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Monday, November 30, 2020

■ #सामयिक_व्यंग्य :--

■ #सामयिक_व्यंग्य :--

°हमारे पास काम हो या पूरा आराम,
सुबह हो दोपहर या फिर शाम।
हम जैसे जड़वत भी
चेतनता का सुबूत देते हैं,
समस्त मानवीय भावों से दिन भर काम लेते हैं।
हम खुलकर हँसते हैं, मुस्कुराते हैं,
कभी ज़ोर का ठहाका तक लगाते हैं।
कभी ऐसे हँसते हैं कि बत्तीसी चमकती है,
कभी गालों पर लाली सी दमकती है।
कभी चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है,
कभी इसी चेहरे पर भूचाल हो जाता है।
दुःख हो तो आँख से आँसू निकलता है।
कभी चेहरे पर ठिठोली का भाव मचलता है।
कभी आँख बंद होते ही जीभ निकलती है,
कभी आँखों व चेहरे पर शोखी मचलती है।
कभी अचंभे से आँखें फ़टी सी रह जाती हैं,
कभी यही आँखें आँसू का सैलाब लाती हैं।
कभी आँखों मे पीड़ा का भाव छलकता है,
कभी चेहरे पर तनाव झलकता है।
मज़े की बात यह है कि 
सब होता है दिखावा,
जिसे कह सकते हैं संवेदनाओं से छलावा।
मतलब सब कुछ होकर भी नहीं होता,
हमारा दिल न मचलता न हँसता न रोता।
हम शहद भूलकर उनके अर्थ खो चुके हैं,
भावों और भावनाओं से विमुख हो चुके हैं।
नक़ली चेहरों पर पल पल परत बदलते हैं,
असल में ना मुस्कान है ना आँसू निकलते हैं।
हम संवेदना, सरोकारों से पल्ला झाड़ लेते हैं,
टसुए बहाते-बहाते ही दांत भी फाड़ लेते हैं।
ज़रा भी झूठ नहीं है कसम रोटी रोज़ी की,
ये सारी मेहरबानी है बस इमोजी की।
अब काहे की संवेदना और कैसे सरोकार?
रस्म-अदायगी के लिए इमोजी है तो सही यार!!"
          #प्रणय_प्रभात

Saturday, November 28, 2020

एक मौलिक #व्यंग्य :--#नौकरशाहों_की_नज़र_में_साहित्यकार

👺 एक मौलिक #व्यंग्य :--
#नौकरशाहों_की_नज़र_में_साहित्यकार 
【प्रणय प्रभात】

सरकारी दामाद (छोटे, बड़े या मंझोले) के तौर पर अन्यत्र कस्बों या गांव-खेड़ों से आकर अपनी ग्रहण क्षमता व खुराक के बलबूते बरगद की तरह आकार पा जाने और हमारे अपने नगर और जिले की धरती का बोझ बढ़ाने वाले कुछ महामूर्ख श्रेणी के तथाकथित बुद्धिजीवियों (महाधूर्तों) के अनुसार "साहित्यकार" उसे ही कहा और समझा जा सकता है जो:-
+ मंगल ग्रह, चन्द्रलोक अथवा अंतरिक्ष का निवासी हो।
+ मां के गर्भ से पैदा ना होते हुए सीधे अवतरित हुआ हो।
+ सामान्य व्यक्तियों से बिल्कुल अलग दिखाई देता हो।
+ जिसकी देह से दिव्य किरणें रह-रहकर फूटती हों।
+ जो खाने-पीने के लिए कम से कम मुंह का उपयोग तो ना करता हो।
+ जो भूख-प्यास, थकान, विश्राम जैसे भावों से सर्वथा परे हो।
+ जिसकी परछाई कभी धरती पर गिरने का साहस नहीं करती हो।
+ जिसके पैर चलते-फिरते समय धरती का स्पर्श ना करते हों।
+ जो इच्छाधारी नाग की तरह जब चाहे प्रकट और लुप्त हो सकता हो।
+ जिसके माथे पर अश्वत्थामा की तरह मणि सुशोभित होती हो।
+ जिसकी खोपड़ी के पिछले हिस्से में आभायुक्त चक्र घूमता हो।
+ जो मानवीय समाज से अलग देवलोक का दूत दिखाई देता हो।
+ जो माथे पर मुकुट लगाकर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित रहता हो।
+ जिसकी कमर में समस्त प्रकार के ज्ञान के भण्डार की चाबी लटकी हो।
+ जो बिना कानों के सुनने और बिना नाक के सूंघने की शक्ति रखता हो।
+ जिसका स्पर्श करने मात्र से हजारों वोल्ट का करेण्ट लगता हो।
+ जिसकी छवि दर्पण या तरल पदार्थ में दिखाई ना देती हो।
+ जिसकी देह से केसर या कस्तूरी की मदमाती गंध सदैव आती हो।
+ जिसके पास भ्रमण करने के लिए एक अदद पुष्पक विमान हो।
+ जिसके श्रीमुख से दिन-रात ज्ञान की गंगा फूटती रहती हो।
+ जिसके पास स्वयं भगवान या मां सरस्वती द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र हो।
+ जिसकी भुजाओं में हजार हाथियों का बल हो।
+ जिसकी चमड़ी पर सर्दी, गर्मी, बरसात का असर नहीं होता हो।
+ जिसकी गति सूर्यदेवता के रथ से कई गुना अधिक हो।
हे मेरे भगवान,,,,,,,,इतने सारे गुण ?
अच्छा किया जो नहीं दिए तूने,,,वर्ना मार डालते लोग ऐलियन समझकर।।
👉 अंततः लानत धूर्तों पर :-
"डूब के मर जाओ कुए के मेंढकों।
पता नहीं क्या देखा था तुम्हारे मां-बापों ने जो तुम्हारी अंधता को नजर-अंदाज कर तुम्हारा नाम नयनसुख रख दिया।" :P :P 
@ (प्रभात प्रणय)