास्ते नयापुरा, घंटाघर, टिपटा, पाटनपोल, कैथूनीपोल, सब्ज़ी मंडी जाना रोज़ का काम था। तीखी धूप में दूर तक सुनसान सड़क पर साइकिल की रफ़्तार भी गज़ब की होती थी। कचौड़ी लाना हर दूसरे दिन का काम था। कच्चे पापड़ और मोटे सेव (सेवड़े) प्रायः सब्ज़ी का विकल्प होते थे। दादाबाड़ी के छोटे चौराहे पर कुंदन पान वाले की दुकान हर शाम हमारी पहुंच में होती थी। दो-तीन गुमटीनुमा दुकानों पर कॉमिक्स व पत्रिकाएं किराए पर मिलती थीं। इसी तरह कुछेक दुकान साइकिलों की थीं। सप्ताह में एक दिन थोक में सब्ज़ी लाने के लिए बड़ी सब्ज़ी मंडी जाने का अपना ही मज़ा था। यहां सब्ज़ी अच्छी और सस्ती मिलती थी। जो आम दिनों में दादाबाड़ी कॉलोनी की गिनी-चुनी दुकानों पर डेढ़ से दो गुना मंहगी मिलती थीं। दिन भर कुछ न कुछ खाना-पीना और मौज-मस्ती करना हर साल गर्मी की छुट्टियों का तक़ाज़ा था। इसके अलावा मनमर्जी से कोटा आना-जाना साल में चार-छह बार हो जाता था। दो-दो कमरों वाले एक छोटे से क्वार्टर में हम दर्ज़न भर लोग चैन से रह लेते थे। यह सोच कर भी अब ताज्जुब होता है। जब सबको अलग कमरों की दरकार होती है। पता चलता है कि गुंजाइशें ईंट-पत्थर के घरों में नहीं दिलों में हुआ करती थीं। खेल-कूद के साधनों के बिना दो-दो महीने कितने मज़े से गुज़र जाते थे। इस बात की कल्पना भी आज की पीढ़ी शायद ही कर पाए। लगता है कि आनंद संसाधनों का मोहताज़ नहीं। यह अंदर से उपजने वाली सहज हिलोर होता है। जिसका वास्ता केवल आपसी सरोकारों और आत्मीयता से होता है। आखिरी पड़ाव गणेश तलाब रहा, जहां मामाजी ने ख़ुद का छोटा सा घर ले लिया। उड़िया बस्ती के पास स्थित घर के सामने सिर्फ़ मैदान हुआ करता था। यहां से काफ़ी दूरी पर बस मोदी कॉलेज नज़र आता था। बहुत से सूने इलाके के बाद जवाहरनगर जैसी कुछ नई कॉलोनियाँ तब आकार पा रही थीं। हमारी दौड़-धूप सामान्यतः कोटा के पुराने क्षेत्रों में रहती थी। कभी-कभी सीएडी और एरोड्रम चौराहे तक की सैर भी साइकिल से हो जाती थी। सीमित साधनों के बीच बेहद यादगार रहे वो दिन। फिर इन्हें किसी की नज़र लग गई। सन 1992 में धुलेंडी के दिन मामाजी अपने परिचितों से रंग खेल कर घर लौट रहे थे। मोदी कॉलेज के सामने किसी नशेड़ी रईसज़ादे की तेज़ रफ़्तार कार ने उन्हें कुचल दिया। जिनकी दुःखद मृत्यु की ख़बर परिवार को अगले दिन मुश्किल से मिली। मामाजी के जाने के बाद परिवार लगभग असहाय सी स्थिति में आ गया। तीन बेटियों की शादी और तमाम कारणों से छोटा सा आशियाना बिक गया। बाद में मामाजी के बेटे को मिली अनुकम्पा नियुक्ति और मामीजी की पेंशन से हालात सामान्य हो गए। परन्तु वो दौर आज तक नहीं लौट पाया जो अब तक यादों में महफ़ूज़ है। कुछ सालों बाद राजू मामा भी दुनिया छोड़ गए। जिनकी गोद में बचपन के कई बरस बीते। बाद में मामीजी ने भी बेटे की बदली के कारण कोटा छोड़ दिया। कुल मिलाकर बरसों तक अपना सा लगने वाला कोटा अब एक पराया सा नगर