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Tuesday, April 6, 2021

लघुकथा / डॉन

#लघुकथा / #डॉन
【प्रणय प्रभात】
बरसों पहले दूरदर्शन पर एक विज्ञापन आता था। जिसमें एक बच्चा उछल उछल कर गाता था- 
"एशेल वर्ल्ड में रहूंगा में, घर नहीं जाऊंगा में। 
     सालों बाद उसी बच्चे की याद एक बुड्ढा दिला रहा है। बस गीत के बोल बदल कर कुछ यूं हो गए हैं-
"जेल के अंदर रहूंगा में, बाहर नहीं जाऊंगा में।"
     लगता है वही क्यूट सा बच्चा एक कुख्यात "डॉन" बन चुका है। जिसके कुकर्म उसे बाहरी दुनिया और मौत से डरा रहे हैं।
😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

Saturday, December 5, 2020

गीत :--#अपना_जीवन.....!!

#गीत :--
#अपना_जीवन.....!!

"जीवन अपना माना
बहुआयामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।

■ सहा गर्भ में जो कुछ वो सब भूल गया,
बाहर आकर के पलने में झूल गया।
शैशव में घुटनों पर रेंगा तक,
लाड़-प्यार और पोषण पाकर फूल गया।
बाल्यकाल तक उर में अंतर्यामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।

■ वय किशोर, तरुणाई में बस जोश रहा,
भले-बुरे का नहीं तनिक भी होश रहा।
यौवन में बस भोग विलास पसंद रहे,
मनचाहा मिलने पर ही संतोष रहा।
नाम हुआ कम अधिक हुई बदनामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।

■ प्रौढ़ हुए तब तक केवल संचय भाया,
राग-द्वेष, छल-दम्भ मोह ने भरमाया।
वृद्ध देह फिर रोगों का घर-द्वार बनी,
पड़े-पड़े सोचा क्यां खोया क्या पाया?
कल की खूवी आज लगे बस ख़ामी है।
पथदर्शी क्या मानें
बस अनुगामी है।।"
   ©® प्रणय प्रभात

Monday, November 30, 2020

■ #सामयिक_व्यंग्य :--

■ #सामयिक_व्यंग्य :--

°हमारे पास काम हो या पूरा आराम,
सुबह हो दोपहर या फिर शाम।
हम जैसे जड़वत भी
चेतनता का सुबूत देते हैं,
समस्त मानवीय भावों से दिन भर काम लेते हैं।
हम खुलकर हँसते हैं, मुस्कुराते हैं,
कभी ज़ोर का ठहाका तक लगाते हैं।
कभी ऐसे हँसते हैं कि बत्तीसी चमकती है,
कभी गालों पर लाली सी दमकती है।
कभी चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है,
कभी इसी चेहरे पर भूचाल हो जाता है।
दुःख हो तो आँख से आँसू निकलता है।
कभी चेहरे पर ठिठोली का भाव मचलता है।
कभी आँख बंद होते ही जीभ निकलती है,
कभी आँखों व चेहरे पर शोखी मचलती है।
कभी अचंभे से आँखें फ़टी सी रह जाती हैं,
कभी यही आँखें आँसू का सैलाब लाती हैं।
कभी आँखों मे पीड़ा का भाव छलकता है,
कभी चेहरे पर तनाव झलकता है।
मज़े की बात यह है कि 
सब होता है दिखावा,
जिसे कह सकते हैं संवेदनाओं से छलावा।
मतलब सब कुछ होकर भी नहीं होता,
हमारा दिल न मचलता न हँसता न रोता।
हम शहद भूलकर उनके अर्थ खो चुके हैं,
भावों और भावनाओं से विमुख हो चुके हैं।
नक़ली चेहरों पर पल पल परत बदलते हैं,
असल में ना मुस्कान है ना आँसू निकलते हैं।
हम संवेदना, सरोकारों से पल्ला झाड़ लेते हैं,
टसुए बहाते-बहाते ही दांत भी फाड़ लेते हैं।
ज़रा भी झूठ नहीं है कसम रोटी रोज़ी की,
ये सारी मेहरबानी है बस इमोजी की।
अब काहे की संवेदना और कैसे सरोकार?
रस्म-अदायगी के लिए इमोजी है तो सही यार!!"
          #प्रणय_प्रभात

Saturday, November 28, 2020

एक मौलिक #व्यंग्य :--#नौकरशाहों_की_नज़र_में_साहित्यकार

👺 एक मौलिक #व्यंग्य :--
#नौकरशाहों_की_नज़र_में_साहित्यकार 
【प्रणय प्रभात】

सरकारी दामाद (छोटे, बड़े या मंझोले) के तौर पर अन्यत्र कस्बों या गांव-खेड़ों से आकर अपनी ग्रहण क्षमता व खुराक के बलबूते बरगद की तरह आकार पा जाने और हमारे अपने नगर और जिले की धरती का बोझ बढ़ाने वाले कुछ महामूर्ख श्रेणी के तथाकथित बुद्धिजीवियों (महाधूर्तों) के अनुसार "साहित्यकार" उसे ही कहा और समझा जा सकता है जो:-
+ मंगल ग्रह, चन्द्रलोक अथवा अंतरिक्ष का निवासी हो।
+ मां के गर्भ से पैदा ना होते हुए सीधे अवतरित हुआ हो।
+ सामान्य व्यक्तियों से बिल्कुल अलग दिखाई देता हो।
+ जिसकी देह से दिव्य किरणें रह-रहकर फूटती हों।
+ जो खाने-पीने के लिए कम से कम मुंह का उपयोग तो ना करता हो।
+ जो भूख-प्यास, थकान, विश्राम जैसे भावों से सर्वथा परे हो।
+ जिसकी परछाई कभी धरती पर गिरने का साहस नहीं करती हो।
+ जिसके पैर चलते-फिरते समय धरती का स्पर्श ना करते हों।
+ जो इच्छाधारी नाग की तरह जब चाहे प्रकट और लुप्त हो सकता हो।
+ जिसके माथे पर अश्वत्थामा की तरह मणि सुशोभित होती हो।
+ जिसकी खोपड़ी के पिछले हिस्से में आभायुक्त चक्र घूमता हो।
+ जो मानवीय समाज से अलग देवलोक का दूत दिखाई देता हो।
+ जो माथे पर मुकुट लगाकर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित रहता हो।
+ जिसकी कमर में समस्त प्रकार के ज्ञान के भण्डार की चाबी लटकी हो।
+ जो बिना कानों के सुनने और बिना नाक के सूंघने की शक्ति रखता हो।
+ जिसका स्पर्श करने मात्र से हजारों वोल्ट का करेण्ट लगता हो।
+ जिसकी छवि दर्पण या तरल पदार्थ में दिखाई ना देती हो।
+ जिसकी देह से केसर या कस्तूरी की मदमाती गंध सदैव आती हो।
+ जिसके पास भ्रमण करने के लिए एक अदद पुष्पक विमान हो।
+ जिसके श्रीमुख से दिन-रात ज्ञान की गंगा फूटती रहती हो।
+ जिसके पास स्वयं भगवान या मां सरस्वती द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र हो।
+ जिसकी भुजाओं में हजार हाथियों का बल हो।
+ जिसकी चमड़ी पर सर्दी, गर्मी, बरसात का असर नहीं होता हो।
+ जिसकी गति सूर्यदेवता के रथ से कई गुना अधिक हो।
हे मेरे भगवान,,,,,,,,इतने सारे गुण ?
अच्छा किया जो नहीं दिए तूने,,,वर्ना मार डालते लोग ऐलियन समझकर।।
👉 अंततः लानत धूर्तों पर :-
"डूब के मर जाओ कुए के मेंढकों।
पता नहीं क्या देखा था तुम्हारे मां-बापों ने जो तुम्हारी अंधता को नजर-अंदाज कर तुम्हारा नाम नयनसुख रख दिया।" :P :P 
@ (प्रभात प्रणय)

Thursday, June 18, 2020

#गजल / #हो_नहीं_सकता 【प्रणय प्रभात】

◆ कभी भी साथ इक शब का गवारा हो नहीं सकता।जो सूरज है वो सूरज है, सितारा हो नहीं सकता।।◆ मुझे अपनी वफा पर नाज है मैं आज कहता हूं।जो मेरा हो नहीं पाया, तुम्हारा हो नहीं सकता।।◆ नहीं था बे-सबब दामन छुड़ाना, हाथ से उसके।हमें लगने लगा था वो, हमारा हो नहीं सकता।।◆ अगर सच्ची मोहब्बत में, तआल्लुक तर्क हो जाए।यकीं मानो कि ऐसा फिर, दुबारा हो नहीं सकता।।◆ जहां पल-पल बदलती सीरतें, आंखों के आगे हों।कसम से ऐसी बस्ती में, गुजारा हो नहीं सकता।।◆ घरोंदा राख कर डाले, कहां आतिश के बस में है?हवा का जब तलक ना हो इशारा हो नहीं सकता।।