है। जहां पहुंचकर वो सुखद अहसास अब होता ही नहीं। निस्संदेह बीते तीन दशक में कोटा ने तीव्रगामी व गगनचुंबी विकास की तमाम इबारतें लिखीं। वेशक यहां की विकासयात्रा ने राजस्थान सहित अन्य राज्यों के बाक़ी शहरों को चौंकाया। बावजूद इसके मैंने उस कोटा को फिर कभी नहीं पाया जो मेरे दिल में बसा करता था, या आज तक धड़कता है। आज श्योपुर वालों के लिए कोटा आसानी से पहुंच में है। मेगा हाईवे और ऊँची पुलियाओं ने आवागमन के ज़ोखिम को लगभग खत्म कर दिया है। एक के बाद एक अच्छी बसों का संचालन होने लगा है। बावजूद इसके राजस्थान राज्य परिवहन निगम की बसों का वो सफ़र भुलाए नहीं भूलता, जो बरसात में जटिल हो जाता था। पार्वती और कालीसिंध नदी के कारण रास्ता मामूली बारिश में बाधित हो जाता था। बावजूद इसके कोटा की यात्रा साल में कई बार बदस्तूर कारी रहती थी। जो अब अन्य शहरों की यात्राओं के लिए बतौर जंक्शन एक पड़ाव भर है। जिसका वास्ता भी केवल रेलवे स्टेशन और नयापुरा क्षेत्र से बचा है। जहां अपने लिए अब कोई लगाव या आकर्षण जैसी अनुभूति नहीं। अपना कोटा वर्तमान कोटा के लंबे-चौड़े आँचल में पूरी तरह गुम हो चुका है। बहरहाल, कोटा प्रवास से जुड़े तमाम यादगार व मज़ेदार किस्से कभी फुर्सत में.......।। #miss_you_old_kota 😍
Tuesday, June 9, 2020
#सिरमौर_बनो_तो_मोरपंख_से 【प्रणय प्रभात】"
अगर सिरमौर बनो तो भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में लगे मोर-पंख की तरह बनो, जिसका स्थान कोई और कभी नहीं ले सकता। किसी दूल्हे के सेहरे में लगी उस मौर की तरह नहीं, जिसे विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद जलधाराओं में प्रवाहित कर दिया जाता है। तात्पर्य किसी की चाहत बनो तो स्थायी रूप से, तात्कालिक तौर पर नहीं....।"
Saturday, June 6, 2020
#संस्मरण_भाग_02-#बाल_विद्या_मंदिर_का_स्वर्णकाल#सह_शैक्षणिक_गतिविधियों_में_भी_पाया_शिखर 【प्रणय प्रभात】#
श्योपुर के पहले निजी शिक्षण #संस्थान बाल विद्या मंदिर की #गाथा का यह दूसरा भाग है। आज हम इस संस्था के #स्वर्णकाल की चर्चा करेंगे। सभी संबंधितों के लिए #स्मरणीय यह दौर स्थापना के बाद शुरुआती डेढ़ दशक तक रहा। जिसका #साक्षी मैं स्वयं रहा। वर्ष 1978 से 1988 तक #शैक्षणिक ही नहीं #सहशैक्षणिक क्षेत्र में भी बाल विद्या मंदिर का दबदबा रहा। उन दिनों #प्रायमरी बोर्ड की परीक्षा ज़िला स्तरीय व कड़ी होती थी। जिसके परिणाम आज की तरह सौ फ़ीसदी नहीं होते थे। सारा नियंत्रण #मुरैना के हाथ था। इस जटिल परीक्षा में जिला #टॉप करने वाली पहली छात्रा #मोनिका सुपुत्री श्री प्रेमचंद जैन बाल विद्या मंदिर की ही थी। जो अन्यान्य गतिविधियों में भी शाला का गौरव थीं। #प्रावीण्य_सूची में स्थान बनाने का कारनामा अगले एक-डेढ़ दशक में इस शाला के तमाम विद्यार्थियों ने दोहराया। सह-शिक्षण #गतिवोधियों के मामले में विद्यालय वर्षों तक #अग्रणी बना रहा। प्रति वर्ष #शीतकाल में शाला स्तर पर खेल स्पर्धाएं होती थीं। विद्यालय के निजी क्रीडांगण में आयोजित इस खेल #उत्सव की धूम क़रीब सप्ताह भर रहती। कबड्डी, खो-खो, ऊंची व लम्बी कूद, चेयर रेस, जलेबी रेस, स्पून रेस बच्चों के पसंदीदा खेल थे। उत्सव का शुभारंभ व समापन समारोहपूर्वक होता था। जिनमें मुख्य अतिथि तहसील स्तर के आला अफसर व शिक्षाधिकारी होते थे। अध्यक्षता प्रायः शाला प्रमुख श्री आनंद प्रकाश गुप्ता जी के पिता श्री प्रभुदयाल जी गुप्ता (ढोटी वाले) करते थे। जो अत्यंत सहज, सरल, धर्मप्रेमी व मिलनसार थे। उनका आशीर्वाद लगभग हर छोटे-बड़े आयोजन में बच्चों को मिलता था। उन दिनों स्थानीय स्तर पर एसडीएम सबसे बड़ा अधिकारी हुआ करता था। अधिकांश अफसरों के बच्चे बाल विद्या मंदिर में ही पढ़ते थे। लिहाजा अफसरों की आवाजाही आम दिनों में भी बनी रहती थी। बाल विद्या मंदिर की धूम केवल अपनी चारदीवारी तक ही सीमित नहीं थी। शासकीय बालक आदर्श उ.मा. विद्यालय (अब उत्कृष्ट शाला) में लगने वाले #बाल_मेले में भी बाल विद्या मंदिर बढ़-चढ़कर भाग लेता। प्रायः नवम्बर में लगने वाले इस मेले में बाल विद्या मंदिर का बड़ा सा स्टॉल अलग दिखाई देता। देर रात तक विद्यालय परिवार इस मेले में अपने मोर्चे पर डटा नज़र आता। तीन दिवसीय इस मेले में #सर्वश्रेष्ठ स्टॉल सज्जा व संचालन के लिए शाला कई बार #अव्वल रही। मेले के दौरान आधी रात तक स्टाफ और बच्चों को ज़िम्मेदारी के साथ घरों तक पहुंचाया जाता। जो अगले दिन दुगने उत्साह से फिर अपनी भूमिका निभाते नज़र आते। बाल विद्या मंदिर का अपना #वार्षिकोत्सव बच्चों व अभिभावकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता था। एक दिन के इस उत्सव के लिए रिहर्सल 20-20 दिन चलती थी। प्रस्तुतियों व प्रतिभागियों का चयन उत्साहपूर्ण माहौल में होता था। गीत, नृत्य की एकल, युगल व सामूहिक प्रस्तुतियों के अलावा प्रहसन, नाटक, मोनो एक्टिंग व क़व्वाली की प्रस्तुतियां आकर्षण का ख़ास केंद्र होती थीं। सारी प्रस्तुतियां रिहर्सल की ही तरह हारमोनियम व ढोलक या तबले पर होती थीं। जिसके लिए श्री बाबूलाल सेन और श्री घनश्याम राय की जोड़ी को विशेष मान-मनुहार कर के बुलाया जाता था। साज श्रंगार व रिहर्सल में लगभग 8-10 साल मेरी भी रुचिपूर्ण भूमिका रही। #दोस्ती शीर्षक से एक नाटक में इंस्पेक्टर आलोक का लीड रोल भी मैने किया। जबकि मैं इस शाला का छात्र नहीं था। मेरा इस संस्थान से जुड़ाव अपनी माँ की वजह से था। जो इस स्कूल में लगभग 12 साल शिक्षिका रहीं। मैं तब मिडिल में पढ़ता था और शासकीय माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-01 का छात्र हुआ करता था। बाल विद्या मंदिर के बड़े बच्चे कक्षा व उम्र के लिहाज से मेरे जूनियर होते थे। खेल प्रतियोगिता और वार्षिकोत्सव के विजेताओं व तमाम प्रतिभागियों को बड़े पैमाने पर पुरुस्कार व प्रमाणपत्र समारोह में वितरित होते थे। कुल मिलाकर नवम्बर