#भावाभिव्यक्ति#पिता_को_याद_क्यों_करूं? 【प्रणय प्रभात】"

"मैं अपने पिता को याद नहीं करताकभी नहीं, कभी भी नहीं।और क्यों करूं याद?याद भी उन्हें, जिन्हें कभी भूला ही नहीं,जो शिलालेख पर अंकित वाक्य की तरह,कालजयी हैं मेरे मानस-पटल पर।कौन कहता है कि वो नहीं हैंमैं कहता हूं कि वो आज भी यहीं हैं,मेरे कर्म में, मेरे धर्म में,मेरे जहन में, मेरे मर्म में।मेरे आचार-विचार-व्यवहार में,मेरी हरेक जीत में और हार में।यहां तक कि मेरी सभ्यता और संस्कार में।मुझे महसूस होता है पल-पल पिता के साथ का,मेरा शीश सतत स्पर्श पाता है पिता के हाथ का।मेरे लिए पितृ-दिवस कोई एक दिनी त्यौहार नहीं,मेरे लिए हर दिन पितृ-दिवस हैक्योंकि मेरे अंदर मेरे पिता आज भी हैंजो जीवित रहेंगे मेरे जीवन तक और उसके बाद मेरे सूक्ष्म स्वरूप मेंपहुंच जाऐंगे अपने वंश की अगली पीढ़ी में।सिर्फ इसलिए कि मैने अपने में अपने पिता को जिया है,आखिर मेरे पास जो भी है उन्हीं से तो लिया है।।"(अपने जीवनदाता, अपने मार्गदर्शी, अपने प्रेरणास्त्रोत अपने आदर्श पापा को उनके बेटे की ओर से सादर समर्पित काव्यात्मक भावाभिव्यक्ति)

Wednesday, June 17, 2020

#स्लोगम / #बिटिया 【प्रणय प्रभात】"

◆ गर्मी छाया सर्दी धूप।बिटिया है देवी का रूप।।◆ बेटी दुर्गा का आभास।बेटी में लक्ष्मी का वास।।◆ बेटी चंदा बेटी तारा।बेटी से घर में उजियारा।।◆बेटी कंगन बेटा हार।दोनों हैं कुल के श्रंगार।।बेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ अभियान

#स्लोगन / #बेटी 【प्रणय प्रभात】

◆ बेटा-बेटी दोनों एक।अगर दिलाओ शिक्षा नेक।।◆ बेटी जब पढ़ने जाएगी।साथ शारदा घर आएगी।।◆ बिटिया सारे काम करेगी।पढ़ी-लिखी तो नाम करेगी।।◆जीवन धारा जाए न व्यर्थ।बिटिया को भी करो समर्थ।।◆ दुर्गा लक्ष्मी शारद जानो।बेटी शक्ति-स्वरूपा मानो।।बेटी बचाओ अभियानबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओबेटी बचाओबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओबेटी बचाओ स्वावलम्बी बनाओ

#गीत / #सुख_दुःख 【प्रणय प्रभात】

अगर वो अपनी लगती है तो यह कैसे पराया है?ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ हमें मीठा निगलने कटु उगलने की जो आदत है।उसी कारण खुशी की चाह है दुःख से शिकायत है।।ये सोचो कल बहिन आई थी भाई आज आया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ लता, पत्ते, सुमन, फल और तरु उपवन सजाते हैं।मगर क्यों भूलिए उद्यान में कंटक भी आते हैं।।इन्हीं ने अनगिनत पुष्पों का जीवन तक बचाया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।◆ बनाएं दृष्टि रुचि अरु सोच सम आदर करें दुःख का।बिना इनके भला क्या स्वाद जीवन में किसी सुख का?वो दुःख ही हैं जिन्होंने ईष्ट का सुमिरन कराया है।।ख़ुशी जिसने बनाई है कि उसी ने दुःख बनाया है।।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

Saturday, June 13, 2020

#प्रयोगात्मक_कविता- 【प्रणय प्रभात】

#जन जितने सारे आहत।#गण जितने पाते राहत।#मन व्याकुल करता क्रंदन ।#अधिनायक का अभिनंदन।।#जय कहने में क्या जाता?#है माता आखिर माता।।#भारत वर्ष रहे आबाद।#भाग्य_विधाता ज़िंदाबाद।।😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