और दिसम्बर के महीनों की रौनक ही तब अलग होती थी। बाल फिल्मों का प्रदर्शन भी इन्हीं दिनों में हुआ करता था। बच्चों का क़तार बना कर कृष्णा और जीवन टॉकीज़ तक जाना व लौटना ख़ासा उत्साहपूर्ण होता था। बाल विद्या मंदिर की इस आयोजनधर्मिता को बाद में खुलने वाले स्कूलों ने भी उत्साह से अपनाया। जिसमें एमजी बाल विद्या निकेतन व टैगोर बाल निकेतन अग्रणी रहे। अब वार्षिकोत्सव तथा खेल समागम की परंपरा केवल दो-चार बड़े व मंहगे स्कूलों में बाक़ी बची है। सामूहिक बाल मेले की गौरवशाली परम्परा लुप्त हो गई है। बच्चों, शिक्षकों व अभिभावकों की रुचि पर अब आधुनिकता हावी है। जो उत्साह तब फर्श पर बैठने वाले अभिभावकों में होता था, अब कुर्सियों पर विराजमान होने वाले अभिभावकों में भी नहीं दिखता। तब वो अंतिम प्रस्तुति तक मैदान नहीं छोडते थे। अब अपने बच्चों की प्रस्तुति जल्दी कराना चाहते हैं। ताकि उसे देख कर रवानगी डाल सकें। दूसरे बच्चों की प्रतिभा या प्रस्तुति से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। यह एक बहुत बड़ा फ़र्क़ है तब और अब में। तब आयोजनों के लिए साजो-सामान जुटाना बड़ी चुनौती होने के बावजूद रुचिकर होता था। अब सब कुछ रेडीमेड हो गया है। जिसमें रुचि व्यक्तिगत अभिरुचि पर निर्भर करने लगी है। बात अभी पूरी नहीं हुई है। तीसरे व अंतिम भाग में इस संस्थान की समर्पित शिक्षिकाओं का ज़िक्र होगा। साथ ही उन बच्चों का भी जो कुछ अलग थे और मुझे प्रिय भी। विडम्बना की बात यह है कि कुछ को छोड़कर अधिकांश अब सम्पर्क में नहीं हैं। स्मृति पटल पर तमाम बच्चों के नाम हैं लेकिन अक़्स धुंधला चुके हैं। सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिवोधियों में अव्वल बीते हुए कल के बच्चे आज ख़ुद अभिभावक हैं। जो अपने अतीत को याद करते हुए इस सच को नकार नहीं सकते कि जो विद्यार्थी जीवन सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने जिया वो आज उनके साधन व सुविधासंपन्न बच्चों को भी मयस्सर नहीं है। 【#शेष_फिर】
Friday, June 5, 2020
#देशी_ग़ज़ल / #वायरस 【प्रणय प्रभात】-
- वो बोले चन्द रोज़ में हारेगा वायरस।मैं जानता था साल भर मारेगा वायरस।।- बाहर के जंक फूड से दिलवाएगा निजात।लोगों को कुछ दिनों में सुधरेगा वायरस।।- घर बैठ के मर जाएंगे तफ़रीह के कीड़े।भटकन पसंद रूह को तारेगा वायरस।।- मिट जाएंगे कुछ रोज़ में सारे मुग़ालते।रिश्तों की ज़िल्द ऐसे उतारेगा वायरस।।- ढूंढेंगे हाथ नींद में भी सैनेटाइज़र।आकर के ख़्वाब में भी पुकारेगा वायरस।।
Wednesday, June 3, 2020
#तेवरी / #राम_मदारी 【प्रणय प्रभात】-
खेल दिखाते हल्के भारी।हम सब बंदर राम मदारी।।- साँस गिने डमरू की लय पे।काल गले में रस्सी डारी।- जब ललाट वनवास लिखा हो।फिर काहे के महल अटारी।।- सँभल सँभल के पग धरना है।जीवन इक तलवार दुधारी।।- समय का डंडा करेइशारा।कब आएगी किसकी बारी।।- बुझती आँखें बता रही हैं।देख चुकीं दुनिया की यारी।।- मुँह देखे की प्रीत निभाना।"प्रणय" यही है दुनियादारी।।