#कोटा एक_शहर_जो_अब_है_बस_यादों_में 😍【प्रणय प्रभात】😍

राजस्थान की वो कोटा नगरी आज की कोटा महानगरी से बिल्कुल अलग थी। ना बहुत सीमित, ना इतनी विस्तारित। क्षेत्रफल और आबादी के मान से एकदम संतुलित। शोरशराबे और अंधी दौड़ से कोसों दूर। बेहद दर्शनीय, रमणीय और आकर्षक। बात अब से चार दशक पूर्व की है। जब कोटा शहर ना तो एज्यूकेशन हब था, ना ही चिकित्सा के क्षेत्र में इतना आधुनिक। तब हर तिराहे, चौराहे पर ना तो इतने ख़ूबसूरत सर्किल थे, ना ही पार्क। सात अजूबे (सेवन वंडर्स) और हवाई पुल (हैंगिंग ब्रिज) जैसे स्थल तब कल्पनाओं में भी नहीं थे। चंबल गार्डन उस दौर का सर्वाधिक सुंदर और पसंदीदा पिकनिक स्पॉट हुआ करता था। उसके आगे अमर-निवास, श्री गोदावरी धाम, अधर-शिला और भीतरिया कुंड सहित नसिया जी भी सुरम्य पर्यटन स्थल थे। जहां सैलानियों और स्थानीय परिवारों की मौजूदगी रौनक बिखेरा करती थी। चंबल गार्डन की सुंदर लाइटिंग के बीच झाड़ीनुमा पौधों की मनमोहक आकृतियां मन को लुभाती थीं। मद्धिम स्वर में बजतीं मानस की चौपाइयां माहौल में रस घोलती रहती थीं। चंबल की जलधाराओं पर फट-फट की आवाज़ के साथ फर्राटा भरती मोटरवोट की सवारी तब बेहद रोमांचित करती थी। घर से बना कर ले जाया गया भोजन हरी-भरी घास के कालीन पर अत्यंत स्वादिष्ट लगता था। कोटा बैराज, गढ़ पैलेस भी यदा-कदा तफ़रीह के अच्छे विकल्प होते थे। तब आवागमन के तीन साधन ही प्रचलन में थे। लम्बी थूथनी वाले टेम्पू, तांगे और रिक्शे। आवागमन के निजी साधनों में सर्वाधिक संख्या सायकिलों की होती थी। उसके बाद स्कूटर, मोपेड, बाइक आदि का नम्बर आता था। चार पहिया वाहन ख़ास परिवारों के पास होते थे। तारकोल की काली, चिकनी व चौड़ी सड़कों पर साइकिल दौड़ाना तब बेहद मज़ा देता था। बचपन से युवावस्था तक कोटा मेरी पहुंच में रहा और अभिरुचि में भी। मेरे छोटे मामा राजस्थान राज्य विद्युत मंडल (आरएसईबी) में सेवारत थे। किराए के मकान में रहते थे और एक निर्धारित अंतराल पर घर बदलते रहते थे। बहुत छोटा था तब उनका ठिकाना पाटनपोल की किसी गली में था। जिसकी याद बहुत धुंधली है। बाद में उन्होंने किशोरपुरा गेट के पास किन्हीं पारीक जी का घर ले लिया। जो श्री नीलकंठ महादेव मंदिर के पास था। यहां रहते हुए गढ़ पैलेस और नज़दीक स्थित उद्यान तक आना-जाना बेहद आसान होता था। सन 1980 के दशक में दादाबाड़ी कॉलोनी कोटा की सबसे अच्छी कॉलोनी के तौर पर वजूद में आई। यहां स्थित आवास 3/के/4 में चार-पांच साल बेहद यादगार रहे। चंबल गार्डन वाला क्षेत्र यहां से मामूली दूरी पर था। दिन भर बर्फ़ के गोले, नर्म-नर्म ककड़ी, फिरनी, फालसे, जामुन, शहतूत, रसीले तरबूज़, कुल्फ़ी आदि के ठेले घण्टी बजाते, आवाज़ लगाते आया करते थे। सबसे कुछ न कुछ खरीदना दिन भर का काम था। हर ठेले वाले के पास अधिकांश परिवारों का उधार खाता होता था। घर-घर में हड़ और चूरन-चटनी की पेकिंग का काम तब घरेलू रोज़गार होता था। हर रविवार को चंबल गार्डन जाना तब बेहद लाजमी था। गर्मी के दिनों में तब रात बेहद सुहानो होती थी। पानी के छिड़काव से शीतल पूरी छत पर बिस्तर बिछाना और धमाल करना बहुत भाता था। मामी जी और उनके चार बच्चों के साथ हम चार भाई-बहन और मिल जाते थे अपनी मम्मी के साथ। आपस में खूब हंसी-ठठ्ठा होता। न जाने कहाँ-कहाँ के किस्से निकल कर आते थे। कभी-कभी कुछ पलों की हल्की सी झड़प भी हम बच्चों में हो जाती थी। जो दर्ज़न भर बच्चों के बीच स्वाभाविक सी ही थी। थके-हारे मामाजी अपने अनूठे अंदाज़ में भुनभुनाते और अंततः हमारी मस्ती में शरीक़ हो जाते। जिन्हें उनके हमनाम बाल-सखा राजू मामा बहुत छेड़ते और खिजाते थे। हर शाम साइकिल पर सवार होकर आना और देर रात लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल था। खाने-पीने के शौकीन और बेहद मस्तमौला। ईसाई परिवार से ताल्लुक़ रखते थे और ख़ासे मोटे-ताज़े। मैकेनिकल लाइन के थे और तमाम बिगड़ी चीज़ें ख़ुद सुधार देते थे। फेक्ट्री से कुछ न कुछ बनाकर लाना उनका शौक़ था। कॉलोनी के इस हिस्से में तब बहुत गहमा-गहमी नहीं होती थी। वातावरण प्रायः शांत प्रतीत होता था। आधी रात तक एक अदद ट्रांजिस्टर हम सबके मनोरंजन का साझा माध्यम होता था। बिनाका गीतमाला, चित्रपट से, फौजी भाइयों के लिए और बेला के फूल जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत उस दौर के कर्णप्रिय गीत प्रसारित होते थे। पुराने सदाबहार गीत भी आधी रात तक ट्रांजिस्टर से गूंजते थे। एकाध बार टॉकीज़ में फ़िल्म भी देख आते थे। यहां के बाद  अगला ठिकाना बना दादाबाड़ी विस्तार योजना का आवास 3/जी/39, जहां की यादें आज भी रोमांचित करती हैं। इस क्षेत्र में लगभग सभी आवास भरे हुए थे। लिहाजा चहल-पहल की कोई कमी नहीं थी। हल्दी, तेल, दाल, चाय-पत्ती, शक्कर, आटा मांगने और लौटने आने वाले पड़ौसी बेहद क़रीबी  होते थे। इसके पीछे अभाव जैसी स्थिति नहीं थी। बस घरों में अति संचय की आदत नहीं थी शायद। इस आवास के पास ही एक आवास मामीजी के बड़े भाई यानि मुन्ना मामा का था। लिहाजा यहां मौज-मस्ती की कम्पनी का आकार और बड़ा था। यहां से साइकिल लेकर मेला मैदान के रास्ते नयापुरा, घंटाघर, टिपटा, पाटनपोल, कैथूनीपोल, सब्ज़ी मंडी जाना रोज़ का काम था। तीखी धूप में दूर तक सुनसान सड़क पर साइकिल की रफ़्तार भी गज़ब की होती थी। कचौड़ी लाना हर दूसरे दिन का काम था। कच्चे पापड़ और मोटे सेव (सेवड़े) प्रायः सब्ज़ी का विकल्प होते थे। दादाबाड़ी के छोटे चौराहे पर कुंदन पान वाले की दुकान हर शाम हमारी पहुंच में होती थी। दो-तीन गुमटीनुमा दुकानों पर कॉमिक्स व पत्रिकाएं किराए पर मिलती थीं। इसी तरह कुछेक दुकान साइकिलों की थीं। सप्ताह में एक दिन थोक में सब्ज़ी लाने के लिए बड़ी सब्ज़ी मंडी जाने का अपना ही मज़ा था। यहां सब्ज़ी अच्छी और सस्ती मिलती थी। जो आम दिनों में दादाबाड़ी कॉलोनी की गिनी-चुनी दुकानों पर डेढ़ से दो गुना मंहगी मिलती थीं। दिन भर कुछ न कुछ खाना-पीना और मौज-मस्ती करना हर साल गर्मी की छुट्टियों का तक़ाज़ा था। इसके अलावा मनमर्जी से कोटा आना-जाना साल में चार-छह बार हो जाता था। दो-दो कमरों वाले एक छोटे से क्वार्टर में हम दर्ज़न भर लोग चैन से रह लेते थे। यह सोच कर भी अब ताज्जुब होता है। जब सबको अलग