Tuesday, June 2, 2020
#अद्भुत_सह_सम्बन्ध #दो_महाकवियों_ने_बनाया_एक_अनूठा_दोहा (एक का संशय दूजे का समाधान) 【प्रणय प्रभात】
हिंदी साहित्य में एक दोहा ऐसा भी है जो दो महाकवियों की देन है। प्रमाणिकता कितनी है, नहीं पता। इतना पता है कि इस दोहे की रचना के पीछे एक सुंदर प्रसंग है। जो रोम-रोम पुलकित करता है। प्रसंग यह भी सिद्ध करता है कि साहित्य जोड़ने का माध्यम है। पता यह भी चलता है कि साहित्य मेधावानों के बीच कैसे सह-सम्बन्ध स्थापित करता था। बात उन दिनों की है जब गोस्वामी श्री तुलसीदास जी चित्रकूट में निवासरत थे। वे मुग़ल शासन को लेकर आशंकित थे। इस कारण श्री रामचरित मानस की रचना अत्यंत सतर्कता व गोपनीयता के साथ कर रहे थे। उन्हें यह आशंका थी कि यदि बादशाह अकबर को पता चला तो उनका यह सृजनयज्ञ भंग हो सकता है। इसी आशंका के कारण वे अपनी पहचान को छुपाए हुए थे। सुकृत्यों की सुगंध कभी नहीं छिपती। यह बात उनके संदर्भ में भी सही साबित हुई। गोस्वामी जी की कीर्ति किसी प्रकार अकबर तक जा पहुँची। हुनर और योग्यता की क़द्र करने वाले अकबर की उत्कण्ठा प्रबल हो उठी। लालसा थी एक बार तुलसीदास जी से प्रत्यक्ष भेंट की। जिनका कोई पता ठिकाना गुप्तचर तक नहीं लगा पा रहे थे। एक दिन सैर के लिए हाथी पर सवार होकर निकले अकबर ने अपनी मंशा राजकवि अब्दुर्रहीम ख़ानखाना को बताई। बादशाह को अपने नवरत्नों में सम्मिलित कविवर रहीम की काव्य प्रतिभा का भान था। साथ ही यह विश्वास भी कि गोस्वामी जी की खोज उनके अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता। कविवर रहीम ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को करने का बीड़ा उठा लिया। संयोगवश हाथी पर सवार रहीम कवि ने अपने हाथी पर ग़ौर किया। जो अपनी सूंड से धूल उठा कर स्वयं के सिर पर डालता हुआ चल रहा था। हाथी की यह क्रिया स्वाभाविक थी किंतु उसने रहीम दास जी को एक युक्ति तत्समय सुझा दी। कविवर रहीम के मानस में एक प्रश्नात्मक पंक्ति का जन्म हो गया-#धूरि_धरत_गज_शीश_पर_कहि_रहीम_केहि_काज?अर्थात गजराज हाथी अपने सिर पर धूल क्यों रखता है? क़ाफ़िला दरबार में पहुँचने के बाद कवि रहीम ने पंक्ति बादशाह को सुंताई। साथ ही यह दावा भी कर दिया कि इस पंक्ति पर दूसरी पंक्ति धरती पर केवल तुलसीदास जी ही लगा सकेंगे। किसी और में सामर्थ्य नहीं कि वे उनके प्रश्न का सटीक उत्तर देते हुए दोहे को पूर्ण कर सके। तय हुआ कि पंक्ति को एक प्रतियोगिता के रूप में प्रचारित किया जाएगा। जो सही पंक्ति लगाते हुए दोहे को पूर्ण करेगा। उसे हज़ार स्वर्ण मुद्राएं पुरुस्कार के तौर पर दी जाएंगी। दिन बीतते गए। दूर-दूर के कविगण अपनी पंक्ति के साथ दरबार में पहुँचते रहे। यह और बात है कि रहीम कवि उन्हें नकारते और लौटाते रहे। उन्हें जिस सार्थक पंक्ति की प्रतीक्षा थी वो अब तक दरबात में नहीं आई थी। दूसरी ओर पंक्ति व स्पर्द्धा का प्रचार देश भर में हो चुका था। प्रतिभा और प्रतिष्ठा की इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए बेताब कवि दरबार में उमड़ते रहे और लौटाए जाते रहे। चित्रकूट में एक निर्धन ब्राह्मण रहा करता था। जो लकड़ी काट कर व बेच कर अपने परिवार का उदर पोषण करता आ रहा था। उसकी चिंता अपनी दो पुत्रियों के गौने को ले कर थी। जिसमें उसकी निर्धनता आड़े आ रही थी। लकड़हारा नित्य सृजन करने वाले श्री तुलसीदास जी को देख चुका था। उनकी विद्वता और सज्जनता का अनुमान भी लगा चुका था। उसने सोचा कि यदि बाबा एक पंक्ति लिख दें तो उक्त प्रतियोगिता जीती जा सकती है। वो अपने इस पक्के भरोसे के साथ चित्रकूट के घाट पर जा पहुँचा। गोस्वामी जी को प्रणाम कर उन्हें अपनी पीड़ा से अवगत कराया। साथ ही अपना मंतव्य भी बताया। गोस्वामी जी को इस प्रतियोगिता के पीछे कोई चाल होने का अंदेशा था, किंतु वे निर्धन ब्राह्मण की मदद से पीछे हटना भी नहीं चाहते थे। उन्होंने शर्त रखी कि वो उनकी दी हुई पंक्ति को स्वरचित बता कर दरबार में सुनाए। ईनाम लेकर अपने घर जाए और दायित्व पूर्ण करे। भूल कर भी किसी को उनके बारे में ना बताए। ब्राह्मण को अपनी निर्धनता से पार पाना था। वो तुरन्त इस शर्त को मां गया। तुलसीदास जी ने उसे एक पंक्ति लिख कर दी और समझाइश देते हुए विदा कर दिया। लकड़हारा जैसे-तैसे दरबार के द्वार तक जा पहुँचा। उसकी दयनीय दशा को देख कर द्वार पर तैनात प्रहरियों ने उसे रोक लिया। संयोग से यह दृश्य कविवर रहीम ने देख लिया। उन्होंने उसे आने देने को कहा। लकड़हारा अब दरबार में था। उसने अपनी पंक्ति सुनाने की अनुमति माँगी। जैसे ही उसे अनुमति मिली, उसने गोस्वामी जी द्वारा दी गई पंक्ति सुना दी-#जेहि_रज_मुनि_नारी_तरी_तेहि_ढूँढत_गजराज।।अर्थात प्रभु श्रीराम के चरणों की जिस धूल से ऋषि भार्या अहिल्या का उद्धार हुआ। गजराज उस रज की खोज में है ताकि उसका भी उद्धार हो सके। पंक्ति को सुनते ही रहीम कवि उछल पड़े। उन्होंने लकड़हारे को गले से लगा लिया। उनकी तलाश एक दोहे की पूर्णता के साथ पूरी हो चुकी थी। यह अलग बात है कि वे इस पंक्ति को न इस ब्राह्मण का मानने को तैयार थे। ना ही उसे तुलसीदास के रूप में स्वीकार पा रहे थे। पारखी निगाहें अब भी सच की तलाश में थीं। लकड़हारे को बंदीगृह में डालने का भय दिखाया गया। भयवश उसने सारा सच उगलते देर नहीं लगाई। कहा जाता है कि इसके बाद अकबर और रहीम कवि ने चित्रकूट पहुँच कर गोस्वामी जी के दर्शन किए और अपनी जिज्ञासाओं को शांत किया। यह प्रसंग साहित्य संसार के मूर्धन्य मनीषियों की विवेकशीलता का एक जीवंत प्रमाण है। जो #खग_की_भाषा_खग_ही_जाने वाली उक्ति को चरितार्थ करता है। साथ ही विभूतियों की पारखी वृत्ति और आत्मविश्वास को भी उजागर करता है। एक पंक्ति में संशय और दूसरी पंक्ति में समाधान का प्रतीक यह दोहा आज भी सोच की समरसता व साझा सृजन का एक नायाब उदाहरण है:-#धूरि_धरत_गज_शीश_पर_कहि_रहीम_केहि_काज?#जेहि_रज_मुनि_नारी_तरी_तेहि_ढूँढत_गजराज।। #जय_राम_जी_की😊😊😊😊😊😊😊😊😊😢