कमरों की दरकार होती है। पता चलता है कि गुंजाइशें ईंट-पत्थर के घरों में नहीं दिलों में हुआ करती थीं। खेल-कूद के साधनों के बिना दो-दो महीने कितने मज़े से गुज़र जाते थे। इस बात की कल्पना भी आज की पीढ़ी शायद ही कर पाए। लगता है कि आनंद संसाधनों का मोहताज़ नहीं। यह अंदर से उपजने वाली सहज हिलोर होता है। जिसका वास्ता केवल आपसी सरोकारों और आत्मीयता से होता है। आखिरी पड़ाव गणेश तलाब रहा, जहां मामाजी ने ख़ुद का छोटा सा घर ले लिया। उड़िया बस्ती के पास स्थित घर के सामने सिर्फ़ मैदान हुआ करता था। यहां से काफ़ी दूरी पर बस मोदी कॉलेज नज़र आता था। बहुत से सूने इलाके के बाद जवाहरनगर जैसी कुछ नई कॉलोनियाँ तब आकार पा रही थीं। हमारी दौड़-धूप सामान्यतः कोटा के पुराने क्षेत्रों में रहती थी। कभी-कभी सीएडी और एरोड्रम चौराहे तक की सैर भी साइकिल से हो जाती थी। सीमित साधनों के बीच बेहद यादगार रहे वो दिन। फिर इन्हें किसी की नज़र लग गई। सन 1992 में धुलेंडी के दिन मामाजी अपने परिचितों से रंग खेल कर घर लौट रहे थे। मोदी कॉलेज के सामने किसी नशेड़ी रईसज़ादे की तेज़ रफ़्तार कार ने उन्हें कुचल दिया। जिनकी दुःखद मृत्यु की ख़बर परिवार को अगले दिन मुश्किल से मिली। मामाजी के जाने के बाद परिवार लगभग असहाय सी स्थिति में आ गया। तीन बेटियों की शादी और तमाम कारणों से छोटा सा आशियाना बिक गया। बाद में मामाजी के बेटे को मिली अनुकम्पा नियुक्ति और मामीजी की पेंशन से हालात सामान्य हो गए। परन्तु वो दौर आज तक नहीं लौट पाया जो अब तक यादों में महफ़ूज़ है। कुछ सालों बाद राजू मामा भी दुनिया छोड़ गए। जिनकी गोद में बचपन के कई बरस बीते। बाद में मामीजी ने भी बेटे की बदली के कारण कोटा छोड़ दिया। कुल मिलाकर बरसों तक अपना सा लगने वाला कोटा अब एक पराया सा नगर है। जहां पहुंचकर वो सुखद अहसास अब होता ही नहीं। निस्संदेह बीते तीन दशक में कोटा ने तीव्रगामी व गगनचुंबी विकास की तमाम इबारतें लिखीं। वेशक यहां की विकासयात्रा ने राजस्थान सहित अन्य राज्यों के बाक़ी शहरों को चौंकाया। बावजूद इसके मैंने उस कोटा को फिर कभी नहीं पाया जो मेरे दिल में बसा करता था, या आज तक धड़कता है। आज श्योपुर वालों के लिए कोटा आसानी से पहुंच में है। मेगा हाईवे और ऊँची पुलियाओं ने आवागमन के ज़ोखिम को लगभग खत्म कर दिया है। एक के बाद एक अच्छी बसों का संचालन होने लगा है। बावजूद इसके राजस्थान राज्य परिवहन निगम की बसों का वो सफ़र भुलाए नहीं भूलता, जो बरसात में जटिल हो जाता था। पार्वती और कालीसिंध नदी के कारण रास्ता मामूली बारिश में बाधित हो जाता था। बावजूद इसके कोटा की यात्रा साल में कई बार बदस्तूर कारी रहती थी। जो अब अन्य शहरों की यात्राओं के लिए बतौर जंक्शन एक पड़ाव भर है। जिसका वास्ता भी केवल रेलवे स्टेशन और नयापुरा क्षेत्र से बचा है। जहां अपने लिए अब कोई लगाव या आकर्षण जैसी अनुभूति नहीं। अपना कोटा वर्तमान कोटा के लंबे-चौड़े आँचल में पूरी तरह गुम हो चुका है। बहरहाल, कोटा प्रवास से जुड़े तमाम यादगार व मज़ेदार किस्से कभी फुर्सत में.......।।        #miss_you_old_kota 😍