😢 #लघुकथा / #फ़रमान 【प्रणय प्रभात】
शवयात्रा कस्बे के बीच से गुज़र रही थी। कुल आधा दर्ज़न लोग थे। पाँच ज़िंदा और एक मुर्दा। चार अर्थी उठाए थे। एक हँडिया लिए आगे चल रहा था। सरकारी फ़रमान का पालन जो ज़रूरी था। रास्ते में मदिरा के ठेके पर जमा आधा सैकड़ा लोगों ने एक उचटती सी नज़र इस नज़ारे पर डाली। देखते ही देखते शवयात्रा आगे गुज़र गई। 😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢
Monday, June 1, 2020
#दास्य_भाव_की_पराकाष्ठा_गोस्वामी_तुलसीदास। (धर्म और साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए) 【 प्रणय प्रभात】
एक प्रेरक वक्ता के रूप में लगभग डेढ़ दशक सक्रिय रहा। ईश कृपा से एक हज़ार के आसपास कार्यक्रमों में उद्बोधन का अवसर मिला। श्री रामचरित मानस के महान पात्र व प्रसंग मेरे वक्तव्यों में सहज ही शामिल रहे। क्योंकि जीवन पर इस महाग्रंथ का सर्वाधिक प्रभाव रहा। हिंदी साहित्य के विद्यार्थी के रूप में भी गोस्वामी तुलसीदास जी मेरे सर्वाधिक प्रिय कवि रहे। संवाद शैली में अपने उद्बोधन के बीच प्रश्न करना मुझे सदैव भाया। इससे वक्ता व श्रोताओं के बीच एक रुचिकर सामंजस्य जो स्थापित होता है। कई कार्यक्रमों में मैंने यह प्रश्न विद्यार्थियों के बीच रखा कि-#बंदहु_गुरुपद_पदमु_परागा_सुरुचि_सुवास_सरस_अनुरागा में गोस्वामी जी ने किस की वंदना की है। हर बार सतही उत्तर मिला- #गुरु_चरणों की। चौपाई के मर्म तक महाविद्यालय के विद्यार्थी भी नहीं पहुंचे। यूँ भी कह सकते हैं कि उन्होंने महाकवि की अगाध श्रद्धा के स्तर को जानने का प्रयास ही नहीं किया। ऐसे तमाम विद्यार्थियों को बताना पड़ा कि इस एक चौपाई में गुरु या गुरु चरण नहीं बल्कि #चरण_रज (धूल) की वंदना की गई है। जो गोस्वामी जी को दास्य भाव का सर्वोत्कृष्ट कवि सिद्ध करती है। इस चौपाई का भावार्थ दास्यभाव का उत्कर्ष है। महाकवि की गुरु के प्रति विनम्र आस्था का प्रमाण भी। स्मरण रहे कि यह वंदना श्री हनुमान जी महाराज के श्रीचरणों की है। जिनकी प्रेरणा से श्री तुलसीदास जी ने इस संसार को श्री रामचरित मानस जैसा महान ग्रंथ दिया। गुरु के कमल रूपी चरणों के परागकण अर्थात रज-कण की वंदना कर बाबा तुलसीदास जी ने गुरु-महात्म्य को नए आयाम भी दिए। जिनके लिए गुरु चरणों में आसक्त प्रत्येक गुरुभक्त को उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। ध्यान रहे कि दास्यभाव की पराकाष्ठा का यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। बाबा तुलसी श्री हनुमान चालीसा का श्रीगणेश #श्री_गुरु_चरण_सरोज_रज के साथ करते हुए गुरु चरणों की रज के प्रति अपनी इसी निष्ठा को दोहरा चुके हैं। #जय_रामजी_की#कोटिशः_प्रणाम_गोस्वामी_जी_को
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